Maharaja Surajmal Biography In Hindi – महाराजा सूरजमल की जीवनी

नमस्कार मित्रो आज के हमारे लेख में आपका स्वागत है ,आज हम Maharaja Surajmal Biography In Hindi में सबको भरतपुर के स्थापक ओर शाषक महाराजा सूरजमल का जीवन परिचय बताने वाले है। 

भरतपुर में उपस्थित लोहागढ़ किला देश का एकमात्र किला है, जो विभिन्न आक्रमणों के बावजूद हमेशा अजेय व अभेद्य रहा है । अपने पिता बदनसिंह की मृत्यु के बाद महाराजा सूरजमल जाट 1756 ई. में भरतपुर राज्य का शासक बने थे। आज हम महाराजा सूरजमल की कथा में maharaja surajmal institute ,maharaja surajmal height and weight और maharaja surajmal gotra से सम्बंधित जानकारी लेके आपको बताने की कोशिश करेंगे। 

वह अपनी राजनैतिक कुशलता और कुशाग्र बुद्धि के कारण उन्हें जाट जाति का प्लेटों भी कहा जाता है। ऐसा कहे तो कुछ गलत नहीं है की महाराजा सूरजमल का उपनाम प्लेटों था। महाराजा सूरजमल की वंशावली से जुडी सभी रोचक जानकारी और तथ्य बहुत चर्चित हुए है , महान राजा महाराजा सूरजमल शायरी बहुत पसंद थी ,तो चलिए शुरू करते है राजा की जीवन की कहानी बताते है। 

नाम  सूरजमल
जन्म  13 फरवरी 1707
पिता  बदन सिंह
माता  महारानी देवकी
पत्नी  महारानी किशोरी देवी
संतान  जवाहर सिंह
 नाहर सिंह
 रतन सिंह
 नवल सिंह
 रंजीत सिंह
शासनावधि  1755 – 1763 AD
राज्याभिषेक  डीग, 22 May 1755

Maharaja Surajmal Biography In Hindi –

महाराजा सूरजमल का जन्म maharaja surajmal birthday 13 फरवरी 1707 में हुआ था, यह इतिहास की वही तारीख है, जिस दिन हिन्दुस्तान के बादशाह औरंगजेब की मृत्यु हुई थी। मुगलों के आक्रमण का मुंह तोड़ जवाब देने में उत्तर भारत में जिन राजाओं का विशेष स्थान रहा है, उनमें राजा सूरजमल का नाम सबसे पहले आता है। महाराजा सूरजमल राजा बदनसिंह के बेटे थे। महाराजा सूरजमल कुशल प्रशासक, दूरदर्शी और कूटनीति के धनी सम्राट थे। अट्ठारवीं शताब्दी को भारतीय इतिहास की सबसे अस्थिर, उथल-पुथल से भरी और डांवाडोल शताब्दी माना जाता है। इस शताब्दी के जिस रियासती शासक में वीरता, धीरता, गम्भीरता, उदारता,सतर्कता, दूरदर्शिता, सूझबूझ,चातुर्य और राजमर्मज्ञता का सुखद संगम सुशोभित था वो महाराजा सूरजमल थे।

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महाराजा सूरजमल का प्रारंभिक जीवन  –

महाराजा सूरजमल अन्य राज्यों की तुलना में हिन्दुस्तान का सबसे शक्तिशाली शासक थे। महाराजा सूरजमल की सेना में 1500 घुड़सवार व 25 हजार पैदल सैनिक थे। मराठा नेता होलकर ने 1754 में कुम्हेर पर आक्रमण कर दिया। महाराजा सूरजमल ने नजीबुद्दोला द्वारा अहमद शाह अब्दाली के सहयोग से भारत को मजहबी राष्ट्र बनाने को कोशिश को भी फैल कर दिया था। Maharaja Surajmal ने अफगान सरदार असंद खान, मीर बख्शी, सलावत खां आदि को पराजित किया। 1757 में अहमद शाह अब्दाली दिल्ली पहुच गया और उनकी सेना ने ब्रज के तीर्थ को नष्ट करने के लिए आक्रमण किया था । 

उसको बचाने के लिए सिर्फ महाराजा सूरजमल ही आगे आये और उनके सैनिको ने बलिदान दिया। इसके बाद में अब्दाली वापस लौट गया। जब सदाशिव राव भाऊ अहमद शाह अब्दाली को पराजित करने के उद्देश्य से आगे बढ़ रहा था, तभी खुद पेशवा बालाजी बाजीराव ने भाऊ को सुझाव दिया उत्तर भारत में मुख शक्ति के रूप में उभर रहे महाराजा सूरजमल का सम्मान कर उनके सुझाव पर ध्यान दिया जाए। परंतु भाऊ ने युद्ध सम्बन्धी इस सुझाव पर कोई ध्यान नही दिया और अब्दाली के हाथों पराजित हो गए थे। 

