Rana Ratan Singh Biography In Hindi | राणा रतन सिंह की जीवनी

नमस्कार मित्रो आज के हमारे आर्टिकल में आपका स्वागत है ,आज हम Rana Ratan Singh Biography In Hindi में गुहिल वंश चित्तौड़गढ़ के महान प्रतापी महाराजा जो अपनी राजपूताना बहादुरी के लिए पहचाने जाने वाले राणा रतनसिंह का जीवन परिचय बताने वाले है।

तेरहवीं शताब्दी की शुरुआती वर्षो में चित्तौर की राजगद्दी सँभालने वाले बप्पा रावल के गुहिलौत वंश के अंतिम शासक और रावल समरसिंह के पुत्र रावल रत्नसिंह थे। उनका राज्याभिषेक 1301ई० में मानाजाता है। गुहिल वंश के वंशज रतनसिंह के वंश की शाखा रावल से सम्बंधित है , उन्होंने चित्रकूट के किले पर राज कीया था वह अब चित्तौड़गढ़ कहजता है ,रतन सिंह अपनी राजपूताना बहादुरी से पुरे विस्व  प्रसिद्ध हुए है।

आज हम Maharana ratan singh wife पद्मिनी ,rana ratan singh son name और rana ratan singh family tree से जुडी सभी माहिती से आपको महितगार कराने वाले है। राणा रतनसिंह के शासनकाल के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। लेकिन मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा लिखी गई कविता ‘पद्मावती’ में मिलती है। मोहम्मद जायसी ने ये कविता सन् 1540 में लिखी थी। राजस्थान के महान प्रतापी राजा राणा रतन सिंह के कितने पुत्र थे ? रतन सिंह का खेड़ा किसे कहते है जैसे कई सवालों के जवाब आज की पोस्ट में सबको मेवाड़ का इतिहास बताने वाले है। 

Rana Ratan Singh Biography In Hindi –

नाम रावल रतन सिंह
जन्म 13 वीं सदी के मध्य (मलिक मोहम्मद जायसी के पद्मावत के अनुसार)
जन्म स्थान चित्तौड़, (वर्तमान में चित्तौड़गढ़) राजस्थान
पिता समरसिह
पत्नी रानी पद्मिनी
धार्मिक मान्यता हिन्दू धर्म 
राजधानी चित्तौड़गढ़
राजघराना राजपूत (चित्तोड़ का इतिहास)
वंश  गुहिलौत राजवंश
मृत्यु 14 वीं शताब्दी (1303) के प्रारम्भ में (मलिक मोहम्मद जायसी के पद्मावत के अनुसार)

राणा रतन सिंह की जीवनी –

रावल रतन सिंह का जन्म 13वी सदी के अंत में हुआ था ,उनकी जन्म तारीख इतिहास में कही उपलब्ध नही है , रतनसिंह राजपूतो की रावल वंश के वंशज थे। जिन्होंने चित्रकूट किले (चित्तोडगढ) पर शासन किया था , रतनसिंह ने 1302 ई. में अपने पिता समरसिंह के स्थान पर गद्दी सम्भाली , जो मेवाड़ के गुहिल वंश के वंशज थे , रतनसिंह को राजा बने मुश्किल से एक वर्ष भी नही हुआ कि अलाउदीन ने चित्तोड़ पर चढाई कर दी , और तो और वह घेरा से सुल्तान ने 6 महीने तक इनके किले पर अधिकार जमाया था।

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राणा रतनसिंह का प्रारंभिक जीवन –

छ महीने तक घेरा करने के बाद सुल्तान ने दुर्ग पर अधिकार तो कर लिया ,लेकिन इस जीत के बाद एक ही दिन में 30 हजार हिन्दुओ को बंदी बनाकर उनका संहार किया गया | जिया बर्नी तारीखे फिरोजशाही में लिकता है कि 4 महीने में मुस्लिम सेना को भारी नुकसान पहुचा था। अपने पिता समर सिंह की मुत्यु के बाद रतन सिंह ने राजगद्दी पर 1302 सीई. में अपने राज्य की भागदौड़ अपने हाथ लेली और उस पर उन्होंने 1303 सीई तक शासन किया था।  1303 सीई में दिल्ली सल्तनत के सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने उन्हें पराजित कर उनकी गद्दी पर कब्जा कर लिया था। 

