Begum Hazrat Mahal Biography In Hindi – बेगम हज़रत महल का जीवन परिचय

नमस्कार मित्रो आज के हमारे लेख में आपका स्वागत है आज हम Begum Hazrat Mahal biography in hindi में बेहतरीन कुशल रणनीतिकार योद्धा बेगम हजरत महल का जीवन परिचय बताने वाले है। 

आज the real name of begum hazrat mahal , begum hazrat mahal speech और begum hazrat mahal lucknow का कार्य की जानकारी बताने वाले है। वह पहले मुहम्मदी खानुम के नाम से जानि जाती थी , बेगम हजरत महल का जन्म भारत में अवध राज्य के फैजाबाद में करीबन ई.स1820 हुआ था। वे पेशे से गणिका थीं और जब उनके माता-पिता ने उन्हें बेचा तब वे शाही हरम में एक खावासिन के तौर पर आ गयीं। इसके बाद उन्हें शाही दलालों को बेच दिया गया जिसके बाद उन्हें परी की उपाधि दी गयी और वे ‘महक परी’ कहलाने लगीं।

हजरत महल की उपाधि उनके बेटे बिरजिस कादर के जन्म से ही मिली हुई थी। बेगम हजरत महल ने विनम्र स्वभाव और बहुत ही खूबसूरत थी।लेकिन उनका नेतृत्व, युद्ध कौशल और गुण भी अजीब मौजूद थे। बेगम हजरत महल एक बेहतरीन कुशल रणनीतिकार योद्धा थी। यह खूबियां अंग्रेजों के खिलाफ भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान से साफ दिखाई देती हैं , चलिए शुरू करते है begum hazrat mahal in hindi की सम्पूर्ण जानकारी। 

Begum Hazrat Mahal Biography In Hindi –

 नाम

 बेगम हज़रत महल

 

 बचपन का नाम

 मुहम्मदी खानुम

 जन्म

 1 फैज़ाबाद, अवध, भारत

 निधन

 7 अप्रैल 1879 (आयु 59)

 निधन स्थल

 काठमांडू, नेपाल

 पती

 वाजिद अली शाह

 पिता

 गुलाम हुसैन

 बेटा

 बिरजिस क़द्र

 प्रसिद्धि

 वीरांगना

 नागरिकता

 भारतीय

 अन्य जानकारी

 लखनऊ में 1857 की क्रांति का नेतृत्व किया था।

 

 धर्म

 शिया इस्लाम

बेगम हज़रत महल का जीवन परिचय

अंग्रेओ को धुल चटाई भारत को आज़ाद करने के लिए कई सारे क्रांतिकारी वीर पुरुषों ने अपना – अपना योगदान दिया हुआ है और अपनी धन – दौलद रुपया मालमिलकत सबकुछ न्योछावर कर दिया था। ऐसे ही बेगम हजरत महल सैन्य और युद्ध कौशल में निपुण योद्धा महिला थी , जो खुद युद्ध के मैदान में उतरकर अपने सैनिको को शिक्षा देती थी औरलड़ाई में जित प्राप्ति के लिए उनका हौसलाबढ़ाया करती थी ,उनके अंदर एक आदर्श और कुशल शासक के सारे गुण मौजूद थे।

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बेगम हजरत महल का देह लालित्य केसा था

Hazrat Begum Mahal का सुंदर रुप भी हर किसी को मोहित कर लेता था, वहीं एक बार जब अबध के नवाब ने उन्हें देखा तो वे उनकी सुंदरता पर लट्टू हो गए ,और उन्हें अपने शाही हरम में शामिल कर लिया और फिर बाद में अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने उन्हें अपनी शाही रखैल से बेगम बना लिया। इसके बाद उन्होंने बिरजिस कादर नाम के पुत्र को जन्म दिया। फिर उन्हें ‘हजरत महल’ की उपाधि दी गई। begum hazrat mahal original name मुहम्मदी खानुम था। 

