Humayun Biography In Hindi – हुमायूँ की जीवनी हिंदी में

नमस्कार मित्रो आज के हमारे लेख में आपका स्वागत है आज हम Humayun Biography In Hindi में सम्राट बाबर का ज्येष्ठ पुत्र नासिरउद्दीन मुहम्मद हुमायूँ का जीवन परिचय बताने वाले है। 

उसका जन्म मार्च, 1508 में काबुल के किले में हुआ था. हुमायूँ की माता का नाम माहम बेगम था। माहम बेगम हिरात के हुसैन बैकरा की पुत्री थी। आज हम humayun tomb,humayun spouse और humayun nama की सारी बातोसे वाकिफ कराने वाले है। बाबर ने 1506 में माहम बेगम से शादी की थी। वह माहम बेगम को सबसे अधिक मानता था। बाबर को तीन और पुत्र थे जिसमें कामरान और असकरी का जन्म गुलरुख बेगम तथा हिंदाल जा जन्म दिलदार अगाची के कोख से हुआ था। 

हुमायूं के पिता का नाम बाबर था वह साहित्य, गणित, ज्योतिष, दर्शन, खगोल विद्या एवं चित्रकला के प्रति हुमायूँ की अभिरुचि अधिक थी। भारत में हुमायूँ ने हिंदी भाषा का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। आज के आर्टिकल में हुमायूँ की असफलता के कारण,हुमायूं के कितने पुत्र थे ? और हुमायूं की प्रारंभिक कठिनाइयां क्या थी उसकी असफलता के कारण बताइए तो हम इस सभी सवालों के जवाब इस पोस्ट के जरिये देने वाले है। 

Humayun Biography In Hindi –

 नाम   नासिरउद्दीन मुहम्मद हुमायूँ
 जन्म   मार्च, 1508
 जन्म स्थान   काबुल
 पिता  बाबर
 माता   माहम बेगम
 पत्नी  हमीदा बानू
 पुत्र   अकबर
 मृत्यु  जनवरी 1556

Humayun History In Hindi –

शुरुआत में humayun father बाबर का जीवन स्वयं संकटपूर्ण था , इसीलिए humayun childhood में शिक्षा का प्रबंध ठीक से नहीं कर पाया। लेकिन काबुल लौटने के बाद बाबर ने humayun education का प्रबंध किया। दो अध्यापकों की नियुक्ति बाबर करदी थी। वे थे मौलाना मसीह-अल-दीन रूहुल्ला और मौलाना इलियास दोनों सुयोग्य प्राध्यापक थे। हुमायूँ का अर्थ ही धन्य है होता है। 

उनके संरक्षण में हुमायूँ थोड़े ही दिनों में तुर्की, अरबी और फारसी भाषा का अच्छा ज्ञाता बन गया।  हुमायूँ ने 29 अगस्त 1541 को हिन्दाल के गुरु मीर अली अकबर जामी की पुत्री हमीदा बानू humayun wife से विवाह किया। 1542 में अमरकोट के किले में अकबर का जन्म हुआ। इस समय अमरकोट का शासक वीरसाल था।

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हुमायु का राज्याभिषेक –

हुमायूँ 22 वर्ष की अवस्था में 29 दिसंबर 1530 ई को बादशाह बना। हुमायूँ को साम्राज्य विरासत में मिला वो फूलों की सेज न होकर काँटों का ताज था। क्योंकि बाबर का जीवन संघर्षों और युद्धों में ही बीत गया। बाबर एक अच्छा सेनानायक व योद्धा था परन्तु वह एक अच्छा प्रशासक न था। इसलिए हुमायूँ को जो राज्य मिला वह पूरी तरह से अस्त व्यस्त और हमला खोरो से भरा था। हुमायूँ के तीन भाई कामरान, अस्करी और हिन्दाल  थे। 

हुमायु का व्यवहारिक जीवन –

about humayun मात्र बौद्धिक विकास से बाबर संन्तुष्ट नहीं था , वह हुमायूँ को व्यावहारिक जीवन में भी प्रशिक्षित करना चाहता था।  यही कारण था कि मात्र 21 वर्ष की आयु में ही उसे बदख्शां का सूबेदार नियुक्ति किया गया। बाबर के भारतीय अभियान में हुमायूँ ने बदख्शां से एक सैनिक टुकड़ी लेकर साहयता की। पानीपत और खानवा के मैदान में उसने बाबर के साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर युद्ध किया था। 

