Rana Sanga Biography in Hindi – राणा सांगा की जीवनी

नमस्कार मित्रो आज के हमारे लेख में आपका स्वागत है आज हम Rana Sanga Biography in Hindi में आपको अपणी वीरता और उदारता से प्रसिद्ध हुए राजस्थान मेवाड़ के महाराजा राणा सांगा का जीवन परिचय बताने वाले है। 

वह अपने समय के भारत के एक बहादुर योद्धा एव अपनी वीरता और उदारता से जानेजाने वाले सबसे शक्तिशाली हिन्दू राजा थे। राणा सांगा ने गुजरात व मालवा मुगल बादशाहों के आक्रमणों से अपने राज्य की बहादुरी से ऱक्षा की थी। आज हम rana sanga history in hindi में राणा सांगा का राज्याभिषेक कब हुआ से ले लेकर के rana sanga physique ,rana sanga son और rana sanga father से सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी बताने वाले है। 

ऐसा कहाजाता है की उनके राज्य पर आक्रमण करना तो ठीक कोई सोच भी नहीं सकता था उनके राज्य की और कोई भी नजर भी नहीं डालसकता इतने शक्तिशाली और महान राजा थे आज इस महान राजा राणा सांगा की छतरी और राणा सांगा की समाधि से सबंधित सारी बातो से आपको परिचित करवाने वाले है तो चलिए शुरू करते है की उनका rana raimal से क्या नाता रहा था। 

नाम  राणा सांगा
उपनाम महाराणा संग्राम सिंह
जन्म 12 अप्रैल 1482
पिता राणा रायमल
रानीया  28
शासनकाल  1509-1528
वंश राजपूत
उत्तराधिकारी मेवाड़
rana sanga height  मंझला , मोटा चेहरा, बड़ी आंखे, लंबे हाथ, ओर गेंहुआ रंग था
मृत्यु 30 जनवरी, 1528
मृत्यु  का  कारण कालान्तर में अपने किसी सामन्त द्वारा विष दिये जाने के कारण

Rana Sanga Biography in Hindi –

मेवाड़ में उत्तराधिकारी के लिए पिछली 2 पीढ़ियों से ग्रह कलेश होता आया था, राणा रायमल से पहले महाराणा रहे कुम्भा को उनके बेटे और रायमल के बड़े भाई ने मार दिया था। मगर जैसे तैसे रायमल ने उदा सिंह ( जिसने महाराणा कुम्भा को मारा) को गद्दी से हटाकर खुद मेवाड़ की सत्ता सम्भाल ली थी। Rana Sanga रायमल यूं तो एक काबिल राजा थे मगर उनकी एक गलती ने अंत में कलेश करवाया वो गलती थी समय रहते अपना उत्तराधिकारी ना चुन ना।

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राणा सांगा का जन्म परिचय –

Rana Sanga नाम, एक महाराज, जिसने मेवाड़ की राजनीति में और उसके साम्राज्य को बढ़ाने में अपने सर्वस्य का निर्वाहन किया। राणा सांगा का पूरा नाम महाराणा संग्राम सिंह था ,राणा सांगा जी उदयपुर में सिसोदिया राजपूत राजवंश के महान राजा थे. किंतु वह अपने पिता राजा रायमल के सबसे छोटे पुत्र थे. राजा रायमल की कुल 3 पुत्र थे जिसमें से पहले कुंवर पृथ्वीराज, जगमाल और फिर राणा सांगा थे। 

सबसे छोटे होने के कारण राजा रायमल की तीनों पुत्रों के बीच लगातार आपसी खींचातानी होती रहती थी. इसी खींचातानी के कारण कुंवर पृथ्वीराज और जगमाल ने राणा सांगा को मारने की कोशिश भी की थी। जिससे कि वह मेवाड़ के सिंहासन को प्राप्त कर सकें। इसके ऊपर एक कहानी राजा और सर्प का रहस्य हमने पहले ही बता रखी है कृपया उसे जरूर देखें।

राणा सांगा का इतिहास – (Rana Sanga History in Hindi)