दिल्ली की लूट –

सल्तनत काल से मुग़लकाल तक लगभग छह सौ सालों में ब्रज पर आयीं मुसीबतों का कारण दिल्ली के मुस्लिम शासक थे, इस कारण ब्रज में इन शासकों के लिए बदले, क्रोध और हिंसा की भावना थी जिसका किए गये विद्रोहों से पता चलता है। दिल्ली प्रशासन के सैनिक अधिकारी अपनी धर्मान्धता की वजह से लूटमार थे। Maharaja Surajmal के समय में परिस्थितियाँ बदल गईं थी। यहाँ के वीर व साहसी पुरुष किसी हमलावर से स्वसुरक्षा में ही नहीं, बल्कि उस पर हमला करने में ख़ुद को काबिल समझने लगे थे ।

सूरजमल द्वारा की गई ‘दिल्ली की लूट’ का विवरण उनके राजकवि सूदन द्वारा रचित ‘सुजान चरित्र’ में मिलता है। सूदन ने लिखा है कि महाराजा सूरजमल ने अपने वीर एवं साहसी सैनिकों के साथ सन् 1753 के बैसाख माह में दिल्ली कूच किया। मुग़ल सम्राट की सेना के साथ राजा सूरजमल का संघर्ष कई माह तक होता रहा और कार्तिक के महीने में राजा सूरजमल दिल्ली में दाखिल हुआ। दिल्ली उस समय मुग़लों की राजधानी थी। दिल्ली की लूट में उसे अथाह सम्पत्ति मिली, इसी घटना का विवरण काव्य के रूप में ‘सुजान−चरित्र’ में इस प्रकार किया है। 

महाराजा सूरजमल का यह युद्ध जाटों का ही नहीं वरन् ब्रज के वीरों की मिलीजुली कोशिश का परिणाम था। इस युद्ध में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के अलावा गुर्जर, मैना और अहीरों ने भी बहुत उल्लास के साथ भाग लिया। सूदन ने लिखा है।  इस युद्ध में गोसाईं राजेन्द्र गिरि और उमराव गिरि भी अपने नागा सैनिकों के साथ शामिल थे। महाराजा सूरजमल को दिल्ली की लूट में जो अपार धन मिला था, उसे जनहित कार्यों और निर्माण कार्यों में प्रयोग किया गया। दिल्ली विजय के बाद महाराजा सूरजमल ने गोवर्धन जाकर श्री गिरिराज जी की पूजा थी; और मानसी गंगा पर दीपोत्सव मनाया था। 

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मराठों की गतिविधियाँ –

जब ब्रज और उसके आस पास महाराजा सूरजमल का साम्राज्य था, उसी समय मराठा पेशवाओं की सैनिक गतिविधियाँ भी तेज़ हो गयीं। पेशवाओं की शक्ति का विस्तार दक्षिण से दिल्ली तक हो गया था और मुग़ल शासक भी भयभीत था। ऐसे समय में सूरजमल को मुग़लों के साथ साथ मराठों से भी अपने राज्य की रक्षा और अधिकार के लिए लड़ना पड़ा। उसकी शक्ति धीरे धीरे क्षीण हो रही थी। 

महाराजा सूरजमल की उदारता – Maharaj Surajmal’s generosity

14 जनवरी 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई मराठों और अहमदशाह अब्दाली के बीच हुई थी । मराठों के एक लाख सैनिकों में से आधे से ज्यादा मारे गए। मराठों के पास न तो पूरा राशन था और न ही इस इलाके का उन्हें भेद था, कई-कई दिन के भूखे सैनिक क्या युद्ध करते ? अगर सदाशिव राव महाराजा सूरजमल से छोटी-सी बात पर तकरार न करके उसे भी इस जंग में साझीदार बनाता, तो आज भारत की तस्वीर और ही होती थी | Maharaja Surajmal ने फिर भी दोस्ती का हक अदा किया। तीस-चालीस हजार मराठे जंग के बाद जब वापस जाने लगे तो सूरजमल के इलाके में पहुंचते-पहुंचते उनका बुरा हाल हो गया था। 

