Birbal Biography In Hindi – बीरबल का जीवन परिचय हिंदी

नमस्कार मित्रो आज के हमारे आर्टिकल में आपका स्वागत है आज हम Birbal Biography In Hindi में बादशाह अकबर के नौ रत्नो में से सबसे चतुर बीरबल की जीवनी हिंदी में बताने वाले है। 

बीरबल  दिल्ही सम्राट अकबर के बहुत नजदीक थे , बीरबल साम्राज्य का प्रशाशनिक काम देखते थे। वह सँस्कृत और फ़ारसी भाषा में भी पारंगत थे। आज हम birbal wife name , birbal real name और birbal religion की सभी रोचक बातो की जानकारी देने वाले है। उनका असली नाम महेश दास था। बादशाह अकबर ने उनकी बुद्धिमत्ता से खुश होकर उनका नाम “वीरवर” रखा था जो बाद में बीरबल हो गया। बीरबल का जन्म कल्पी के एक गांव टिकवनपुर में ब्राहमण परिवार में हुआ था| 

बीरबल का जन्म स्थान आज का उत्तरप्रदेश कहलाता है। वैसे इतिहासकारो में उनके जन्मस्थान को लेकर विवाद भी है। महेश दास के पिता का नाम गंगा दास था और माता का नाम अनभा दवीतो था| राजा बीरबल को शुरू से ही कविताएं लिखने का शौक था। वो ब्रज भाषा में कविताएं लिखते थे। अकबर ने उन्हें कवि के रूप में दरबार में नियुक्त किया था लेकिन बीरबल की बुद्धि से प्रभावित होकर अकबर ने उन्हें सलाहकार बना दिया था। तो चलिए बीरबल की विशेषताएं बताते है। 

 नाम

 राजा बीरबल 

 अन्य नाम

 महेशदास

 जन्म

 1528 ई.

 जन्म भूमि

 त्रिविक्रमपुर, कानपुर, उत्तर प्रदेश

 पिता

 गंगा दास

 माता 

 अनभा दवितो

 उपाधि

 अकबर ने बीरबल को ‘राजा’ और ‘कविराय’ की उपाधि से सम्मानित किया था

 प्रसिद्धि

 अकबर के नवरत्नों में से एक

 मृत्यु

 1586 ई

 मृत्यु स्थान

 स्वात, भारत (अब पाकिस्तान)

Birbal Biography In Hindi –

बीरबल का जन्म महेश दास के नाम से 1528 में, कल्पी के नजदीक किसी गाव में हुआ था. आज उनका जन्मस्थान भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में आता है. इनके बचपन का नाम महेश दास था। बचपन से ही वो बहुत ही चतुर एवं बुद्धिमान थे। उनके जन्म के विषय मे मतभिन्नता है। कुछ विद्वान उन्हें आगरा के निवासी, कोई कानपुर के घाटमपुर तहसील के, कोई दिल्ली के निवासी और कोई मध्य प्रदेश के सीधी जिले का निवासी बताते हैं। पर ज्यादातर विद्वान मध्य प्रदेश के सीधी जिले के घोघरा गाँव को ही बीरबल का जन्मस्थान स्वीकार करते हैं। 

इतिहासकारो के अनुसार उनका जन्मगाव यमुना नदी के तट पर बसा टिकवनपुर था। उनके पिता का नाम गंगा दास और माता का नाम अनभा दवितो था. वे हिन्दू ब्राह्मण परीवार जिन्होंने पहले भी कविताये या साहित्य लिखे है, उनके तीसरे बेटे थे. बीरबलहिंदी, संस्कृत और पर्शियन भाषा में शिक्षा प्राप्त की थी बीरबल कविताये भी लिखते थे, ज्यादातर उनकी कविताये ब्रज भाषा में होती थी, इस वजह से उन्हें काफी प्रसिद्धि भी मिली थी।

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बीरबल और अकबर का मिलन कब हुवा –

अकबर और बीरबल का मिलना कैसे हुआ और वो दरबार की शान कैसे बने, इस पर बात करते है। बीरबल अकबर के यहां काम करने से पहले रीवा नरेश के कार्य करते थे। ऐसा माना जाता है कि रीवा नरेश ने ही अकबर को बीरबल भेंट किया था। इतिहास में ऐसा भी आता है कि बीरबल मुग़ल साम्राज्य की प्रसंशा सुनकर दरबार आया था। अकबर उनकी कविताओं, वाक चतुरता से काफी प्रभावित हुआ और उन्हें दरबार में जगह दी। अकबर और बीरबल के मिलने पर कहानी भी प्रचलित है।