हुमायूँ की सैनिक क्षमता को ध्यान में रखकर बाबर ने उसे पुन बदख्शां का गवर्नर नियुक्त किया। बदख्शां में हुमायूँ 1527 ई. से 1529 ई. तक रहा था इस बिच उजवेगों को दबाने में हुमायूँ असफल रहा था । बाबर ने अपने गिरते हुए स्वास्थ्य को देखकर उसे आगरा बुला लिया, आगरा में कुछ दिन रहने के बाद हुमायूँ को संभल का जागीरदार नियुक्त किया गया ,संभल में हुमायूँ बीमार पड़ा। 

बीमारी की अवस्था में ही उसे आगरा लाया गया। बीमारी दूर होने जाने के बाद बाबर ने अपनी मृत्यु के निकट को देखते हुए सभी सरदारों की एक बैठक बुलाई और उसमें हुमायूँ को अपना उत्तराधिकार घोषित किया। 

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हुमायु की प्रारंभिक कठिनाइया –

मुग़ल साम्राज्य ज्वालामुखी के कगार पर खड़ा था,आंतरिक विद्रोह, साम्राज्य की अस्त-व्यस्तता, सगे-सम्बन्धियों की लोलुपता और सैनिकों के बीच असंतोष की स्थिति के कारण हुमायूँ के लिए दिल्ली की गद्दी फूलों की सेज के बदले काँटों का ताज साबित हुआ। विषम परिस्थिति को नियंत्रित करने के लिए कुशल, कूटनीतिज्ञ, योग्य सेनानायक और प्रतिभा के धनी शासक की अवाश्यकता थी। किन्तु दुर्भाग्यवश हुमायूँ की व्यक्तिगत खामियों के फलस्वरूप मुग़ल साम्राज्य की हालत बद-से-बदटार हो गई। 

उत्तराधिकार की रक्षा के लिए संघर्ष – 

बहुमुखी विरोध के बावजूद हुमायूँ राज्यारोहण के बाद मुग़ल साम्राज्य की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए सक्रिय था। प्रारम्भिक अवस्था में भाग्य ने हुमायूँ का साथ दिया। वह मुग़ल साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था। सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण ठिकानों पर उसने अधिकार कायम करने के लिए हुमायूँ के युद्ध आक्रमण की नीति अपनाई थी । 

हुमायु का चौसा का युद्ध ( सन 25 जून 1539 )

यह जगह गंगा और कर्मनाशा नदी के बीच का क्षेत्र है वहाँ पर हुमायूँ और शेरशाह के बीच युद्ध हुआ। इसी युद्ध के बाद शेरखां ने शेरशाह की उपाधि धारण की थी। इस युद्ध में हुमायूँ की हार हुयी। इसीयुद्ध के बाद निजाम भिश्ती ने हुमायूँ की जान बचाई। बाद में हुमायूँ ने इसे कुछ समय के लिए राजा बना दिया था। फरिश्ता के अनुसार आधे दिन के लिए। जौहर आफ़तावची के अनुसार दो घंटे के लिए। गुलबदन बेगम के अनुसार दो दिन के लिए भिश्ती को राजा बनाया था।

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अफगानोसे युद्ध –

हुमायूँ की सबसे बङी कठिनाई उसके अफगान शत्रु थे, जो मुगलों को भारत से बाहर खदेङने के लिए लगातार प्रयत्नशील थे। हुमायूँ का समकालीन अफगान नेता शेरखाँ था, जो इतिहास में शेरशाह सूरी के नाम से विख्यात हुआ। हुमायूँ का कालिंजर आक्रमण मूलत बहादुर शाह की बढती हुई शक्ति को रोकने का प्रयास था। हुमायूँ के राजत्व काल में उसका अफगानों से पहला मुकाबला 1532ई. में दोहरिया नामक स्थान पर हुआ।