जख्मी हालत में, भूखे-प्यासे वे सब मरने के कगार पर थे और ऊपर से भयंकर सर्दी में भी मरे, आधों के पास तो ऊनी कपड़े भी नहीं थे। दस दिन तक सूरजमल नें उन्हें भरतपुर में रक्खा, उनकी दवा-दारू करवाई और भोजन और कपड़े का इंतजाम किया। महारानी किशोरी ने भी जनता से अपील करके अनाज आदि इक्ट्ठा किया। सुना है कि कोई बीस लाख रुपये उनकी सेवा-पानी में खर्च हुए। जाते हुए हर आदमी को एक रुपया, एक सेर अनाज और कुछ कपड़े आदि भी दिये ताकि रास्ते का खर्च निकाल सकें।

कुछ मराठे सैनिक लड़ाई से पहले अपने परिवार को भी लाए थे और उन्हें हरयाणा के गांवों में छोड़ गए थे। उनकी मौत के बात उनकी विधवाएं वापस नहीं गईं। बाद में वे परिवार हरयाणा की संस्कृति में रम गए। महाराष्ट्र में ‘डांगे’ भी जाटवंश के ही बताये जाते हैं और हरयाणा में ‘दांगी’ भी उन्हीं की शाखा है। मराठों के पतन के बाद महाराजा सूरजमल ने गाजियाबाद, रोहतक, झज्जर के इलाके भी जीते। 1763 में फरुखनगर पर भी कब्जा किया। वीरों की सेज युद्धभूमि ही है। 

Maharaja Surajmal के जन्म से जुड़ा लोकगीत –

‘आखा’ गढ गोमुखी बाजी, माँ भई देख मुख राजी ,

धन्य धन्य गंगिया माजी, जिन जायो सूरज मल गाजी ,

भइयन को राख्यो राजी, और चाकी चहुं दिस नौबत बाजी। 

वह राजा बदनसिंह के पुत्र थे. महाराजा सूरजमल कुशल प्रशासक, दूरदर्शी और कूटनीति के धनी सम्राट थे. सूरजमल किशोरावस्था से ही अपनी बहादुरी की वजह से ब्रज प्रदेश में सबके चहेते बन गये थे. सूरजमल ने सन 1733 में भरतपुर रियासत की स्थापना की थी। 

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अब्दाली के आक्रमण –

इसी समय अहमदशाह अब्दाली ने देश पर हमला कर दिया, मराठों ने उधर ध्यान नहीं दिया वे जाटों और राजपूतों से लड़कर कमज़ोर होते रहे। मराठों ने जहाँ ख़ुद को कमज़ोर किया वहीं राजपूतों को भी कमज़ोर किया और अहमदशाह अब्दाली को आक्रमण करने का मौक़ा दे दिया ।

लूट के बाद का ब्रज –

अब्दाली की लूटमार सन् 1756−57 में हुई थी। किसी ने भी लुटेरों का विरोध नहीं किया। लुटेरे आये और दिल्ली से आगरा तक के ही समृद्धिशाली राज्य को लूट कर चले गये। औरंगजेब के अत्याचारों से सहमा ब्रजमंड़ल लम्बे समय तक संभल नहीं पाया। ऐसी परिस्थिति में मराठा सरदार चुप्पी लगा गये और सूरजमल अपने क़िले में छिपा रहा। इसके बाद अब्दाली ने कई हमले किये, जिनमें वह हमेशा कामयाब रहा था। 

पानीपत की लड़ाई –

सन 1761 में पानीपत का ऐतिहासिक युद्ध हुआ, जिसमें राजपूत−जाट−मराठा जैसे शक्तिशाली और वीर सैनिकों के होते हुए भी देश को हार का सामना करना पड़ा। मुख्य कारण हिन्दू शासकों का आपस में मेल न होना था। अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों से सबक़ लेकर मराठों और जाटों ने संधि की; लेकिन वे राजपूतों से गठजोड़ करने में कामयाब नहीं हुए। वे अपने ही बलबूते पर अब्दाली को ख़त्म करने के लिए प्रतिज्ञाबध्द थे। इस लड़ाई में मराठा सरदार सदाशिवराव भाऊ और सूरजमल नीतिगत मतभेद हो गये थे। 

भाऊ ने सूरजमल के साथ अपमान पूर्ण वार्ता की थी । सूरजमल नाराज़ होकर अपनी सेना के साथ वापिस चला गया। मराठा सरदार को अपनी ताक़त पर बहुत भरोसा था, उसने जाटों की बिल्कुल परवाह नहीं की। युद्ध में अफ़ग़ान सैनिक और भारत के मुसलमान रूहेले थे, जो लगभग 62 हज़ार थे, दूसरी तरफ अकेले मराठा सैनिक थे, जिनकी संख्या 45 हज़ार थीं। दोनों सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ।