रानी पद्मिनी से विवाह – Ratan Singh

रावल समरसिंह के बाद रावल रतन सिंह चित्तौड़ की राजगद्दी पर बैठा। रावल रतन सिंह का विवाह रानी पद्मिनी के साथ हुआ था। रानी पद्मिनी के रूप, यौवन और जौहर व्रत की कथा, मध्यकाल से लेकर वर्तमान काल तक चारणों, भाटों, कवियों, धर्मप्रचारकों और लोकगायकों द्वारा विविध रूपों एवं आशयों में व्यक्त हुई है। रतन सिंह की रानी पद्मिनी अपूर्व सुन्दर थी। उसकी सुन्दरता की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। उसकी सुन्दरता के बारे में सुनकर दिल्ली का तत्कालीन बादशाह अलाउद्दीन ख़िलज़ी पद्मिनी को पाने के लिए लालायित हो उठा और उसने रानी को पाने हेतु चित्तौड़ दुर्ग पर एक विशाल सेना के साथ चढ़ाई कर दी थी। 

अलाउद्दीन ख़िलज़ी और पद्मिनी –

राणा रतन सिंह का इतिहास देखे तो उसने चित्तौड़ के क़िले को कई महीनों घेरे रखा पर चित्तौड़ की रक्षार्थ पर तैनात राजपूत सैनिकों के अदम्य साहस व वीरता के चलते कई महीनों की घेरा बंदी व युद्ध के बावज़ूद वह चित्तौड़ के क़िले में घुस नहीं पाया। तब अलाउद्दीन ख़िलज़ी ने कूटनीति से काम लेने की योजना बनाई और अपने दूत को चित्तौड़ रतनसिंह के पास भेज सन्देश भेजा कि हमारे साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहते हे , रानी की सुन्दरता के बारे में बहुत सुना है सो हमें तो सिर्फ एक बार रानी का मुँह दिखा दीजिये हम घेरा उठाकर दिल्ली वापस लौट जायेंगे।”

रतनसिंह ख़िलज़ी का यह सन्देश सुनकर आगबबूला हो उठे पर रानी पद्मिनी ने इस अवसर पर दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अपने पति रत्नसिंह को समझाया कि मेरे खातिर चित्तोड़ के किसी भी सैनिक का रक्त नहीं बहाना चाहिए ,रानी को अपनी नहीं पूरे मेवाड़ की चिंता थी वह नहीं चाहती थीं कि उसके चलते पूरा मेवाड़ राज्य तबाह हो जाये और प्रजा को भारी दुःख उठाना पड़े क्योंकि मेवाड़ की सेना अलाउद्दीन की विशाल सेना के आगे बहुत छोटी थी। रानी ने बीच का रास्ता निकालते हुए कहा कि अलाउद्दीन रानी के मुखड़े को देखने के लिए इतना बेक़रार है तो दर्पण में उसके प्रतिबिंब को देख सकता है।

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ख़िलजी और रतन सिंह की लड़ाई –

Rana rawal ratan singh जयपुर में हिस्ट्री के प्रोफेसर राजेंद्र सिंह खंगरोट बताते हैं कि ‘ अलाउद्दीन ख़िलजी और Maharawal ratan singh के टकराव को अलग करके नहीं देखा जा सकता ये सत्ता के लिए संघर्ष था जिसकी शुरुआत मोहम्मद गोरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच साल 1191 में होती है। जयगढ़, आमेर और सवाई मान सिंह पर किताब लिख चुके खंगरोट ने कहा, ”तुर्कों और राजपूतों के बीच टकराव के बाद दिल्ली सल्तनत और राजपूतों के बीच संघर्ष शुरू होता है। इनके बाद ग़ुलाम से शहंशाह बने लोगों ने राजपुताना में पैर फैलाने की कोशिश की थी। 