अफगानों का नेतृत्व महमूद लोदी ने किया। लेकिन अफगानों की पराजय हुई। 1532ई में जब हुमायूँ ने पहली बार चुनार का घेरा डाला । उस समय यह किला अफगान नायक शेरखाँ के अधीन था। शेरखाँ ने हुमायूँ की अधीनता स्वीकार ली तथा अपने लङके कुतुब खाँ के साथ एक अफगान सैनिक टुकङी मुगलों की सेवा में भेज दी। 1532ई. में बहादुर शाह ने रायसीन के महत्वपूर्ण किले को जीत लिया एवं 1533ई. में मेवाङ को संधि करने के लिए विवश किया।

बहादुरशाह ने टर्की के प्रसिद्ध तोपची रूमी खाँ की सहायता से एक अच्छा तोपखाना तैयार कर लिया था। हुमायूँ ने 1535-36ई. में बहादुर शाह पर आक्रमण कर दिया। बहादुरशाह पराजित हुआ। हुमायूँ ने माण्डू और चंपानेर के किलों को जीत लिया। 1534ई. में शेरशाह की सूरजगढ विजय तथा 1536ई. में फिरसे बंगाल को जीतकर बंगाल के शासक से 13 लाख दीनार लेने से शेरखाँ के शक्ति और सम्मान में बहुत अधिक वृद्धि हुई। फलस्वरूप शेरखाँ को दबाने के लिए हुमायूँ ने चुनारगढ का 1538ई. में दूसरा घेरा डाला और किले पर अधिकार कर लिया।

अकबर का जन्म –

बादशाह अकबर son of humayun 15अगस्त 1538ई. को जब हुमायूँ गौङ पहुँचा तो उसे वहाँ चारों ओर लाशों के ढेर तथा उजाङ दिखाई दिया। हुमायूँ ने इस स्थान का नाम जन्नताबाद रख दिया।बंगाल से लौटते समय हुमायूँ एवं शेरखाँ के बीच बक्सर के निकट चौसा नामक स्थान पर 29जून1539 को युद्ध हुआ जिसमें हुमायूँ की बुरी तरह पराजय हुई। हुमायूँ अपने घोङे सहित गंगा नदी में कूद गया और एक भिश्ती की सहायता से अपनी जान बचायी। हुमायूँ ने इस उपकार के बदले उसे भिश्ती को एक दिन का बादशाह बना दिया था।

विजय के पलस्वरूप शेरखाँ ने शेरशाह की उपाधि धारण की। तथा अपने नाम का खुतबा पढवाने और सिक्का ढलवाने का आदेश दिया 17मई1540ई. में कन्नौज ( बिलग्राम ) के युद्ध में हुमायूँ पुनः परास्त हो गया यह युद्ध बहुत निर्णायक युद्ध था। कन्नौज के युद्ध के बाद हिन्दुस्तान की सत्ता एक बार फिर अफगानों के हाथ में आ गयी। अपने निर्वासन काल के ही दौरान हुमायूँ ने हिन्दाल के आध्यात्मिक गुरू मीर अली की पुत्री हमीदाबानों बेगम से 29अगस्त 1541ई. में विवाह किया कालांतर में इसी से अकबर का जन्म हुआ।

हुमायु की कन्नौज – बिलग्राम की लड़ाई (17 मई 1540) अवं निर्वासित जीवन –

इस युद्ध में हुमायूँ हार गया और निर्वासित हो गया। कन्नौज से हारने के बाद वह क्रमश आगरा, दिल्ली और सिंध गया। बाद में बैरम खां की सलाह पर वह ईरान के शाह तहमास्प के दरबार में पहुँचा। यहाँ पर उसने शिया धर्म स्वीकार कर लिया। हुमायूँ ने तहमास्प से संधि की कि वह कांधार विजित कर उसे दे देगा। 1545 ईo में उसने कांधार जीतकर शाह को दे दिया। आगे शाह ने काबुल व गजनी को जीतने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। तब हुमायूँ ने कांधार को फिरसे अपने नियंत्रण में ले लिया। इसके बाद उसने काबुल जीता। इसी समय हुमायूँ की तरफ से युद्ध करते हुए हिन्दाल मारा गया था ।

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हुमायु ने कालिंजर पर आक्रमण किया –