अकबर ने बीरबल से खुश होकर कुछ राज्य भेंट किये थे। इसलिए उनको राजा बीरबल भी कहा जाता है। बीरबल ने फतेहपुर सीकरी में महल भी बनवाया था। कालांतर में अकबर बीरबल के नाम से कई किस्से और कहानियां गढ़ी गयी। इन कहानियों में बीरबल की चतुराई के किस्से होते है। अकबर के द्वारा चलाये गए दीन ऐ इलाही धर्म को बीरबल ने भी अपनाया था।

बीरबल ने ब्रजभाषा में कविताएं भी लिखी थी। ये कविताएं उन्होंने “ब्रह्मा” उपनाम से लिखी थी। अकबर से मिलन संबंधी अनेक कथाएं प्रचलित है। सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार बादशाह अकबर ने अपने एक पान का बीड़ा लगाने वाले नौकर को एक “पाओभर” (आज का लगभग 250 ग्राम) चूना लेकर आने को कहा।

नौकर किले के बाहर दुकान करने वाले पनवाड़ी से पाओभर चूना लेने गया। इतना सारा चूना ले जाते देख पनवाड़ी को कुछ शक होता है। इसलिए बीरबल नौकर से पूरा घटनाक्रम जानता है, और कहता है कि बादशाह यह चूना तुझको ही खिलवायेगा।तेरे पान में लगे ज्यादा चूने से बादशाह की जीभ कट गई है, इसलिए यह सब चूना तुझे ही खाना पड़ेगा। इसलिए इतना ही घी भी ले जा, जब बादशाह चूना खाने को कहे तो चूना खाने के बाद घी पी लेना।

नौकर दरबार मे चूना लेकर जाता है, और बादशाह नौकर को वह सारा पाओभर (250ग्राम) चूना खाने का आदेश देता है। नौकर वह सारा चूना खा लेता है, लेकिन उस पनवाड़ी बीरबल की सलाह के अनुसार घी भी पी लेता है। अगले दिन जब बादशाह का वह नौकर पुनः जब राज दरबार पहुचता है, तो अकबर उसे जीवित देख आश्चर्य से उसके जीवित बचने का कारण जानता है।

नौकर सारी बात बादशाह को बताता है, कि कैसे किले के बाहर के पनवाड़ी की समझ-बूझ से वह बच सका। बादशाह उस पनवाड़ी की बुद्धिमत्ता से प्रभावित हो उसे दरबार मे बुलवाते है। इस प्रकार बादशाह अकबर और बीरबल का पहली बार आमना सामना होता है। और अकबर ऐसे बुद्धिमान व्यक्ति को अपने दरबार मे स्थान देते हैं।

बीरबल अकबर के नव रत्न मे से एक थे –

परम बुद्धिमान राजा बीरबल (1528 -1583 ) अकबर के विशेष-सलाहकार थे। हास्य-परिहास में इनके अकबर के संग काल्पनिक किस्से आज भी कहे जाते हैं। बीरबल कवि भी थे। ब्रह्म के नाम उन्होंने एक कवि के रूप में कविताएँ लिखी हैं जो भरतपुर संग्रहालय राजस्थान में सुरक्षित हैं ।

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बीरबल और अकबर –

Birbal महेशदास नामक बादफ़रोश ब्राह्मण थे जिसे हिन्दी में भाट कहते हैं। यह जाति धनाढ्यों की प्रशंसा करने वाली थी। यद्यपि बीरबल कम पूँजी के कारण बुरी अवस्था में दिन व्यतीत कर रहे थे, पर बीरबल में बुद्धि और समझ भरी हुई थी। अपनी बुद्धिमानी और समझदारी के कारण यह अपने समय के बराबर लोगों में मान्य हो गए। जब सौभाग्य से अकबर बादशाह की सेवा में पहुँचे।

अपनी वाक्-चातुरी और हँसोड़पन से बादशाही मजलिस के मुसाहिबों और मुख्य लोगों के गोल में जा पहुँचे और धीरे-धीरे उन सब लोगों से आगे बढ़ गए। बहुधा बादशाही पन्नों में इन्हें मुसाहिबे-दानिशवर राजा बीरबल लिखा गया है। जब राजा लाहौर पहुँचे तो हुसैन कुली ख़ाँ ने जागीरदारों के साथ ससैन्य नगरकोट पहुँचकर उसे घेर लिया। जिस समय दुर्ग वाले कठिनाई में पड़े हुए थे, दैवात् उसी समय इब्राहीम हुसेन मिर्ज़ा का बलवा आरम्भ हो गया था| 