बेगम हजरत महल की स्वातंत्र सैनानी की भूमिका

भारत वीर यौद्धाओ की जन्म भूमि रहा है। भारत को अंग्रेजी शासन से आजाद करवाने की लड़ाई में उनकी बहादुरी के लिए रानीलक्ष्मीबाई,अरुणा असफ अली सरोजिनी नायडू, सावित्री बाई फुले भारत वीरागंनाओं की जन्म भूमि रही है। और वीर महिलाओं का नाम लिया जाता हैं, वहीं ऐसे ही क्रांतिकारी महिलाओं में बेगम हजरत महल का भी नाम शामिल है। बेगम हजरत महल 1857 में हुई आजादी की पहले युद्ध में अपनी बेहतरीन ओर कुशल संगठन शक्ति बहादुरी से अंग्रेज शासन के छक्के छुड़ा दिए थे।

सावित्री बाई फुले लखनऊ को अंग्रेजों से बचने के लिए एक बहादुर और जाबांज योद्धा की तरह युद्ध लड़ी थी और सभी प्रकारके क्रांतिकारी कदम उठाकर ब्रिटिश शासन को अपनी शक्ति का परिचय दिखा था ।अवध के शासक वाजिद अली शाह की पहली पत्नी [बेगम] थी, जिन्हें अवध की महारानी ओर आन-बान शान मानते थे। 

बेगम हजरत महल . 1857 के विद्रोह का नेतृत्व कैसे किया

ब्रिटिश हुकूमत के सामने महिला क्रांतिकारियों ने भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम किया उसमे महा रानीलक्ष्मी बाई ,सावित्रीबाईफूले,और अरुणा असफअली महिला क्रन्तिकारी यौद्धाओ का नाम उभर कर इतिहास के पन्नो पर आ ही जाता है। इतिहास के पन्नो पर बेगम हज़रत महल का नाम भी आता है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब कुछ लुटवा कर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। अपनी वीरता और कुशल नेतृत्व से अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था।

बेगम हज़रत महल का जन्म फैजाबाद जिले में अवध प्रान्त मे 1820 में हुआ था। उनके बाल्यावस्था का नाम मुहम्मदी खातून था।  बेगम हजरत महल पेशे से गणिका थीं। उसके माता-पिता ने उन्हें बेचा तब वे शाही हरम में एक रखैल [वैश्या] के तौर पर आ गयीं थी । लखनऊ के विध्वंश के बाद भी बेगम हजरत महल के पास कुछ वफ़ादार यौद्धा और उनके पुत्र विरजिस क़द्र थे।

1 नवम्बर 1858 को महारानी विक्टोरिया ने अपनी घोषणा से ईस्ट इंडिया कंपनी का ब्रिटिश शासन भारत में समाप्त कर उसे अपने हाथो में ले लिया। कहा गया की रानी सब को उचित मान सम्मान देगी। किन्तु बेगम हजरत महल ने रानी विक्टोरिया की घोषणा का विरोध किया था। उन्होंने प्रजा को उसकी खामियों से परिचित करवाया। लखनऊ में करारी हार के बाद वह अवध के देहातों में चली गईं और वहाँ से भी क्रांति की चिंगारी चरम सिमा तक सुलगाई। बेगम हज़रत महल और महा रानी लक्ष्मीबाई के सैनिक छावनी में तमाम महिलायें शामिल हुई थीं।

महिला सैनिक की ट्रेनिंग

लखनऊ में बेगम हज़रत महल की महिला सैनिक छावनी का नेतृत्व रहीमी के हाथों से हुआ था, जिसने फ़ौजी वेष अपनाकर तमाम महिलाओं को तोप गोले और बन्दूक चलाना सिखा दिया था । रहीमी की अग्रतामे में इन महिलाओं ने अंग्रेज़ों से जमकर यूद्ध किया था लखनऊ की हैदरीबाई तवायफ के यहाँ तमाम अफसर अंग्रेज आते थे और कई वक्त क्रांतिकारियों के ख़िलाफ़ योजनाओं पर बातचित किया करते थे।