राणा रायमल के 11 पुत्र थे जिनमें 4 बड़े पुत्र प्रमुख हकदार थे मेवाड़ की राजगद्दी के, उनके सबसे बड़े बेटे कुंवर प्रथ्विराज, कुंवर जयमल, रायसिंह और कुंवर संग्राम सिंह जो आगे चल कर राणा सांगा कहलाए। राणा सांगा का जन्म 12 अप्रैल 1482 को चित्तौड़ दुर्ग में हुआ था, बचपन से ही राणा सांगा और उनके दोनों बड़े भाई एक साथ रहे, शिक्षा ली। अब बात आती है राणा रायमल के बाद अगले महाराणा बनने कि राजपूती परम्परा के अनुसार इस पर हक हमेशा बड़े बेटे का होता है।

मगर कहीं ना कहीं कुंवर प्रथ्विराज से अन्य राजदरबारी खुश नहीं थे वे भले ही कुशल योद्धा थे मगर उनका गुस्सा उन्हें सबके दिलो में एक बुरा शासक बना चुका था।मेवाड़ की राजगद्दी के लिए आपसी कलेश कई दिन चला इसी बीच 4 बड़े राजकुमार अपनी कुंडली दिखाने ज्योतिष के पास जाते है कि कौन होगा हम में से अगला महाराणा। ज्योतिष चारो की कुंडली देख कुंवर संग्राम सिंह की कुंडली में मेवाड़ के महाराणा बनने का राज योग है।

ज्योतिषी की इस बात पर प्रथ्वी राज को गुस्सा आ गया और उन्होंने कटार निकाल कर राणा सांगा पर वार कर दिया, उनका मानना था के अगर राणा सांगा जीवित ही नहीं रहेंगे तो राजा कैसे बनेंगे। उस वार से राणा सांगा को वहां मौजुद उनके काका सारंगदेव ने बचा लिया और सारे राजकुमारों को समझाया के एक ज्योतिष के कहने पे वो विश्वास ना करे वो उन्हें दूसरी जगह ले जाएगा जहां पर एक स्त्री है जो सटीक भविष्यवाणी करती है।

लेकिन ये सब होने से पहले जब प्रथ्विराज ने राणा सांगा पर बार किया तो उनकी एक आंख फुट गई अर्थात वो एक आंख हमेशा के लिए खो चुके थे। उसके कुछ समय बाद सारंगदेव चारो को भीमल गांव ले जाते है जहां की पूजारिन जो चारण जात की थी एक दम सटीक भविष्यवाणी करती थी। वहां भी पूजारिन ने राणा सांगा को है मेवाड़ का अगला महाराणा बनने का राज योग बताया।

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राणा सांगा के युद्धों का शासन काल – 

महाराणा सांगा का शाशन काल मई 1509 से ले कर 30 जनवरी 1520 तक रहा और सबसे बड़ी इस पूरे शाशन काल में कोई ऐसा साल नहीं गुजरा जिसमें मेवाड़ का किसी विदेशी आक्रांता से युद्ध ना हुआ हो। कहते है राणा सांगा की देह पर कुल 80 गहरे घाव थे, इतना ही नहीं इस शाशन काल में उन्होंने अपना एक हाथ और एक टांग पूरी तरह युद्ध लड़ते हुए खो दी थी। इसी वजह से राजस्थान के इतिहास लिखने वाले जेम्स टोड ने उनको सैनिकों का भग्नावशेश कहा था यानी के एक बुरी तरह जख्मी सिपाही।

ऐतिहासिक किताबो की माने तो महाराणा सांगा का मेवाड़ चारो तरफ से शत्रुओं से घिरा हुआ था उनके पूर्व में गुजरात राज्य जहां का शासक था महमूद बेगडा, दक्षिण पूर्व में मांडू जहां का शासक था नसीरुद्दीन, और उत्तर ने सल्तनत से दिल्ली जहां का शासक था सिकंदर लोधी।इन तीनों विशाल राज्यो में आपसी मित्रता नहीं थी ये ही मेवाड़ के लिए फायदे की बात थी। इस बात का पता राणा सांगा को था इसलिए उन्होंने अपने शासक बनते ही सबसे पहले सीमाओं को सुरक्षित किया।

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मांडू राज्य का युद्ध –

मांडू का शासक उस समय महमूद खिलजी द्वितीय था और उसका ख़ास आदमी था मेदिनी राय, वहीं मेदिनी राय जिसे बाद में Rana Sanga गागरोन और चंदेरी देंगे। तो मेदिनी राय मांडू के कुछ प्रमुख लोगों को पसंद नहीं थे इसलिए उन्होंने चाल चलके खिलजी और मेदीनी में मतभेद पैदा कर दिया। मेदिनी राय को जान बचा कर भागना पड़ा और वह मेवाड़ पहुंचे । महाराणा सांगा ने उनकी मदद की और एक विशाल सेना मांडू पर हमले के लिए भेजदी थी लेकिन मांडू जाकर परिस्थितियां देख कर सेना प्रमुखों ने हमला टालने की योजना बनाई थी ।