इस कारण कि उस विद्रोह का शान्त करना उस समय का आवश्यक कार्य था, इससे दुर्ग विजय करना छोड़ देना पड़ा। अंत में राजा की सम्मति से विधिचन्द्र से पाँच मन सोना और ख़ुतबा पढ़वाने, बादशाही सिक्का ढालने तथा दुर्ग काँगड़ा के फाटक के पास मसजिद बनवाने का वचन लेकर घेरा उठा लिया गया। 30वें वर्ष सन् 994 हि. (सन् 1586 ई.) में जैन ख़ाँ कोका यूसुफ़जई जाति को, जो स्वाद और बाजौर नामक पहाड़ी देश की रहनेवाली थी, दंड देने के लिए नियुक्त हुआ था।

उसने बाजौर पर चढ़ाई करके स्वात पहुँच कर उस जाति को दंड दिया। घाटियाँ पार करते-करते सेना थक गई थी, इसलिये जैन ख़ाँ कोका ने बादशाह के पास नई सेना के लिए सहायतार्थ प्रार्थना की। शेख अबुल फ़ज़ल ने उत्साह और स्वामिभक्ति से इस कार्य के लिये बादशाह ने अपने को नियुक्त किये जाने की प्रार्थना की। बादशाह ने इनके और राजा बीरबल के नाम पर गोली डाली। दैवात् वह राजा के नाम की निकली।

इनके नियुक्त होने के अनन्तर शंका के कारण हक़ीम अबुलफ़जल के अधीन एक सेना पीछे से और भेज दी। जब दोनों सरदार पहाड़ी देश में होकर कोका के पास पहुँचे तब, यद्यपि कोकलताश तथा राजा के बीच पहिले ही से मनोमालिन्य था, तथापि कोका ने मजलिस करके नवागंतुकों को निमन्त्रित किया। राजा ने इस पर क्रोध प्रदर्शित किया।

कोका धैर्य को काम में लाकर राजा के पास गया और जब राय होने लगी तब राजा ( जो हकीम से भी पहिले ही से मनोमालिन्य रखता था) से कड़ी-कड़ी बातें हुईं और अंत में गाली-गलौज तक हो गया। फल यह हुआ कि किसी का हृदय स्वच्छ नहीं रहा और हर एक दूसरे की सम्मति को काटने लगा। यहाँ तक कि आपस की फूट और झगड़े से बिना ठीक प्रबन्ध किए वे बलंदरी की घाटी में घुसे।

अफ़ग़ानों ने हर ओर से तीर और पत्थर फेंकना आरम्भ किया और घबराहट से हाथी, घोड़े और मनुष्य एक में मिल गए। बहुत आदमी मारे गए और दूसरे दिन बिना क्रम ही के कूच करके अँधेरे में घाटियों में फँस कर बहुत से मारे गए। राजा बीरबल भी इसी में मारे गए। कहते हैं कि जब राजा कराकर पहुँचे थे, तब किसी ने उनसे कहा था कि आज की रात में अफ़ग़ान आक्रमण करेंगे इससे तीन चार कोस ज़मीन (जो सामने है) पार कर ली जाय तो रात्रि-आक्रमण का खटका न रह जाएगा।

राजा ने जैन ख़ाँ को बिना इसका पता दिए ही संध्या समय कूच कर दिया। उनके पीछे कुल सेना चल दी। जो होना था सो हो गया। बादशाही सेना का भारी पराजय हुआ और लगभग सहस्त्र मनुष्य मारे गए जिनमें से कुछ ऐसे थे जिन्हें बादशाह पहचानते थे। राजा ने बहुत कुछ हाथ पैर मारा (कि बाहर निकल जायें) पर मारा

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Birbal Death (बीरबल की मृत्यु )

उनके के बारे में अबु फजल ने “अकबरनामा” में लिखा है। Birbal दानवीर थे जिसका जिक्र इतिहास में आता है। बीरबल बादशाह अकबर का लतीफे सुनाकर मनोरंजन भी करते थे। इससे दरबार आनंदमय रहता था। बीरबल एक कुशल योद्धा भी थे। अकबर उन्हें कई युद्धों में भेजा करते थे।अकबर ने बीरबल को वर्ष 1586 के अफगानिस्तान युद्ध में भेजा था। इसी युद्ध में बीरबल की मृत्यु हो गई थी। इतिहास में आता है कि बीरबल की मृत्यु से अकबर बहुत दिन तक दुखी रहा था। इतिहास में बीरबल जैसे बुद्धिमान कम ही मिलते है।