हैदरीबाई ने अपनी देशभक्ति का अच्छा परिचय देते हुये इन महत्त्वपूर्ण सूचनो को क्रांतिकारियों तक पहुँचाया था और बाद में हैदरीबाई भी रहीमी के सैनिक दलो में शामिल हो गयी थी । बेगम हज़रत महल ने जब संभव था तब तक अपनी पूरा जोर ओर ताकत लगाकर अंग्रेज़ों का मुकाबला किया था । उसने हथियार निचे रख कर नेपाल जाकर शरण लेनी पड़ी थी ।

बेगम हजरत ने लड़ते-लड़ते थक चुकीथी और वह चाहती थी कि किसी तरह भारत छोड़ कर चली जाये । नेपाल देश के महाराजा जंग बहादुर ने उनको शरण दी थी। जो अंग्रजो के मित्र बने थे। बेगम हजरत अपने बेटे बिरजिस के साथ नेपाल चली गई और वहीं उनका निधन हो गया था । आज भी उनकी क़ब्र का मकबरा उनके त्याग व बलिदान ओर वीरताकी की अमर याद दिलादेती है। 

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बेगम हजरत महल का बेटा बिरजिस क़द्र

बिरजिस क़द्र का जन्म 20 अगस्त 1845 और मृत्यु 14 अगस्त 1893 को हुईथी बेगम हजरत महल और वाजिद अली शाह का पुत्र था उनके कुछ विषयों मे 1857 के भारतीयो विद्रोह विग्रहमें भारत में अंग्रेज की सैन्य उपस्थिति लड़ी थी। राजकुमार बिरजीस कदर ने प्रतिवादी ब्रिटिश सेना के काठमांडू में शरण मांगी थी , जिसने महाराजा और उनकी मां बेगम हजरत महल से अवध को नियंत्रण किया। वह जांग बहादुरराणा के प्रशासन के दौरमें बहोतमूल्य गहने के खिलाफ अंग्रेजों से निकासी से बनाए रखने के लिए कामयाब रहे।

वह कोलकाता जानेसे पहले सतरा साल तक काठमांडू में रहते थे। क्वाड्र भी एक बेनुम शायर था जिसने काठमांडू में कई जगह ताराही महाफिल ई मुशैराका आयोजन कराया था, जिसे उनके समकालीन ख्वाजा नेमुदाद्दीन बदाखशी ने दर्ज किया था। 1995 में काठमांडू के प्रोफेसर अब्दुर्राफ ओर दूसरे आदिल सरवर नेपाली ने उनकी माजलिस ई मुशलीराह का रिकॉर्ड हासिल किया और नेपाल में उर्दू शैरी के काम में प्रकाशित किया था। 

बेगम हजरत महल की मदद राजा जयलाल सिंह कैसे की

हजरत महल ने भले ही राजधानी में प्रशासन की डोर संभाली किन्तु युद्ध में स्वयं ही हाथी पे सवार होकर बेगम हजरत हिस्सा लेती रहती थीं, लेकिन यह भी सच था कि उनके पास युद्ध का कोईभी प्रकार का अनुभव नहीं रहा था। ऐसे में सेना को देखने का काम राजा जयलाल सिंह के पास हुआ करता था और आम जनता से लड़ाके तैयार करने का कार्य मौलवी अहमद उल्लाह शाह का था ।

इस दीर्घकालीन के दो सिपाही तब अपनी तलवारों को अंग्रेजों का खून पिलाते रहते थे , जब तक कि नगर में गद्दारों को पूरी तरह दबाया नहीं था । महा राजा जयलाल सिंह आजमगढ़ के नाजिम रहा करते थे। वे नवाब की सेना के सेनापति बनकर युद्धो में हिस्सा ले रहे थे। उनके साथ पिताजी राजा दर्शन सिंह और भाईश्री राजा रघुबर दयाल भी गदर के महा नायकों में से थे।