कुत्तुबुद्दीन ऐबक अजमेर में सक्रिय रहे. इल्तुत्मिश जालौर, रणथंभौर में सक्रिय रहे , बल्बन ने मेवाड़ में कोशिश की, लेकिन कुछ ख़ास नहीं कर सके। उन्होंने कहा कि संघर्ष पहले से चल रहा था और फिर ख़िलजी आए जिनका कार्यकाल रहा 1290 से 1320 के बीच. ख़िलजी इन सब में सबसे महत्वाकांक्षी माने जाते हैं। चित्तौड़ के बारे में साल 1310 का ज़िक्र फ़ारसी दस्तावेज़ों में मिलता है जिनमें साफ़ इशारा मिलता है कि ख़िलजी को ताक़त चाहिए थी और चित्तौड़ पर हमला राजनीतिक कारणों की वजह से किया गया था। 

ऐतिहासिक उल्लेख –

Rana Ratna singh अलाउद्दीन ख़िलज़ी के साथ चित्तौड़ की चढ़ाई में उपस्थित अमीर खुसरो ने एक इतिहास लेखक की स्थिति से न तो ‘तारीखे अलाई’ में और न सहृदय कवि के रूप में अलाउद्दीन के बेटे खिज्र ख़ाँ और गुजरात की रानी देवलदेवी की प्रेमगाथा ‘मसनवी खिज्र ख़ाँ’ में ही इसका कुछ संकेत किया है। इसके अतिरिक्त परवर्ती फ़ारसी इतिहास लेखकों ने भी इस संबध में कुछ भी नहीं लिखा है। केवल फ़रिश्ता ने 1303 ई. में चित्तौड़ की चढ़ाई के लगभग 300 वर्ष बाद और जायसीकृत ‘पद्मावत की रचना की हुई है।

70 वर्ष पश्चात् सन् 1610 में ‘पद्मावत’ के आधार पर इस वृत्तांत का उल्लेख किया जो तथ्य की दृष्टि से विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता। गौरीशंकर हीराचंद ओझा का कथन है कि पद्मावत, तारीखे फ़रिश्ता और टाड के संकलनों में तथ्य केवल यही है कि चढ़ाई और घेरे के बाद अलाउद्दीन ने चित्तौड़ को विजित किया, वहाँ का राजा रतनसिंह मारा गया और उसकी रानी पद्मिनी ने राजपूत रमणियों के साथ जौहर की अग्नि में आत्माहुति दे दी थी। 

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राजा रतन सिंह और अलाउद्दीन खिलजी का युद्ध –

चित्तौड़ का क़िला सामरिक दृष्टिकोण से बहुत सुरक्षित स्थान पर बना हुआ था। इसलिए यह क़िला अलाउद्दीन ख़िलज़ी की निगाह में चढ़ा हुआ था। कुछ इतिहासकारों ने अमीर खुसरव के रानी शैबा और सुलेमान के प्रेम प्रसंग के उल्लेख आधार पर और ‘पद्मावत की कथा’ के आधार पर चित्तौड़ पर अलाउद्दीन के आक्रमण का कारण रानी पद्मिनी के अनुपम सौन्दर्य के प्रति उसके आकर्षण को ठहराया है। 28 जनवरी, 1303 ई. को अलाउद्दीन ख़िलज़ी का चित्तौड़ के क़िले पर अधिकार हो गया था । राणा रतन सिंह युद्ध में शहीद हुआ और उसकी पत्नी रानी पद्मिनी ने अन्य स्त्रियों के साथ जौहर कर लिया।

क़िले पर अधिकार के बाद सुल्तान ने लगभग 30,000 राजपूत वीरों का कत्ल करवा दिया। उसने चित्तौड़ का नाम ख़िज़्र ख़ाँ के नाम पर ‘ख़िज़्राबाद’ रखा और ख़िज़्र ख़ाँ को सौंप कर दिल्ली वापस आ गया। चित्तौड़ को पुन स्वतंत्र कराने का प्रयत्न राजपूतों द्वारा जारी था। इसी बीच अलाउद्दीन ने ख़िज़्र ख़ाँ को वापस दिल्ली बुलाकर चित्तौड़ दुर्ग की ज़िम्मेदारी राजपूत सरदार मालदेव को सौंप दी। अलाउद्दीन की मृत्यु के पश्चात् गुहिलौत राजवंश के हम्मीरदेव ने मालदेव पर आक्रमण कर 1321 ई. में चित्तौड़ सहित पूरे मेवाड़ को आज़ाद करवा लिया। इस तरह अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद चित्तौड़ एक बार फिर पूर्ण स्वतन्त्र हो गया। 

