Dadabhai Naoroji Biography In Hindi – दादाभाई नौरोजी का जीवन परिचय

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आज के हमारे लेख में आपका स्वागत है। नमस्कार मित्रो आज हम Dadabhai Naoroji Biography In Hindi बताएँगे। भारत का “ग्रैंड ओल्ड मेन ” और स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखने वाले दादाभाई नौरोजी का जीवन परिचय से वाकिफ करने वाले है। 

दादाभाई एक महान स्वतंत्रता संग्रामी और एक अच्छे शिक्षक थे। जिन्हें वास्तुकार के रूप में देखा जाता है। कपास के व्यापारी और एक प्रारंभिक भारतीय राजनीतिक और सामाजिक नेता थे। आज dadabhai naoroji contribution ,dadabhai naoroji famous book और dadabhai naoroji religion की जानकारी से ज्ञात करेंगे। दादाभाई एक पारसी थे। तो चलिए दादा भाई नौरोजी हिस्ट्री बताना शुरू करते है। 

1892 से 1895 के दौरान दादाभाई लिबरल पार्टी के सदस्य के तौर पर ब्रिटिश संसद के सदस्य रहे थे। ये पहले एशियाई थे, जो ब्रिटिश संसद के मेम्बर बने थे। नौरोजी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का रचियता कहा जाता है। इन्होने ए ओ हुम और दिन्शाव एदुल्जी के साथ मिल कर इस पार्टी को बनाया था। दादाभाई इस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तीन बार अध्यक्ष भी रहे थे। दादाभाई पहले भारतीय थे, जो कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए थे। 

Dadabhai Naoroji Biography In Hindi –

Name

 दादाभाई नवरोजी

 जन्म

 4 सितम्बर, 182

 जन्म स्थान

 बॉम्बे, भारत

Father

 नौरोजी पलंजी दोर्दी

 माता

 मानेक्बाई

 पत्नी

 गुलबाई

 राजनैतिक पार्टी

 लिबरल

 निवास

 लन्दन

 अन्य पार्टी

 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

 मृत्यु

 30 जून, 1917

दादाभाई नौरोजी का जन्म और बचपन

Dadabhai Naoroji  – दादा भाई नौरोजी जन्म दिवस 4 सितम्बर, 1825 और बॉम्बे में हुआ था। dadabhai naoroji family एक गरीब पारसी परिवार था। जब दादाभाई 4 साल के थे, तब इनके पिता नौरोजी पलंजी दोर्दी की मृत्यु हो गई थी।इनकी माता मानेक्बाई ने इनकी परवरिश की थी। पिता का हाथ उठने से, इस परिवार को बहुत सी आर्थिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ा था। इनकी माता अनपढ़ थी। 

उन्होंने अपने बेटे को अच्छी अंग्रेजी शिक्षा देने का वादा किया था। दादाभाई को अच्छी शिक्षा देने में उनकी माता का विशेष योगदान था। दादाभाई की शादी 11 साल की उम्र में, 7 साल की गुलबाई से हो गई थी। उस समय भारत में बाल विवाह का चलन था।  दादाभाई के 3 बच्चे थे, एक बेटा एवं और 2दो बेटीया थी। dadabhai naoroji nick name “ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया” और “भारत के अनौपचारिक राजदूत” था। 

दादाभाई की शुरुवाती शिक्षा ‘नेटिव एजुकेशन सोसायटी स्कूल’ से हुई थी। इसके बाद दादाभाई ने ‘एल्फिनस्टोन इंस्टिट्यूशन’ बॉम्बे से पढाई थी। जहाँ इन्होने दुनिया का साहित्य पढ़ा था। दादाभाई गणित एवं अंग्रेजी में बहुत अच्छे थे।  15 साल की उम्र में दादाभाई को क्लेयर’स के द्वारा स्कॉलरशीप मिली थी। 