रणनीति ओर युद्धकौशल बनाने में राजा जयलाल सिंह पर यह जिम्मेदारीया थी कि वे कहा कब और कितनी टुकड़ी तैनात करेंगे , जिससे नगर के भीतर अंग्रेज अफसर प्रवेश न कर दे । इतिहासकार डॉ. योगेश प्रवीन ने बताया हैं की राजा जयलाल सिंह क्षत्रिय कुर्मी थे। वह बेहतरीन तलवारबाज और कुशल बेहतरीन ओर रणनीतिकार भी। यही वजह है कि गिनती के सैनिक होने के बावजूद उन्होंने लंबे समय तक अंग्रेजों को शहर में प्रवेश नहीं करने दिया था ।

आलमबाग का युद्ध

आलमबाग के यूद्ध के दौरान जब क्रातिकारियों की छावनी सेना के पांव उखड़ने लगे तब राजा जयलाल सिंह को तालकटोरा की तरफ का हिस्सा बाचने को कहा गया। वह पूरी तरह वहा डटे रहे और ऐसी योजना बनाई कि जल्द से उधर से अंग्रेजों को खदेड़कर उस ओर ले जाएं जहा से विद्रोही सैनिकों को संगठित किया जा सके। अंतत: वह अपनी योजना में सफल रहे और आलमबाग का युद्ध क्रातिकारियों के पक्ष में गया।

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बेगम हजरत महल की धार्मिल एकता

वाजिद अली शाह ने तलाक़ दे दिया तो अकेले ही अंग्रेजों पर हमला कर दिया जो अंग्रेजों के दबाव में भी क़ौमी एकता की मिसाल बनाई थी। वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने अवध के शासन से उतार दिया था. उनके साथ उनकी मां और दो ख़ास बेगमें कलकत्ता के लिए निकल पड़े थे , बेगम हज़रात महल ने तकरीबन दस महीनों तक अवध राज़ पर राज किया। अंग्रेजों के खिलाफ साथ देने वालों में थे। 

आजमगढ़ के महाराजा राजा जयलाल सिंह, पेशवा नाना साहिब. उन्हीकी मदद से बेगम हज़रत महल ने अंग्रेजों को धूल चटाई। बेगम मानटी थी कि रोड बनवाने के लिए मंदिर और मस्जिद तोड़े जा रहे हैं वो ईसाई धर्म को फैलाने के लिए पादरी सड़कों पे उतारे जा रहे हैं ओर ये कैसे मान लिया जाए कि अंग्रेज हमारे धर्म के साथ खिलवाड़ नहीं करेंगे , बेगम हजरत महल हिन्दू मुस्लिम एकता की बेनुम मिसाल थी।

बेगम हजरत महल की छात्रवृत्ति योजना – Begum Hazrat Mahal National Scholarship

हजरत महल छात्रवृति में अल्पसंख्यक समुदाय की छात्राओं को मासिक रूप से मदद राशि दीजाती है बल्कि वे अध्यन की प्रक्रिया को आगे भी चालू रख सकते है। इस छात्रवृति के लिए मौलाना आजाद शिक्षा फाउंडेशन एक नोडल विभाग के रूप में योजना बना रहे है| इस छात्रवृति का लाभ केवल अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों यानी मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी से संबंधित छात्राएं ही ले पाती हैं। begum hazrat mahal scholarship योजना के अंतर्गत अल्पसंख्यक मंत्रालय भारत सरकार द्वारा कक्षा – 9 व 10 के लिए 5000/- रुपये तथा कक्षा 11 व 12 के लिए 6000/- रुपये छात्रवृत्ति के रूप में दिए जाते हैं|

बेगम हज़रत महल पार्क – Begum Hazrat Mahal Park

बेगम हज़रत महल का मक़बरा जामा मस्जिद, घंटाघर के नजदीक काठमांडू के बिच में स्थित है, जानीता दरबार मार्ग से नजदीक है। इसकी देखभाल जामा मस्जिद केंद्रीय समिति ने की है।15 अगस्त 1962 को महल को महान विद्रोह में उनकी भूमिका के लिए लखनऊ के हज़रतगंज के पुराने विक्टोरिया पार्क में सम्मान दिया गया था। पार्क के नामकरण के साथ, एक संगमरमर स्मारक का बनावट किया गया था, जिसमें अवध शाही परिवार के शस्त्रों के कोट और चार गोल पीतल के टुकड़े वाले संगमरमर के टैबलेट मौजूद थे।