Humayun – कालिंजर बुन्देलखंड में था. सैनिक रिष्टि से कालिंजर एक महत्त्वपूर्ण दुर्ग था ,कालिंजर का शासक प्रतापरूद्र कालपी पर अधिकार करना चाहता था। राज्यारोहण के पाँच महीने के बाद हुमायूँ ने कालिंजर पर 1531 ई. में आक्रमण किया। कालिंजर के दुर्ग पर मुग़ल सेना का घेरा कई महीने तक रहा था। इस बीच महमूद लोदी ने जौनपुर और उसके निकटवर्ती क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। ऐसी स्थिति में हुमायूँ ने कालिंजर के शासक के साथ समझौता कर लिया था। 

कालिंजर के राजा प्रतापरूद्र ने हुमायूँ की अधीनता स्वीकार कर ली थी। हुमायूँ को उपहार के रूप में बारह मन सोना प्राप्त हुआ था ।  कालिंजर का राज्य नष्ट नहीं हुआ था। प्रतापरूद्र हुमायूँ का शत्रु बन गया और वह विरोधी अफगानों को सहायता देने लगा. इस प्रकार कालिंजर अभियान हुमायूँ की भूल थी। 

हुमायु का महमूद लोदी के विरुद्ध संघर्ष –

महमूद लोदी ने अफगानों को संगठित कर जौनपुर और आसपास के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया,हुमायूँ ने महमूद लोदी को दबाने के उदेश्य से कालिंजर का घेरा उठा लिया और आगरा लौटकर एक विशाल सेना के साथ जौनपुर ओअर अधिकार कर लिए. इस घटना के बाद महमूद लोदी मुग़ल साम्राज्य के विरुद्ध आक्रमण करने का साहस नहीं जुटा पाया।

कामरान का विद्रोह –

हुमायूँ को अफगानों एवं मिर्जाओं के साथ उलझा हुआ देखकर कामरान ने अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने का निश्चय कर लिया. उसने अफगानिस्तान का प्रबंध असकरी को सौंपकर पंजाब,मुल्तान और लाहौर पर अधिकार कर लिया. हुमायूँ को विवशता में पंजाब, मुल्तान और लाहौर पर कामरान के अधिकार को मान्यता देनी पड़ी थी। 

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चुनार का घेरा –

चुनार का दुर्ग शेर खां के अधिकार में था,शेर खां कुशल कूटनीतिज्ञ था,वह मुगलों के साथ प्रत्यक्ष युद्ध कर अपनी सैन्य शक्ति को नष्ट करना नहीं चाहता था, इसलिए उसने हुमायूँ के साथ समझौता कर लिया। हुमायूँ भी गुजरात के शासक बहादुरशाह को दबाना चाहता था।  संधि के लिए जब शेर खां के द्वारा पहल की गई तो हुमायूँ ने उसे स्वीकार कर लिया। चुनार का दुर्ग शेर खां को सौंप दी गई। 

शेर खां ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली और 500 अफगान सैनिकों ले साथ अपने पुत्र क़ुतब खां को हुमायूँ की सेवा में भेज दिया था। हुमायूँ शेर खां की चाल समझ नहीं पाया। शेर खां अपनी शक्ति बचाकर बंगाल-विजय करने में सफल हो गया चुनार का दुर्ग शेर खां को सौंप कर हुमायूँ ने भूल करदी थी। 

हुमायु की पुन राज्य प्राप्ति – 

सन1545 में हुमायूँ ने काबुल और कंधार पर अधिकार कर लिया। हिन्दुस्तान पर फिरसे अधिकार करने के लिए हुमायूँ 4 दिसंबर 1554 ई. को पेशावर पहुँचा। फरवरी 1555 ई. में लाहौर पर अधिकार कर लिया। 15मई 1555 ई. को ही मुगलों और अफगानों के बीच सरहिन्द नामक स्थान परयुद्ध हुआ इस युद्ध में अफगान सेना का नेतृत्व सिकंदर सूर तथा मुगल सेना का नेतृत्व बैरम खाँ ने किया ।

Humayun  – अफगान बुरी तरह पराजित हुए। सरहिन्द के युद्ध में मुगलों की विजय ने उन्हें भारत का राज सिंहासन एक बार फिर से प्रदान कर दिया। इस प्रकार 23 जुलाई 1555 ई. हुमायूँ एक बार फिर से दिल्ली के तख्त पर बैठा।किन्तु वह बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह सका। दुर्भाग्य से एक दिन जब वह दिल्ली में दीनपनाह भवन में स्थित पुस्तकालय की सीढियों से उतर रहा ता वह गिरकर मर गया। और इस प्रकार वह जनवरी 1556ई. में इस संसार से विदा हो गया। 