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दादाभाई नौरोजी का करियर

Dadabhai Naoroji  – यहाँ से पढाई पूरी करने के बाद दादाभाई को यही पर हेड मास्टर बना दिया गया था। dadabhai naoroji ka ujala naat पारसी पुरोहित थे। इन्होने 1 अगस्त 1851 को ‘रहनुमाई मज्दायास्नी सभा’ का गठन किया था।  इसका उद्देश्य यह था कि पारसी धर्म को एक साथ इकट्टा किया जा सके। यह सोसायटी आज भी मुंबई में चलाई जा रही है। 

इन्होने 1853 में फोर्थनाईट पब्लिकेशन के तहत ‘रास्ट गोफ्तार’ बनाया था, जो आम आदमी की, पारसी अवधारणाओं को स्पष्ट करने में सहायक था। 1855 में 30 साल की उम्र में दादाभाई को एल्फिनस्टोन इंस्टिट्यूशन में गणित एवं फिलोसोफी का प्रोफेसर बना दिया गया था। ये पहले भारतीय थे। जो कॉलेज में प्रोफेसर बने थे। 

1855 में ही दादाभाई ‘कामा एंड को’ कंपनी के पार्टनर बन गए। यह पहली भारतीय कंपनी थी। जो ब्रिटेन में स्थापित हुई थी। इसके काम के लिए दादाभाई लन्दन गए। दादाभाई लगन से वहाँ काम किया करते थे। लेकिन कंपनी के अनैतिक तरीके उन्हें पसंद नहीं आये और उन्होंने इस कंपनी में इस्तीफा दे दिया था। 1859 में खुद की कपास ट्रेडिंग फर्म बनाया जिसका नाम ‘नौरोजी एंड को’ रखा था। 

भारतीयों के उत्थान के लिए काम शुरू किया –

1860 के दशक की शुरूवात में, दादाभाई ने सक्रिय रूप से भारतीयों के उत्थान के लिए काम करना शुरू किया था।  वे भारत में ब्रिटिशों की प्रवासीय शासनविधि के सख्त खिलाफ थे। इन्होने ब्रिटिशों के सामने dadabhai naoroji drain theory प्रस्तुत की जिसमें बताया गया था। कि ब्रिटिश कैसे भारत का शोषण करते है। कैसे वो योजनाबद्ध तरीके से भारत के धन और संसाधनों में कमी ला रहे है। और देश को गरीब बना रहे है। 

इंग्लैंड में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के बाद दादाभाई भारत वापस आ गए। 1874 में बरोदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड तृतीय के सरंक्षण में दादाभाई काम करने लगे। यहाँ से उनका सामाजिक जीवन शुरू हुआ। और वे महाराजा के दीवान बना दिए गए। 1885 – 1888 के बीच में मुंबई की विधान परिषद के सदस्य के रूप में दादा भाई नौरोजी के कार्य किया था। 

1886 में दादाभाई नौरोजी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया। इसके अलावा दादाभाई 1893 एवं 1906 में भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे। तीसरी बार 1906 में जब दादाभाई अध्यक्ष बने थे। तब उन्होंने पार्टी में उदारवादियों और चरमपंथियों के बीच एक विभाजन को रोका था। 1906 में दादाभाई ने ही सबके सामने कांग्रेस पार्टी के साथ स्वराज की मांग की थी। 

दादाभाई नौरोजी ब्रिटेन के संसद –

दादाभाई विरोध के लिए अहिंसावादी और संवैधानिक तरीकों पर विश्वास रखते थे। दादाभाई नवरोजी पहले एशियाई इंसान थे जो ब्रिटेन की संसद में चुनकर पहुंचे थे। 1892 में ब्रिटेन के संसद में एक भारतीय चुनकर पहुंचा। ये कैसे हुआ? इस ऐतिहासिक घटना का आज के दौर में क्या महत्व है? दादाभाई नौरोजी (1825-1917) की पहचान सिर्फ़ इतनी ही नहीं है कि वह ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में पहुंचने वाले एशिया के पहले शख्स थे। 