उसमें मराठाओं ने बहुत वीरता दिखलाई; किंतु संख्या की कमी और प्रबंधकीय शिथिलता होने के कारण मराठा हार गये। उस युद्ध में सैनिक बहुत संख्या में मारे गये। भरतपुर के ‘मथुरेश’ कवि ने इस स्थिति पर दु:ख जताते हुए कहा है। होती न हीन दशा हिन्दी−हिन्द−हिन्दुओं की, मानता जो भाऊ, कहीं सम्मति सुजान की थी । पानीपत के युद्ध में पराजित और घायल सैनिकों के खान−पान और सेवा−शुश्रुषा और दवा−दारू की व्यवस्था सूरजमल की ओर से की गई थी।

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महाराजा सूरजमल के शौर्य गाथाएं –

Maharaja Surajmal का जयपुर रियासत के महाराजा जयसिंह से अच्छा रिश्ता था. जयसिंह की मृत्यु के बाद उसके बेटों ईश्वरी सिंह और माधोसिंह में रियासत के वारिश बनने को लेकर झगड़ा शुरु हो गया। सूरजमल बड़े पुत्र ईश्वरी सिंह को रियासत का अगला वारिस बनाना चाहते थे, जबकि उदयपुर रियासत के महाराणा जगतसिंह छोटे पुत्र माधोसिंह को राजा बनाने के पक्ष में थे। इस मतभेद की स्थिति में गद्दी को लेकर लड़ाई शुरु हो गई. मार्च 1747 में हुए संघर्ष में ईश्वरी सिंह की जीत हुई. लड़ाई यहां पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। 

माधोसिंह मराठों, राठोड़ों और उदयपुर के सिसोदिया राजाओं के साथ मिलकर वापस रणभूमि में आ गया. ऐसे माहौल में राजा सूरजमल अपने 10,000 सैनिकों को लेकर रणभूमि में ईश्वरी सिंह का साथ देने पहुंच गये। सूरजमल को युद्ध में दोनों हाथो में तलवार ले कर लड़ते देख राजपूत रानियों ने उनका परिचय पूछा तब सूर्यमल्ल मिश्र ने जवाब दिया था ‘नहीं जाटनी ने सही व्यर्थ प्रसव की पीर,और जन्मा उसके गर्भ से सूरजमल सा वीर’ .

जाटों का विस्तार –

पानीपत में अफ़ग़ानी पठानों और रूहेलों की जीत ज़रूर हुई ; लेकिन हानि मराठाओं से कम नहीं हुई। अहमदशाह अब्दाली अफ़ग़ानिस्तान लौट गया। रूहेले भी थके होने से प्रभावशाली क़दम उठाने में असमर्थ थे। पराजय से मराठों की तो जैसे कमर ही टूट गई थी । हालांकि वे शीघ्र ही फिर से बलशाही हो गये थे, निजाम दक्षिणी शक्तियों का दमन करने के कारण उत्तर की ओर देखने की स्थिति में नहीं थे। यह परिस्थितियाँ सूरजमल को अपनी शक्ति विस्तृत करने के लिए अनुकूल लगी थी। पानीपत से बिना लड़े वापिस आने से उसकी शक्ति सुरक्षित थी।

सूरजमल ने मुग़लों की राजधानी आगरा को लूटा और अधिकार कर अपने राज्य में मिला लिया।  इसके बाद हरियाणा के बलूची शासक मुसब्बीख़ाँ पर हमला कर उसे हराया और कैद कर भरतपुर भेज दिया। उसकी राजधानी फर्रूखनगर को उसने अपने बड़े पुत्र जवाहर सिंह को सौंपा और उसे मेवाती क्षेत्र का स्वामी बना दिया। आगरा से लेकर दिल्ली के पास तक सूरजमल की तूती बोलने लगी। उसे अपने अधिकृत क्षेत्र की प्रभु−सत्ता को दिल्ली के मुग़ल सम्राट् से स्वीकृत कराना था। उस समय शक्तिहीन मुग़ल सम्राट का संरक्षक उसका शक्तिशाली रूहेला वज़ीर नजीबुद्धोला था, जिसे अहमदशाह अब्दाली का भी समर्थन प्राप्त था।