लेनपूल ने हुमायूँ पर टिप्पणी करते हुए कहा -“हुमायूँ जीवनभर लङखङाता रहा और लङखङातें हुए अपनी जान दे दी।” हुमायूँ ज्योतिष में एधिक विश्वास करता था। इसलिए वह सप्ताह में सातों दिन सात रंग के कपङे पहनता था। मुख्यत वह इतवार को पीले, शनिवार को काले एवं सोमवार को सफेद रंग के कपङे पहनता था। हुमायूँ अफीम का बहुत शौकीन था। मुगल बादशाहों में हुमायूँ ही एकमात्र शासक था जिसने अपने भाइयों में साम्राज्य का विभाजन किया था।

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हुमायु की मृत्यु – Humayun Death

जनवरी 1556 में दीनपनाह नगर में पुस्तकालय ( शेरमण्डल ) की सीढ़ियों से गिरकर हुमायूँ की मृत्यु हो गयी। इसकी मृत्यु का समाचार 17 दिनों तक गुप्त रखा गया। इसके लिए मुल्ला बेकसी ( हुमायूँ का हमशक्ल ) का जनता को दर्शन कराया गया। इसकी मृत्यु पर लेनपूल ने कहा “जीवन भर लुढ़कते रहने के बाद अंत में हुमायूँ की मृत्यु लुढ़ककर ही हो गयी”। हुमायूँ के मकबरे का निर्माण (humayun ka maqbara builtby )उसकी पत्नी हाजी बेगम ने दिल्ली में कराया। इसी के मकबरे को एक वफादार बीबी की महबूबाना पेशकश कहा जाता है।

Humayun History Video –

Humayun Interesting Fact –

  • 1531 ईo में अपने पहले अभियान में कालिंजर के चंदेल शासक प्रताप रुद्रदेव को हराया।
  • 1533 ईo में दीनपनाह नगर की स्थापना की थी।
  • हुमायूँनामा की रचना गुलबदन बेगम ने की।
  • हुमायूँ ज्योतिष में विश्वास करता था और सप्ताह के सातों दिन अलग-अलग रंग के कपड़े पहनता था।
  • भाइयों में साम्राज्य का बंटवारा करने वाला एक मात्र मुग़ल शासक।

Humayun Questions

हुमायूं नामा किसने लिखा था ?
गुलबदन बेगम हुमायूं की सौतेली बहन थी। उसे अपने भाई हुमायूं के जीवन चित्र हुमायूं नामा को लिखा है।
अकबर के पुत्र का नाम ?

मुग़ल सम्राट अकबर के तीन बेटे थे ,दो बेटों मुराद और दानियाल की मौत हुई थी एव सलीम पिता की मृत्यु के बाद जहाँगीर के नाम से राजा बना था।

हुमायूं की कितनी पत्नियां थी ?
हमीदा बानु बेगम,बेगा बेगम,बिगेह बेगम,चाँद बीबी,हाजी बेगम ,माह-चूचक मिवेह-जान शहज़ादी खानम हुमायूं की पत्नियां थी। 
हुमायूं की मृत्यु कैसे हुई ?
1 जनवरी 1556 को दीन पनाह भवन में सीढ़ियों से गिरने से हुमायूं की मौत हो गई थी। 
हुमायूं की प्रारंभिक कठिनाइयां क्या थी ?
उनके भाइयों और रिश्तेदारों का अनुचित व्यवहार,.अफ़गानों और राजपूतों का शत्रुता मुख्य था।

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Conclusion –

दोस्तों आशा करता हु आपको मेरा यह आर्टिकल हुमायूँ ki history in hindi बहुत अच्छी तरह से समज और पसंद आया होगा। इस लेख के जरिये  हमने  humayun death reason और humayun achievements से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दे दी है। अगर आपको इस तरह के अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है। तो आप हमें कमेंट करके जरूर बता सकते है। और हमारे इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शयेर जरूर करे। जय हिन्द ।

2 thoughts on “Humayun Biography In Hindi – हुमायूँ की जीवनी हिंदी में”

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