महात्मा गांधी से पहले वो भारत के सबसे प्रमुख नेता थे। दुनिया भर में नौरोजी जातिवाद और साम्राज्यवाद के विरोधी की तरह भी जाने जाते थे। दुनिया भर में पैदा हुए कई नए संकटों के बीच दादाभाई को याद करना फिर ज़रूरी हो गया है. उनका जीवन इस बात का गवाह है कि कैसे प्रगतिशील राजनीतिक शक्ति इतिहास के काले अध्यायों में भी एक रोशनी की किरण की तरह है। 

नौरोजी का जन्म बॉम्बे के एक ग़रीब परिवार में हुआ था।  वह उस वक़्त फ़्री पब्लिक स्कूलिंग के नए प्रयोग का हिस्सा थे। दादा भाई नौरोजी के विचार थे। कि लोगों की सेवा ही उनके शिक्षा का नैतिक ऋण चुकाने का ज़रिया है। कम उम्र से ही उनका जुड़ाव प्रगतिशील विचारों से रहा था। 

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राजनैतिक सफर में दादाभाई नौरोजी का आगमन –

दादाभाई ने 1852 में भारतीय राजनीती में कदम रखा।  इन्होने दृढ़ता से 1853 में ईस्ट इंडिया कंपनी के लीज नवीकरण का विरोध किया था। इस संबंध में दादाभाई ने ब्रिटिश सरकार को याचिकाएं भी भेजी थी।  लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उनकी इस बात को नजरंदाज करते हुए, लीज को रिन्यू कर दिया था। दादाभाई नौरोजी का मानना था कि भारत में ब्रिटिश शासन, भारतीय लोगों की अज्ञानता की वजह से था। 

वयस्कों की शिक्षा के लिए दादाभाई ने ‘ज्ञान प्रसारक मंडली’ की स्थापना की थी। भारत की परेशानी बताने के लिए दादाभाई ने राज्यपालों और वायसराय को अनेकों याचिकाएं लिखी। अंत में उन्होंने महसूस किया कि ब्रिटिश लोगों और ब्रिटिश संसद को भारत एवं भारतीयों की दुर्दशा के बारे में अच्छे से पता होना चाहिए। 1855 में 30 साल की उम्र में वे इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए। 

दादाभाई नवरोजी ने लड़कीयोकि पढाई पर प्रभाव डाला –

1840 के दशक में उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोला जिसके कारण रूढ़िवादी पुरुषों के विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन उनमें अपनी बात को सही तरीक़े से रखने और हवा का रुख़ मोड़ने के अद्भुत क्षमता थी। पांच साल के अंदर ही बॉम्बे का लड़कियों का स्कूल छात्राओं से भरा नज़र आने लगा था। नौरोजी के इरादे और मज़बूत हो गए और वह लैंगिक समानता की मांग करने लगे। 

नौरोजी का कहना था कि भारतीय एक दिन ये समझेंगे कि “महिलाओं को दुनिया में अपने अधिकारों का इस्तेमाल, सुविधाओं और कर्तव्यों का पालन करने का उतना ही अधिकार है जितना एक पुरुष को” धीरे-धीरे, भारत में महिला शिक्षा को लेकर नौरोजी ने लोगों की राय को बदलने में मदद की थी। 

दादाभाई नौरोजी का इंग्लैंड सफर केसा रहा – Dadabhai Naoroji 

इंगलैंड में रहने के दौरान दादाभाई ने वहां की बहुत सी अच्छी सोसायटी ज्वाइन की। वहां भारत की दुर्दशा बताने के लिए अनेकों भाषण दिए, ढेरों लेख लिखे थे। 1 दिसम्बर, 1866 को दादाभाई ने ‘ईस्ट इंडियन एसोसिएशन’ की स्थापना की।  इस संघ में भारत के उच्च उच्च पदस्थ अधिकारी और ब्रिटिश संसद के मेम्बर शामिल थे। 1880 में दादाभाई एक बार फिर लन्दन गए। दादाभाई को 1892 में वहां हुए, आम चुनाव के दौरान ‘सेंट्रल फिन्स्बरी’ द्वारा ‘लिबरल पार्टी’ के उम्मीदवार के रूप प्रस्तुत किया गया।