महाराणा सांगा की स्वीकृति के बाद हमला टाल दिया गया और मेदिनी को उन्होंने उसी सीमा पर गागरोन और चंदेरी जागीर दे कर सुरक्षित कर दिया। ये बात खिलजी को पसन्द नहीं आयी और उसने गागरोन पर आक्रमण कर दिया 1519 में, उस युद्ध में महाराणा सांगा ने बड़ी बेरहमी से खिलजियों को मरा और पराजित किया। युद्ध में खिलजी का शहजादा आसफ खान मारा गया और खुद खिलजी कैदी बन गया। बाद में नरम दिल दिखाते हुए राणा सांगा ने खिलजी को रिहा कर दिया और भविष्य में कभी हमला ना करने की प्रतिज्ञा दिलवाई।

इस रिहाई के पीछे एक वजह थी के मांडू मेवाड़ से दूर था और महाराणा सांगा नहीं चाहते थे कि उनकी सेना मांडू और मेवाड़ दोनों जगह रहे इस से दोनों कमजोर हो जाती। इसी वजह दे महाराणा सांगा ने उदार हृदय दिखाकर खिलजी को छोड़ दिया, खिलजी भी इस से काफी खुश हुआ और उसने फिर कभी मेवाड़ पर आक्रमण नहीं किया। इस रिहाई से ये बात भी तय थी के अब मांडू और गुजरात मेवाड़ पर हमले के लिए संधि नहीं करेंगे कुल मिलाकर इस रिहाई से मेवाड़ फायदे में था।

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राणा सांगा और इब्राहिम लोदी का युद्ध –

अब तक मेवाड़ ने गुजरात और मांडू को पराजीत करके शांत कर दिया था मगर उसका असली संघर्ष अब शुरू होने वाला था सल्तनत से दिल्ली के साथ। महाराणा सांगा मेवाड़ के महाराणा बने उस वक़्त दिल्ली का शासक था सिकंदर लोदी जो कि 1517 में मर गया था। सिकंदर ने कभी महाराणा सांगा के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया मगर उनके बाद सुल्तान बने इब्राहिम लोदी महाराणा सांगा के सभी अभियानों पर नजर रखे बैठा था। उसने दो बार मेवाड़ से युद्ध किया और दोनों बार बुरी तरह हार कर वापस गया।

पहला युद्ध किया 1517 में खातोली में जो कि बूंदी रियासत का हिस्सा था और दूसरा युद्ध किया 1518 में धौलपुर में, ये दोनों ही युद्ध मेवाड़ जीता था। पहले युद्ध में इब्राहिम लोदी के बेटे को बंदी बनाया गया था जिसका जिक्र कुछ किताबो में मिलता है। इस अपमान का बदला लेने के लिए 1518 में लोदी ने दूसरा युद्ध लड़ने के लिए मियां माखन और मियां हुसैन को बाड़ी धौलपुर में भेजा। इस युद्ध में भी मेवाड़ ने महाराणा सांगा के नेतृत्व में दिल्ली कि सेना को हराकर खदेड़ दिया।

अब दो युद्ध हारने के बाद दिल्ली रियासत जिसे भारत का केंद्रबिंदु माना जाता था कि छवि खराब हो गई। भारत की अनेक छोटी बड़ी रियासते मेवाड़ के महाराणा महाराणा सांगा को महत्तव देने लगे, उनको लगने लगा के अगर भारत में कोई व्यक्ति है हो दिल्ली में हिन्दू सत्ता स्थापित कर सकता है तो वो है केवल महराना सांगा। इब्राहीम लोदी से दूसरी रियसते कन्नी काटने लगी और वो कमजोर हो गया, ये दो युद्ध भारत से लोदी साम्राज्य को मिटा देने वाले युद्ध साबित हुए।

इब्राहीम लोदी के अधीन आने वाले सामंतों ने लोदी का विरोध किया और आजाद हो गए लोदी ने इस बात से नराज़ हो कर उनको कुचलने की कोशिश की थी। लेकिन सामंतों ने एकता दिखाते हुए उसका मुकाबला किया और जब लगा के लोदी नहीं मानेगा तो उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के शासक बाबर को भारत आने का निमंत्रण दिया। निमंत्रण का मतलब साफ था के आप भारत आए और लोदी को हराकर यहां राज करे हम आपके साथ है।