चित्तोडगढ की घेराबंदी –

Raja Rawal ratan singh history in hindi देखे तो 28 जनवरी 1303 को अलाउदीन की विशाल सेना चित्तोड़ की ओर कुच करने निकली। किले के नजदीक पहुचते ही बेडच और गम्भीरी नदी के बीच उन्होंने अपना डेरा डाला था ,अलाउदीन की सेना ने चित्तोडगढ किले को चारो तरफ से घेर लिया। अलाउदीन खुद चितोडी पहाडी के नजदीक सब पर निगरानी रख रहा था। करीब 6 से 8 महीन तक घेराबंदी चलती रही। खुसरो ने अपनी किताबो में लिखा है कि दो बार आक्रमण करने में खिलजी की सेना असफल रही थी। 

जब बरसात के दो महीनों में खिलजी की सेना किले के नजदीक पहुच गयी लेकिन आगे नही बढ़ सकी थी ,तब अलाउदीन ने किले को पत्थरों के प्रहार से गिराने का हुक्म दिया था। 26 अगस्त 1303 को आखिरकार अलाउदीन किले में प्रवेश करने में सफल रहा था ,जीत के बाद खिलजी ने चित्तोडगढ की जनता के सामूहिक नरसंहार का आदेश दिया था। 

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Ratan Singh Death (राणा रतनसिंह की मृत्यु)

जायसी द्वारा लिखी गई ‘पद्मावती’ के अनुसार रतन सिंह को वीरगति अलाउद्दीन खिलजी के हाथों मिली थी. जो उस समय दिल्ली की राजगद्दी का सुल्तान था , किताब के मुताबिक राजा रतन सिंह के राज्य दरवारियों में राघव चेतन नाम का संगीतिज्ञ था ,एक दिन रतन सिंह को राघव चेतन के काला जादू करने की सच्चाई पता चली तो उन्होंने राघव को गधे पर बैठाकर पूरे राज्य में घुमाया ,अपनी इस बेइज्जती से गुस्साए राघव ने दिल्ली के सुलतान के जरिये बदला लेने की साजिश रची थी। 

राघव ने अपने गलत मंसूबों को कामयाब करने के पद्मावती के सौन्दर्य के बारे में खिलजी को बताया ,पद्मावती की सुंदरता का गुणगान सुन खिलजी ने उन्हें हासिल करने की ठान ली थी। रानी पद्मावती को पाने के लिए खिलजी ने सबसे पहले दोस्ती करने का तरीका रतन सिंह पर आजमाया और रतन सिंह के सामने उनकी पत्नी पद्मावती को देखने की अपनी ख्वाहिश भी बताई थी। रतन सिंह ने भी खिलजी की इस ख्वाहिश को मान लिया और रानी पद्मावती के चेहरे की छवि को आईने के जरिए खिलजी को दिखा दिया। हालांकि रानी पद्मावती रतन सिंह के इस फैसले से नाखुश थी। 