जहाँ वे पहले ब्रिटिश भारतीय एम् पी बने। उन्होंने भारत एवं इंग्लैंड में I.C.S की प्रारंभिक परीक्षाओं के आयोजन के लिए, ब्रिटिश संसद में एक बिल भी पारित कराया। उन्होंने भारत और इंग्लैंड के बीच प्रशासनिक और सैन्य खर्च का भी वितरण के लिए विले आयोग और भारत व्यय पर रॉयल कमीशन बनाया था। 

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दादाभाई नौरोजी ने ब्रिटेन साम्राज्य को चुनौती दी –

Dadabhai Naoroji – 1855 में पहली बार नौरोजी ब्रिटेन पहुंचे. वह वहां की समृद्धि देख स्तब्ध रह गए। वह समझने की कोशिश करने लगे कि उनका देश इतना ग़रीब और पिछड़ा क्यों है। यहां से नौरोजी के दो दशक लंबे आर्थिक विश्लेषण की शुरुआत हुई जिसमें उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की उस मान्यता को चुनौती दी जो साम्राज्यवाद को उपनिवेशी देशों में समृद्धि का कारण मानता है। 

उन्होंने अपनी पढ़ाई से ये साबित किया कि सच दरअसल इस मान्यता के बिल्कुल विपरीत है। उनके मुताबिक ब्रिटिश शासन, भारत का “ख़ून बहा कर” मौत की तरफ़ ले जा रहा था और भयावह अकाल पैदा कर रहा था। इससे नाराज़ कई ब्रितानियों ने उन पर देशद्रोह और निष्ठाहीनता का आरोप लगाया। वह विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि एक उपनिवेश में रहने वाला व्यक्ति सार्वजनिक रूप से इस तरह के दावे कर रहा था। 

हालांकि साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ विचार रखने वाले लोगों को नौरोजी के नए ठोस विचारों से फ़ायदा हुआ। साम्राज्यवाद के कारण उपनिवेशों से कैसे “धन बाहर गया” पर उनके विचार ने यूरोपीय समाजवादियों, विलियम जेनिंग्स ब्रायन जैसे अमेरिकी प्रगतिशील और संभवतः कार्ल मार्क्स को भी इस मुद्दे से अवगत कराया था। 

नौरोजी का ब्रिटेन संसद में पहोचने का कारण – Dadabhai Naoroji 

नौरोजी की ब्रिटिश संसद में पहुंचने की महत्वाकांक्षा के पीछे भारत की ग़रीबी थी। ब्रिटिश उपनिवेश से आने के कारण वह संसद में चयन के लिए ख़ड़े हो सकते थे। जब तक वो ब्रिटेन में रहकर ऐसा करें। कुछ आयरिश राष्ट्रवादियों के मॉडल की तर्ज़ पर उनका मानना था कि भारत को वेस्टमिंस्टर में सत्ता के हॉल के भीतर से राजनीतिक परिवर्तन की मांग करनी चाहिए। 

भारत में इस तरह का कोई विकल्प नहीं था। इसलिए, 1886 में उन्होंने अपना पहला अभियान होलबोर्न से लॉन्च किया। वो बुरी तरह से पराजित हो गए।  लेकिन नौरोजी ने हार नहीं मानी अगले कुछ वर्षों में, उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद और ब्रिटेन में प्रगतिशील आंदोलनों के बीच गठबंधन किया. नौरोजी महिलाओं के मताधिकार के मुखर समर्थक भी बन गए। 