वह जाटों का कट्टर बैरी था।  उसने मुग़ल सम्राट की ओर से जाट राजा की इस माँग को ठुकरा दिया। सूरजमल ने अपने अधिकार को स्वीकृत कराने के उद्देश्य से अपनी सेना को दिल्ली चलने का आदेश किया।  रूहेला वज़ीर भी जाटों का सामना करने की तैयारी करने लगा। उसने अहमदशाह अब्दाली और अन्य रूहेले सरदारों के पास संदेश भेजकर सहायतार्थ दिल्ली आने का निमन्त्रण भेजा।  फिर उसने चारों ओर के फाटक बंद करा कर उसकी समुचित रक्षा के लिए शाही सेना को तैनात कर दिया। जाट सेना ने दिल्ली पहुँच कर उसे चारों ओर से घेर लिया था 

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महाराजा सूरजमल की मृत्यु – Maharaja Surajmal Death

रूहेला वज़ीर अब्दाली की सेना आने तक युद्ध को टालना चाहता था; किंतु सूरजमल इसके लिए तैयार न था। जाटों की सेना दिल्ली के निकट यमुना और हिंडन नदियों के दोआब में एकत्र थी और शाही सेना दिल्ली नगर की चारदीवारी के अंदर थी। सूरजमल की सेना की एक टुकड़ी ने दिल्ली पर गोलाबारी आरंभ कर दी। जवाब देने के लिए शाही सेना को भी बाहर आकर मोर्चा ज़माना पड़ा; किंतु उन्हें जाटों की मार के कारण पीछे हटना पड़ा।

उसी समय सूरजमल ने केवल 30 घुड़सवारों के साथ शत्रु की सेना में घुसने की दुस्साहसपूर्ण मूर्खता कर डाली और व्यर्थ में ही अपनी जान गँवानी पड़ी। Maharaja Surajmal  की मृत्यु अचानक और अप्रत्याशित ढंग से हुई। एक विवरण के अनुसार सूरजमल अपने कुछ घुड़सवारों के साथ युद्ध स्थल का निरीक्षण कर रहा था कि अचानक ही वह शत्रु सेना से घिर गया। उसने अपने मुट्ठी भर सैनिकों से एक बड़ी सेना का सामना किया और वीरता पूर्वक युद्ध करता हुआ मारा गया।[3] महाराजा सूरजमल बलिदान दिवस सं. 1820 (ता. 25 दिसंबर सन् 1763 रविवार) है । उस समय उसकी आयु 55 वर्ष की थी। 

Maharaja Surajmal ka Itihas –

Maharaja Surajmal Fact –

  • सूरजमल द्वारा की गई ‘दिल्ली की लूट’ का विवरण उनके राजकवि सूदन द्वारा रचित ‘सुजान चरित्र’ में मिलता है।
  • रियासती शासक में वीरता, धीरता, गम्भीरता, उदारता,सतर्कता, दूरदर्शिता, सूझबूझ,चातुर्य और राजमर्मज्ञता का सुखद संगम सुशोभित था वो महाराजा सूरजमल थे। 
  • महाराजा सूरजमल की सेना में 1500 घुड़सवार व 25 हजार पैदल सैनिक थे। मराठा नेता होलकर ने 1754 में कुम्हेर पर आक्रमण कर दिया।
  • महाराजा सूरजमल को दिल्ली की लूट में जो अपार धन मिला था, उसे जनहित कार्यों और निर्माण कार्यों में प्रयोग किया गया।

Maharaja Surajmal

1 .महाराजा सूरजमल का उपनाम क्या था ?

सूरजमल  को बृजराज की उपाधि दी गयी थी। 

2 .महाराजा सूरजमल की मृत्यु कब हुई ?

25 दिसंबर सन् 1763 रविवार के दिन महाराजा सूरजमल की मृत्यु हुई थी। 

3 .महाराजा सूरजमल का दूसरा नाम ?

सूरजमल का दूसरा नाम सूजन सिंह था। 

4 .महाराजा सूरजमल का बचपन का नाम ?

सूरजमल का बचपन का नाम सुजान सिंह था

5 .महाराजा सूरजमल का अन्य नाम क्या था ?

 सूरजमल का अन्य नाम सुजान सिंह ओर बृजराज भी कहते थे। 

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निष्कर्ष – 

दोस्तों आशा करता हु आपको मेरा यह आर्टिकल maharaja surajmal history in hindi आपको बहुत अच्छी तरह से समज आ गया होगा और पसंद भी आया होगा । इस लेख के जरिये  हमने maharaja surajmal family tree और maharaja surajmal status से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दे दी है अगर आपको इस तरह के अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है तो आप हमें कमेंट करके जरूर बता सकते है। और हमारे इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करे। जय हिन्द ।

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