इसी निमंत्रण के बाद बाबर भारत आता है लोदी को हरा कर दिल्ली की गद्दी पर बैठ जाता है। अब यहां बाबर को पता था के अगर पूरे भारत पर राज करना है तो महाराणा सांगा को हराना पड़ेगा और इसी लिए बाबर मेवाड़ पर आक्रमण भी करता है जिसका जिक्र मै आगे करूंगा। बाबर 1526 में भारत आया उसने पानीपत के मैदान में पहली लड़ाई लड़ी और लोदी को हरा दिया। इब्राहीम लोदी पानीपत की लड़ाई में मारा गया और लोदी वंश के हाथ से सत्ता चली गई।

राणा सांगा और बाबर का युद्ध –

बाबर ने चतुराई से अपनी सेना का खोया मनोबल जेहाद यानी धर्म का वास्ता देकर जीत लिया अब उसने महाराणा सांगा के खिलाफ अपनी चाल चली। उसने रात के अंधेरे में कुछ सिपाहियो को आदेश दिया के वो काबुल के रास्ते पर चले जिस से महाराणा सांगा को लगने लगा के बाबर ने काबुल से और सेना बुला लिया है। इसके विपरित बाबर चुपचाप खनवा के मैदान में युद्ध की तैयारियों में लगा रहा उसने वहां अपनी तोप भिजवा दी और युद्ध नीति तैयार कर ली थी। 

उधर मेवाड़ से महाराणा सांगा अपनी सेना सहित दिल्ली की ओर पलायन कर चुके थे हमले के लिए और 13 मार्च 1527 को वो खानवा के मैदानों में पहुंचे। बाबर वहां पहले से मजबूत स्थिति में बैठा था उसने हर रण नीति तैयार कर ली थी, बाबर के पास उस समय तोप थी जो कि मेवाड़ की सेना ने देखी भी नहीं थी ये सबसे बड़ी बात थी बाबर की सेना की जीत के लिए। 17 मार्च सुबह 9 बजे खानवा के मैदान में एक भीषण युद्ध शुरू होता है इस युद्ध मै कई राजपूत रियासते महाराणा सांगा के साथ थी। जिनमे निम्नलिखित योद्धा महाराणा सांगा की तरफ बाबर के खिलाफ शामिल थे। 

इतिहास कारो के अनुसार महाराणा सांगा के साथ उस दिन खनवा के मैदान में 7 बड़े राजा, 104 राव और कुछ अन्य छोटी जागीरें भी शामिल थी। अब इस से एक बात साफ है के बाबर के खिलाफ खानवा में महाराणा सांगा एक बहुत अधिक बड़ी सेना के साथ लड़ने पहुंचे थे। सुबह 9 बजे 17 मार्च 1527 को शुरू हुआ और शाम होते होते महाराणा सांगा बुरी तरह हार चुके थे, वो खुद चोटिल हो गए उनकी सेना तित्तर बित्तर हो गई थी।

इतनी विशाल सेना के बावजूद मेवाड़ युद्ध हार गया था और उनका मुगलों को रोकने का सपना अधूरा रह गया। इस युद्ध में कई बड़े योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए, महाराणा सांगा बिल्कुल गंभीर घायल हो गए। अब इतनी बड़ी सेना क्यू हारी इसका इतिहासकार 4 कारण बताते है। पहला तो ये के बयाना के युद्ध में जब मेवाड़ जीता तो मुगल सेना का मनोबल टूट गया था और मेवाड़ ने उसी समय आक्रमण ना कर के बाबर को तैयारी के लिए समय दे दिया।

दूसरा कारण है कि इस युद्ध में बाबर की सेना सुनियोजित थी अनुशासित थी जबकि महाराणा सांगा की सेना एक भीड़ समान थी जिसे महाराणा सांगा नियंत्रण में नहीं कर पा रहे थे। तीसरा कराना था बाबर द्वारा तुलगमा युद्ध पद्धति से युद्ध लड़ना। सुबह 9 बजे 17 मार्च 1527 को शुरू हुआ और शाम होते होते महाराणा सांगा बुरी तरह हार चुके थे, वो खुद चोटिल हो गए उनकी सेना तित्तर बित्तर हो गई थी। इतनी विशाल सेना के बावजूद मेवाड़ युद्ध हार गया था और उनका मुगलों को रोकने का सपना अधूरा रह गया।