उन्होंने आयरलैंड के घरेलू शासन का समर्थन किया और आयरलैंड से संसद के लिए खड़े होने के क़रीब भी पहुंचे. उन्होंने ख़ुद को श्रम और समाजवाद के साथ जोड़ दिया, पूंजीवाद की आलोचना की और मज़दूरों के अधिकारों के लिए आह्वान किया था। 

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ब्रिटेन के वर्ग को समझाने में कामयाब –

नौरोजी ब्रिटेन के एक बड़े वर्ग को समझाने कामयाब हो गए थे कि भारत को तत्काल सुधारों की आवश्यकता थी, वैसे ही जिस तरह महिलाओं को वोट के अधिकार कीया कामगारों को आठ घंटे काम करने के नियम की।  उन्हें मज़दूरों, उनके नेताओं, कृषिविदों, नारीवादियों और पादरियों के समर्थन के पत्र मिले थे। 

लेकिन ब्रिटेन में सभी एक भावी भारतीय सांसद से ख़ुश नहीं थे। कई लोग उन्हें “कार्पेटबैगर” और “हॉटेनटॉट” कह कर बुलाते थे। यहां तक कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री, लॉर्ड सैलिसबरी ने नौरोजी को एक “काला आदमी” बताया जो अंग्रेज़ों के वोट का हकदार नहीं था। लेकिन नौरोजी उतने लोगों तक अपनी बात पहुंचाने में कामयाब हो गए जितने वोटों की उन्हें ज़रूरत थी. 1892 में लंदन के सेंट्रल फिंसबरी से नौरोजी ने सिर्फ़ पांच वोटों से चुनाव जीता था।

इसके बाद उन्हें दादाभाई नैरो मेजोरिटी भी कहा जाने लगे थे। सांसद दादाभाई ने बिना समय गंवाए संसद में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन एक “दुष्ट” ताक़त है जिसने अपने साथी भारतीयों को ग़ुलाम जैसी स्थिति में रखा है। वह नियम बदलने और भारतीयों के हाथ में सत्ता देने के लिए क़ानून लाना चाहता थे। लेकिन उनकी कोशिशें नाकाम रहीं थी।

चुनाव में हार –

ज़्यादातर सांसदों ने उनके मांग पर ध्यान नहीं दिया, 1895 दोबारा चुनाव हुए और वह हार गए। नवरोजिने बुरे समय में उम्मीद नहीं छोड़ी वह नौरोजी के जीवन का सबसे ख़राब समय था। 1890 के दशक के अंत और 1900 के शुरुआती दिनों में, ब्रिटिश शासन और क्रूर हो गया था। अकाल और महामारी के कारण उपमहाद्वीप में लाखों लोग मारे गए, कई भारतीय राष्ट्रवादियों का मानना ​​था।

उनके प्रयास अंतिम मोड़ पर पहुंच चुके थे। लेकिन नौरोजी उम्मीद नहीं छोड़ी। उन्होंने अपनी मांगो में वृद्धि करते हुए अधिक प्रगतिशील निर्वाचन क्षेत्रों, प्रारंभिक मज़दूरों, अमेरिकी साम्राज्यवाद-विरोधी, अफ्रीकी-अमेरिकियों और काले ब्रिटिश आंदोलनकारियों को साथ लिया। उन्होंने ऐलान किया कि भारत को स्वराज की ज़रूरत थी और यही देश से बाहर जाते धन को रोकने का ज़रिया था। 

ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेनरी कैंपबेल-बैनरमैन से उन्होंने कहा कि यही उनके साम्राज्यवाद की ग़लतियों को सुधारने का तरीक़ा है। ये शब्द और विचार दुनिया भर में घूमने लगे। उन्हें यूरोप के समाजवादियों ने, अफ्रीकी-अमरीकी प्रेस ने, भारतीयों ने और गांधी की अगुवाई में दक्षिण अफ्रीका के लोगों ने हाथों हाथ लिया। स्वराज एक साहसिक मांग थी। 