बीरबल की 37 वी पढ़ी भी इस गांव में है –

Birbal की 37 वीं पीढ़ी भी इसी गांव में रह रही है और ये लोग मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं। सिधी के रहने वाले साधू यादव कहते हैं कि इस परिवार से मिलने ज़्यादातर शोधकर्ता ही आते हैं. सरकारी अधिकारी और नेताओं को बीरबल के परिवार से कोई सरोकार नहीं है। लोगों को अफ़सोस है कि सालों साल दिल्ली की गद्दी पर बैठी सरकार हो या फिर प्रदेश की है। 

किसी नें बीरबल की जन्मस्थली घोघरा के बारे में नहीं सोचा। बीरबल की खिचड़ी तो कभी बन नहीं पायी. वो तो बादशाह अकबर की नसीहत के लिए खिचड़ी बना रहे थे. मगर हमारी खिचड़ी तो जल्द बन जाती है। 

गंगा दुबे – 

अलबत्ता जब अर्जुन सिंह केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री हुआ करते थे तो उन्होंने बीरबल की याद में एक सामुदायिक भवन का निर्माण करवाया. इसके अलावा घोघरा की पहचान के लिए कोई अलग पहल नहीं की गयी। गांव के बुजुर्गों का कहना हैं कि अकबर के ज़माने में घोघरा महत्वपूर्ण रहा. मगर बाद में वक़्त बदलता चला गया और अहिस्ता अहिस्ता इस जगह की अहमियत कम होने लगी। 

अकबर के बाद दिल्ली और प्रदेश की सरकारों नें कभी इस गांव की तरफ मुड कर भी नहीं देखा एक नौजवान लड़के ने इस गांव से चलकर दिल्ली के दरबार तक का सफ़र तय किया. आज कई सालों के बाद भी दिल्ली की सरकारें घोघरा तक नहीं पहुंच पायीं हैं। 

बीरबल के वंशज –

गांव वालों से बात करते करते, मैं Birbal के वंशजों के घर आ पहुंचा. छोटे से बगीचे में बसा कच्चा मकान. यहां मेरी मुलाक़ात बीरबल की 36 वीं पीढ़ी के गंगा दुबे से हुई जो पेशे से किसान हैं और गांव में एक छोटी सी परचून की दुकान भी चलाते हैं। गंगा दुबे बताते हैं कि कई सालों तक बीरबल से जुड़े कई दस्तावेज़ उनके पास पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रहे. मगर हाल ही में उनकी दुकान में पानी भर गया और उनमें से कुछ दस्तावेज़ नष्ट हो गए। 

इन दस्तावेजों में रीवा के महाराजा का पत्र और अकबर के दरबार का हुक्म-नामा शामिल थे जो फारसी में लिखे हुए थे. गंगा के परिवार के पास बीरबल की कुछ दूसरी यादगार चीज़ें आज भी मौजूद हैं. मसलन शंख, घंटा और कुछ किताबें कहते हैं कि बीरबल फारसी और संस्कृत के विद्वान थे और कविताएं भी लिखा करते थे. इसके अलावा उनकी शिक्षा संगीत में भी हुई थी।

यही वजह है कि सबसे पहले उन्हें जयपुर के महाराज के दरबार में और बाद में रीवा के महाराज के दरबार में बतौर राज कवि रखा गया था। गांववालों का कहना है कि दरअसल रीवा के महाराज ने ही बादशाह अकबर को बीरबल तोहफे़ के रूप में दिया था. मगर इतिहासकार इससे सहमत नहीं हैं। 

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Birbal की यादे अभी इस गांव में –

बीरबल की इस जन्मस्थली में उनसे जुड़ी यादगार चीज़ें लगभग अब नहीं के बराबर हैं. वक़्त के साथ सबकुछ ख़त्म होता चला गया. गांव के तालाब के किनारे वो घर जिसमे उनके माता पिता रहते थे, अब नहीं है। ये जगह अब एक वीरान टीला है जहां जानवर चरते रहते हैं. कभी कभी गांव के नौजवान तालाब के किनारे इस टीले पर बैठकर अपना समय बिताते हैं। 