रानी पद्मावती का आत्मदाह – Padmavati story hindi

  • चित्तौड़गढ़ का इतिहास  देखे  तो एक पत्नी का धर्म निभाते हुए उन्होंने
  • रतन सिंह की ये बात अपनी कुछ शर्तों के साथ मान ली थी।
  • वहीं रानी की खूबसूरती की झलक देखकर खिलजी ने उनको पाने के लिए।
  • अपने सैनिकों की मदद से राजा रावल को उन्हीं के महल से तुरंत अगवा कर लिया था।
  • जिसके बाद राजा रतन सिंह को किसी तरह  सिपाहियों ने खिलजी की कैद से मुक्त करवाया था। 
  • खिलजी ने रतन सिंह के उनकी कैद से आजाद होने के बाद
  • रतन सिंह के किले पर हमलाकर किले को चारों ओर से घेर लिया था। 
  • किले को बाहर से कब्जा करने के कारण कोई भी चीज ना तो
  • किले से बाहर जा सकती थी ना ही किले के अंदर आ सकती थी।
  • वहीं धीरे-धीरे किले में रखा हुआ खाने का सामान भी खत्म होने लगा था।
  • अपने किले में बिगड़ते हुए हालातों को देखते हुए।
  • रतन सिंह ने किले से बाहर निकल बहादुरी से खिलजी से लड़ाई का फैसला किया।
  • रावल रतन सिंह का इतिहास देखे तो राणा रतन सिंह का युद्ध अंतिम था। 
  • वहीं जब खिलजी ने युद्ध में राजा को हरा दिया तो उनकी पत्नी रानी पद्मावती ने
  • अपने राज्यों की कई औरतों समेत जौहर (आत्मदाह) किया था। 

Rana Ratan Singh History in Hindi Video –

Rawal Ratan Singh Biography in Hindi

Rana Ratan Singh Facts

  • इतिहासकारों शैबा और सुलेमान के प्रेम प्रसंग के उल्लेख आधार पर
  • और ‘पद्मावत की कथा’ के  आधार पर चित्तौड़ पर अलाउद्दीन के
  • आक्रमण का कारण रानी पद्मिनी के अनुपम सौन्दर्य के
  • प्रति उसके आकर्षण को ठहराया है।
  • राणा रतनसिंह के शासनकाल के बारे में ज्यादा जानकारी मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा
  • लिखी गई कविता ‘पद्मावती’ में मिलती है
  • अलाउद्दीन ख़िलज़ी राणा रतनसिंह की महारानी  पद्मिनी को पाने के लिए लालायित हो उठा था। 
  • उसने रानी को पाने हेतु चित्तौड़ दुर्ग पर एक विशाल सेना के साथ चढ़ाई कर दी थी।
  • राजा रतनसिंह वीरगति होने के बाद उस की स्वरुपवान रानी पद्मिनी ने राजपूत रमणियों के
  • साथ जौहर की अग्नि में आत्माहुति दे दी थी।  

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राणा रतनसिंह के प्रश्न –

1 .अलाउद्दीन खिलजी को किसने मारा था ?

अलाउद्दीन के नाजायज संबंध थे वह मलिक काफूर ने ही खिलजी को जहर देकर मार दिया था। 

2 .मेवाड़ का शासक कौन था ?

राजा रतन सिंह राजस्थान मेवाड़ के राजा थे जिन्हे गुहिल वंश

की रावल शाखा के अंतिम शासक कहे जाते है। 

3 .रतन सिंह के पिता का नाम क्या था ?

राजा रतन सिंह के पिताजी का नाम समरसिह था। 

4 .रतन सिंह की पत्नी का क्या नाम था ?  

रतन सिंह  का नाम पद्मिनी और उन्हें ने स्वयंवर में रानी पद्मिनी से शादी की थी। 

5 .राजा रतन सिंह की कितनी पत्नियां थीं ?

राजा रतन सिंह की पंद्रह पत्नी थी। 

Conclusion –

आपको मेरा Rana Ratan Singh Biography In Hindi बहुत अच्छी तरह से समज आया होगा। 

लेख के जरिये हमने Ratan singh jodha, राणा रतन सिंह वाइफ और

Rana ratan singh son से सम्बंधित जानकारी दी है।

कोई अभिनेता या जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है।

तो कमेंट करके जरूर बता सकते है।

हमारे आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शयेर जरूर करे। जय हिन्द।

Note –

आपके पास रतन सिंह राजपूत की जानकारी या

Raja ratan singh history in hindi की कोई जानकारी हैं।

या दी गयी जानकारी मैं कुछ गलत लगे तो दिए गए सवालों के जवाब आपको पता है।

तो तुरंत हमें कमेंट और ईमेल मैं लिखे हम इसे अपडेट करते रहेंगे धन्यवाद

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