राजनीतिक असफलता –

मानव इतिहास के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य से कमज़ोर अपना अधिकार कैसे ले सकते हैं? नौरोजी अपने आशावाद और कभी पीछे नहीं हटने वाली प्रवृति के साथ बने रहे। 81 साल की उम्र में अपने अंतिम भाषण में उन्होंने अपनी राजनीतिक असफलताओं को स्वीकार किया था। यहां तक कि, मुझे डर है, विद्रोह करने से डर लगता है.” हालांकि, विचारों में दृढ़ता, दृढ़ संकल्प और प्रगतिशील विचारों पर विश्वास ही सही विकल्प थे। 

उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्यों से कहा, “जैस-जैसे कि हम आगे बढ़ते हैं। हम ऐसे रास्तों को अपना सकते हैं जो उस मोड़ पर उपयुक्त हों, लेकिन में अंत तक टिके रहना होगा.”

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दादाभाई नौरोजी के विचारो का महत्व – Dadabhai Naoroji 

dadabhai naoroji views on the cause of poverty in india ऐसे शब्द आज की राजनीतिक बहसों के बारे में क्या बताते हैं ? आज एक सदी बाद, नौरोजी की भावनाएं बहुत सरल लग सकती हैं- लोक-लुभावनवाद, युगांतरकारी सत्तावाद और तीखे पक्षपात के युग में एक विचित्र रचनावाद हमारा दौर बहुत अलग है। वर्तमान में ब्रिटिश संसद वो एशियाई सांसद भी हैं जिनका शाही इतिहास पर अस्पष्ट दृष्टिकोण है और ब्रेक्सिट को लेकर अड़ियल रवैया भारत हिंदू राष्ट्रवाद की चपेट में है। 

जो पूरी तरह से अपने संस्थापक सिद्धांतों के खिलाफ़ है- सिद्धांत जिन्हें नौरोजी ने आकार देने में मदद की थी। नौरोजी जिन्होंने अध्ययन के माध्यम से अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाया, नक़ली समाचार और तथ्यहीन जानकारियों के इस दौर में उनकी क्या राय होती, ये अंदाज़ा लगाना मुमकिन नहीं है। फिर भी नौरोजी की दृढ़ता, प्रयास और प्रगति में विश्वास हमें आगे की राह तो दिखाते ही हैं। 

Dadabhai Naoroji Swaraj –

जब नौरोजी ने सार्वजनिक रूप से 1900 के दशक में स्वराज की मांग शुरू की, तो उन्होंने माना था कि इसे पाने में कम से कम 50 से 100 साल लगेंगे। ब्रिटेन अपने शाही चरम पर था और अधिकांश भारतीय स्वराज जैसे विचारों पर बात करने के लिए बहुत ग़रीब और पिछड़े। नौरोजी आज यह जानकर स्तब्ध रह जाते कि उनके पोते एक स्वतंत्र भारत में रहे हैं। और ब्रिटिश साम्राज्य के पतन के गवाह हैं। 

इससे कई महत्वपूर्ण सबक मिलते है – साम्राज्य गिर जाते हैं, निरंकुश शासन ख़त्म हो जाते हैं। लोगों की राय अचानक बदल जाती है। नौरोजी हमें दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देते हैं। वह हमें प्रगतिशील आदर्शों पर विश्वास बनाए रखने का आग्रह करते हैं और दृढ़ रहने के लिए कहते हैं।  दृढ़ता और फौलादी संकल्प सबसे अप्रत्याशित परिणाम दे सकते हैं- एक सदी पहले ब्रिटिश संसद के लिए भारतीय का चुनाव जीतने से भी अधिक अप्रत्याशित। 