पार्क का इस्तेमाल रामशिला, दसहरा के दौरान, साथ ही लखनऊ महोत्सव (लखनऊ प्रदर्शनी) के उस समय किया जाता है। बेगम हजरत महल पार्क को अवध के आखिरी नवाब, नवाब वाजिद अली शाह की बेगम की स्‍म‍ृति में उनके नाम पर ही बनवाया गया था। यह पार्क शहर के केंद्र में होटल क्‍लॉर्क अवध के पास में खडा है। जब नवाब को कलकत्‍ता भेज दिया था तो बेगम हजरतमहल ने ही लखनऊ के मामलों का प्रभार संभाला हुआ था।

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बेगम हजरत महल का मृत्यु कैसे हुवा – Begum Hazrat Mahal Death

अंग्रेजों के खिलाफ बहादुरी से जंग लड़ी थी और इसके चलते उन्‍हे नेपाल में शरण लेनी पड़ी थी, फिर 1879 में उन्ही की मृत्‍यु हो गई थी।

  • स्मारक :

आजादी के पश्‍चात्, भारत सरकार ने बेगम हजरत महल की याद में एक स्‍मारक का बनावट करवाया और उसे 15 अगस्‍त 1962 को आम जनता के लिए खोल दिया गया 

इस स्‍मारक में एक संगमरमर की टेबल है जिसमें चार सर्कुलर पीतल की प्‍लेट और भुजाओं के कोट सजे हुए है जो अवध के शाही परिवार के है। 

Begum Hazrat Mahal का जीवन परिचय

बेगम हजरत महल के रोचक तथ्य

  • रानी बेगम हजरत महल को उनके माता-पिता ने उन्हें शाही दलालों को बेच दिया गया था। 
  • बेगम हजरत महल ने विनम्र स्वभाव और बहुत ही खूबसूरत थी। लेकिन उनका नेतृत्व, युद्ध कौशल और गुण भी अजीब मौजूद थे। बेगम हजरत महल एक बेहतरीन कुशल रणनीतिकार योद्धा थी।
  • 18 57 के विद्रोह के दौरान लखनऊ का नेतृत्व  बेगम हजरत महल ने किया था। 
  • अवध के शासक वाजिद अली शाह की पहली पत्नी [बेगम] थी, जिन्हें अवध की महारानी ओर आन-बान शान मानते थे। 
  • बेगम हज़रत महल का मक़बरा जामा मस्जिद, घंटाघर के नजदीक काठमांडू के बिच में स्थित है। 

Begum Hazrat Mahal Questions – 

1 .बेगम हजरत महल का असली नाम क्या था ?

बेगम हजरत महल का ओरिजनल नाम मुहम्मदी खानुम था।

2 .बेगम हजरत महल का दूसरा नाम क्या था ?

बेगम हजरत महल का दूसरा नाम मुहम्मदी खानुम था।

3 .बेगम हजरत महल के पिता का नाम क्या था ?

बेगम हजरत महल के पिताजी का नाम गुलाम हुसैन था। 

4 .बेगम हजरत महल का जन्म कब हुआ था ?

बेगम हजरत महल का जन्म 1820 में फैज़ाबाद, अवध, भारत में हुआ था 

5 .1857 के विद्रोह के दौरान लखनऊ का नेतृत्व करने वाली बेगम हजरत महल का वास्तविक नाम क्या था ?

1857 के विद्रोह के दौरान लखनऊ का नेतृत्व करने वाली बेगम हजरत महल का वास्तविक नाम मुहम्मदी खानुम था। 

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Conclusion –

आपको मेरा Begum Hazrat Mahal Biography In Hindi बहुत अच्छी तरह से समज आया होगा। 

लेख के जरिये 1857 revolt begum hazrat mahal real name और begum hazrat mahal slogan in hindi से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दी है।

अगर आपको अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है। तो कमेंट करके जरूर बता सकते है।

हमारे आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शयेर जरूर करे। जय हिन्द।

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