इस युद्ध में कई बड़े योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए, महाराणा सांगा बिल्कुल गंभीर घायल हो गए। अब इतनी बड़ी सेना क्यू हारी इसका इतिहासकार 4 कारण बताते है।पहला तो ये के बयाना के युद्ध में जब मेवाड़ जीता तो मुगल सेना का मनोबल टूट गया था और मेवाड़ ने उसी समय आक्रमण ना कर के बाबर को तैयारी के लिए समय दे दिया। दूसरा कारण है कि इस युद्ध में बाबर की सेना सुनियोजित थी अनुशासित थी जबकि महाराणा सांगा की सेना एक भीड़ समान थी जिसे महाराणा सांगा नियंत्रण में नहीं कर पा रहे थे। तीसरा कराना था बाबर द्वारा तुलगमा युद्ध पद्धति से युद्ध लड़ना था ।

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राणा सांगा की मृत्यु कैसे हुई (How did Rana Sanga death)

मुगल बादशाह बाबर ने खानवा के युद्ध में फतह हासिल की और “गाज़ी” के खिताब से खुद को मशहूर किया। महाराणा सांगा को जब होश आया तो इस बात से बड़े क्रोधित हुए कि उन्हें युद्धभूमि से दूर ले जाया गया। महाराणा ने फिर से बचे-खुचे सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार होने का आदेश दिया व कहा कि मैं हारकर चित्तौड़ नहीं जाऊंगा। महाराणा की इस ज़िद से नाराज़ कुछ दगाबाज़ों ने उनको ज़हर दे दिया, जिससे महाराणा सांगा परलोक सिधारे। 47 वर्ष की आयु में अप्रैल, 1527 ई. में महाराणा सांगा का देहान्त हुआ। महाराणा सांगा की कुल 28 रानियां थीं, जिनमें से कई रानिया सती हुईं थी । 

Rana Sanga History Video –

राणा सांगा के रोचक तथ्य –

  • उदयपुर के सिसोदिया राजपूत राणा सांगा का जन्म 12 अप्रैल 1482 के दिन राजस्थान के मेवाड़ में हुआ था उनका पूरा नाम महाराणा संग्राम सिंह था 
  • राणा सांगा भारत के एक बहादुर योद्धा एव अपनी वीरता और उदारता से जानेजाने वाले सबसे शक्तिशाली हिन्दू राजा थे।
  • महाराणा सांग के तीन भाई थे लेकिन राज्य अभिषेक के लिए तीनो में बहुत मतभेद था। 
  • राणा सांगा 47 वर्ष की आयु में अप्रैल, 1527 ई. के दिन वीरगति को प्राप्त हुए थे। 
  • महाराणा सांगा का शाशन काल मई 1509 से ले कर 30 जनवरी 1520 तक रहा और सबसे बड़ी इस पूरे शाशन काल में कोई ऐसा साल नहीं गुजरा जिसमें मेवाड़ का किसी विदेशी आक्रांता से युद्ध ना हुआ हो। 

राणा सांगा के प्रश्न – 

1 .राणा सांगा की कितनी पत्नियां थी ?

महाराणा सांग को 28 पत्निया थी। 

2 .राणा सांगा के पुत्र का नाम क्या था ?

महाराणा सांग  के चार पुत्र थे ,भोज राज, रत्न सिंह द्वितीय, विक्रमा दित्य और उदय सिंह द्वितीय नाम थे। 

3 .राणा सांगा के कितने पुत्र थे ?

राणा सांगा के चार पुत्र थे। 

4 .राणा सांगा के पिता का नाम  क्या था ?

राणा रायमल राणा सांगा के पिता थे। 

5 .राणा सांगा की माता का नाम क्या था ?

उनकी माता का नाम महारानी कर्णावती था। 

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निष्कर्ष – 

दोस्तों आशा करता हु आपको मेरा यह आर्टिकल Rana Sanga Biography in Hindi आपको बहुत अच्छी तरह से समज आ गया होगा और पसंद भी आया होगा । इस लेख के जरिये  हमने rana sanga wife और rana sanga and maharana pratap relation से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दे दी है अगर आपको इस तरह के अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है तो आप हमें कमेंट करके जरूर बता सकते है। और हमारे इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करे। जय हिन्द ।

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