दादा भाई नौरोजी के राजनीतिक विचार –

  • दादा भाई गोखले की भाति उदारवादी राष्ट्रवादी थे और अंग्रेजी में न्यायप्रियता में विश्वास रखते ।
  • भारत के लिए ब्रिटिश शासन को वरदान मानते थे ।
  • स्वदेशी और बहिष्कार का सांकेतिक रूप से प्रयोग करने पर दादा भाई बल देते थे ।
  • दादा भाई ने सर्वप्रथम भारत का आर्थिक आधार पर अध्ययन किया था। 

दादाभाई नौरोजी मौत  – Dadabhai Naoroji Death

अपने अंत के दिनों में दादाभाई अंग्रेजों द्वारा भारतीय पर हुए शोषण पर लेख लिखा करते थे, साथ ही इस विषय पर भाषण दिया करते थे। दादाभाई नौरोजी ने ही भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन की नींव की स्थापना की थी। 30 जून 1917 को 91 साल की उम्र में भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी दादाभाई नौरोजी का देहांत हो गया था। 

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Dadabhai Naoroji History Video –

Dadabhai Naoroji Interesting Facts –

  • 1906 में कांग्रेस पार्टी ने ब्रिटिश सरकार से पहली बार स्वराज की मांग की थी। इस बात को सबसे पहले दादाभाई ही सबके सामने लाये थे। 
  •  दादा भाई नौरोजी की किताबे की बात करे तो पावर्टी ऐंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया।जिससे भाषण, लेख,उच्चाधिकारियों से पत्रव्यवहार और निबंध और दादा भाई नौरोजी संगठनों की स्थापना दी गई है। 
  • ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की स्थापना दादाभाई ने सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारियों एव भारतीयों के सहयोग से1866 में लंदन में की थी।
  • दादा भाई नौरोजी के आर्थिक विचार ऐसे थे की भारतीयों की निर्धनता और अशिक्षा के लिए ब्रिटिश शासन को जिम्मेदार ठहराया था।
  • दादा भाई नौरोजी पुस्तके लिखे जिसमे निर्धनता और भारत में ब्रिटिश शासन का वर्णन मिलता है। 

Dadabhai Naoroji Questions –

1 .bharateey yogadaan mein daadaabhaee naurojee ka yogadaan kya hai ?

दादाभाई 1867 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्ववर्ती संगठन ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की स्थापना की 1874 में दादाभाई  बड़ौदा के राजा के प्रधानमंत्री बने थे। 

2 .daada bhaee naurojee ka janm kab hua tha ?

दादा भाई नौरोजी का जन्म 4 September 1825 के दिन हुआ था। 

3 .daada bhaee naurojee kee mrtyu kab huee thee ?

दादा भाई नौरोजी की मृत्यु 30 जून 1917 के दिन हुई थी

4 .daada bhaee naurojee ne sarvapratham raashtreey aay ka anumaan kab lagaaya ?

दादा भाई नौरोजी ने सर्वप्रथम राष्ट्रीय आय का अनुमान 1892 में लगाया था। 

5 .daada bhaee naurojee ne kis raajaneetik sanstha kee sthaapana kee ?

दादा भाई नौरोजी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस राजनीतिक संस्था की स्थापना की थी। 

6 .daada bhaee naurojee ne kis raajaneetik sanstha kee sthaapana kee ?

दादाभाई नौरोजी की प्रसिद्धि का मुख्य कारण ब्रिटिश और ब्रिटेन दोनों के द्वारा सम्मानित किया गया था।

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Conclusion –

आपको मेरा यह आर्टिकल Dadabhai Naoroji Biography In Hindi बहुत अच्छी तरह पसंद आया होगा । इस लेख के जरिये  हमने dadabhai naoroji quotes और dadabhai naoroji achievements से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दी है। अगर आपको इस तरह के अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है। तो आप हमें कमेंट करके जरूर बता सकते है। हमारे इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शयेर जरूर करे। जय हिन्द ।

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