अगर इतने सालों में इस गांव में कुछ नहीं बदला तो वो है घोघरा का प्राचीन मंदिर जहां बीरबल और उनके भाई जाया करते थे। इस प्राचीन देवी के मंदिर के वयोवृद्ध पुजारी सुख्चंद्र सिंह का कहना है कि ऐसी मान्यता है कि यहीं से बीरबल को वरदान मिला था। वो कहते हैं: “पहले ये मंदिर तालाब के किनारे था, बाद में देवी की मूर्ती को यहां स्थापित किया गया था। 

बीरबल का कोई बेटा नहीं था. कहा जाता है कि उनकी सिर्फ एक बेटी थी कमला, जिसने शादी नहीं की थी. इसलिए आज उनके भाई रघुबर ही उनके वंश को चला रहे हैं. घोघरा में ये विशवास है कि ऐसा देवी के वरदान की वजह से ही हुआ होगा। 

Birbal के वंशज को आज भी हे सन्मान –

गंगा दुबे के घर की बैठक में लोगों का आना जान लगा रहता है. बीरबल के वंशज होने की वजह से पूरे इलाके में उनका काफी सम्मान भी है. लोग उनके घर को फ़क्र के साथ देखते हैं और अक्सर इनके यहां गांव वालों की लंबी लंबी बैठकें भी होती हैं। इनका परिवार भी खिचड़ी का शौकीन है. मगर गंगा कहते हैं कि उनके घर पर खिचड़ी जल्दी बन जाती। 

वो हंसते हुए कहते हैं, “बीरबल की खिचड़ी तो कभी बन नहीं पायी. वो तो बादशाह अकबर की नसीहत के लिए खिचड़ी बना रहे थे. मगर हमारी खिचड़ी तो जल्द बन जाती है.” घोघरा में बीरबल और अकबर की नोक झोंक लगभग हर जुबां पर है. सिधी जिले के इस सुदूर इलाके में कभी बिजली रहती है कभी नहीं. गांव के लोग खाली समय में अकबर और बीरबल के किस्सों से ही अपना दिल बहलाते हैं.

गंगा दुबे इस गांव में अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ रहते हैं. इनकी दो बेटियां भी हैं जिनकी शादी हो चुकी है. बस किसी तरह इस परिवार का गुज़र बसर चलता है। यूं कहा जा सकता है कि बीरबल के इस गांव को आज है किसी अकबर का इंतज़ार। 

Birbal Biography In Hindi –

Birbal Facts –

  • अकबर बीरबल की मजेदार पहेलियां सुनके अकबर ने बीरबल को ‘राजा’ और ‘कविराय’ की उपाधि से सम्मानित किया था
  • कबर ने बीरबल को वर्ष 1586 के अफगानिस्तान युद्ध में भेजा था। इसी युद्ध में बीरबल की मृत्यु हो गई थी। इतिहास में आता है कि बीरबल की मृत्यु से अकबर बहुत दिन तक दुखी रहा था।
  • अर्जुन सिंह केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री हुआ करते थे तो उन्होंने बीरबल की याद में एक सामुदायिक भवन का निर्माण करवाया था। 
  • बीरबल की 36 वीं पीढ़ी के गंगा दुबे से हुई जो पेशे से किसान हैं और गांव में एक छोटी सी परचून की दुकान भी चलाते हैं। 

बीरबल प्रश्न –

1 .बीरबल की बेटी का क्या नाम था ?

सौदामिनी दुबे नाम की बीरबल की बेटी थी। 

2 .बीरबल की मौत कैसे हुई ?

16 फ़रवरी 1586 के दिन एक युद्ध में बीरबल की मौत हुई थी। 

3 .बीरबल का असली नाम क्या था ?

महेशदास बीरबल का असली नाम था 

4 .बीरबल का जन्म कब हुआ था ?

1528 ई. में बीरबल का जन्म हुआ था। 

5 .बीरबल की पत्नी का नाम ?

बीरबल की पत्नी का नाम उर्वशी था। 

6 .बीरबल के पिता का क्या नाम था ?

गंगा दास बीरबल के पिता थे। 

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Conclusion –

दोस्तों आशा करता हु आपको मेरा यह आर्टिकल Birbal Biography In Hindi बहुत अच्छी तरह से समज आ गया होगा। इस लेख के जरिये  हमने बीरबल की बुद्धिमानी , birbal story और question and answer of akbar and birbal से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दे दी है अगर आपको इस तरह के अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है तो आप हमें कमेंट करके जरूर बता सकते है। और हमारे इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शयेर जरूर करे। जय हिन्द ।

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