Veer Kunwar Singh Biography In Hindi – वीर कुंवर सिंह की जीवनी

नमस्कार मित्रो आज के हमारे आर्टिकल में आपका स्वागत है आज हम Veer Kunwar Singh Biography In Hindi में भारत के स्वतंत्रता सेनानी कुंवर सिंह का जीवन परिचय देने वाले है। 

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा कुंवर सिंह ने जगदीशपुर को अंग्रेजों के कब्जे से आजाद कराया था। और वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराया था।  कुंवर सिंह 1857 की क्रांति के ऐसे नायक थे। जिन्होंने अपनी छोटी-सी रियासत की सेना के दम पर आरा से लेकर रोहतास, कानपुर, लखनऊ, रीवां, बांदा और आजमगढ़ तक में अंगरेजी सेना से निर्णायक लड़ाइयां लड़ीं।  और कई जगह जीत हासिल की थी। आज हम kunwar singh last words , kunwar singh postman और veer kunwar singh was an old zamindar from जगदीशपुर की सभी माहिती देंगे। 

80 साल की उम्र में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जिस अदम्य साहस का उन्होंने परिचय दिया, वह अतुलनीय है , वे एक अच्छे राजा, महान योद्धा व बेहतरीन इंसान भी थे. उनका प्रभाव वर्तमान झारखंड से लेकर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तक फैला हुआ था। हम 1857 के विद्रोह में कुंवर सिंह की भूमिका का वर्णन करने वाले है। वीर कुंवर सिंह जीवनी में कुंवर सिंह ने अपनी चतुराई कैसे दिखाई और अंग्रेजो को धूल चटाई थी वह बातो से आपको रूबरू करवाते है। 

Veer Kunwar Singh Biography In Hindi –

नाम  वीर कुंवर सिंह
जन्म   नवंबर, साल 1777,
जन्म स्थान  जगदीशपुर, भोजपुर जिला, बिहार
पिता  बाबू साहबजादा सिंह
माता  रानी पंचरतन देवी
मृत्यु  26 अप्रैल 1858

वीर कुंवर सिंह की जीवनी –

साल 1777 में बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में वीर कुंवर का जन्म हुआ। बचपन खेल खेलने की बजाय घुड़सवारी, निशानेबाज़ी, तलवारबाज़ी सीखने में बीता था उन्होंने मार्शल आर्ट की भी ट्रेनिंग ली थी , माना जाता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज के बाद भारत में वह दूसरे योद्धा थे, जिन्हें गोरिल्ला युद्ध नीति की जानकारी थी। अपनी इस नीति का उपयोग उन्होंने बार-बार अंग्रेजों को हराने के लिए किया था ।

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Veer Kunwar Singh की 1857 के स्वातंत्र संग्राम में भूमिका –

साल 1857 में जब प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा तब वीर कुंवर की आयु 80 बरस की थी। इस उम्र में अक्सर लोग आरामदेह जीवन व्यतीत करना चाहते हैं और अगर वीर कुंवर भी चाहते तो कर सकते हैं। लेकिन उन्होंने संग्राम में अपने सेनानी भाइयों का साथ देते हुए अंग्रेजों का डटकर मुकाबला करने की ठानी। उनके दिल में देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। उन्होंने तुरंत अपनी शक्ति को एकजुट किया और अंग्रेजी सेना के खिलाफ मोर्चा संभाला। उन्होंने अपने सैनिकों और कुछ साथियों के साथ मिलकर सबसे पहले आरा नगर से अंग्रेजी आधिपत्य को समाप्त किया।

आजादी पाने की पहली लड़ाई के दौरान जब नाना साहब, तात्या टोपे, महारानी रानी लक्ष्मी बाई, बेगम हजरत महल जैसे महान शूरवीर अपने-अपने राज्यों को अंग्रेजों के कब्जे से बचाने के लिए युद्ध कर रहे थे, उसी दौरान बाबू वीर कुंवर सिंह (Veer Kunwar Singh) ने भी ब्रिटिश शासकों के खिलाफ लड़ रहे बिहार के दानापुर के क्रांतिकारियों का नेतृत्व कर अपनी कुशल सैन्य का परिचय दिया था।

Veer Kunwar Singh का जन्म और विवाह –

1857 की क्रांति के इस महान योद्धा और सूरवीर ने नवंबर साल 1777 में बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में एक उज्जैनिया राजपूत घराने में जन्म लिया था। उनके पिता का नाम बाबू साहबजादा सिंह था, जो कि भोजपुर जिले के उज्जैनिया राजपूत वंश के रियासतदार शासक थे और मां रानी पंचरतन एक घरेलू गृहिणी थी। वहीं साल 1826 में पिता की मौत के बाद कुंवर सिंह को जगदीशपुर के तालुकदार बनाया गया, जबकि उनके दोनों भाई हरे कृष्णा और अमर सिंह उनके सिपहसालार बनें थे। 

जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध उनका साथ दिया था। इसके अलावा उनके ही परिवार के गजराज सिंह, उमराव सिंह और बाबू उदवंत सिंह ने भी भारत की पहली आजादी की लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई थी। वहीं राजपूत राजघराने में पैदा होने की वजह से बाबू कुंवर सिंह के पास काफी जागीर थी, वे जाने-माने बड़े जमींदार थे, हालांकि बाद में उनकी जागीर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की दमनकारी नीतियों के चलते छीन ली गई थी, जिससे उनके मन में अंग्रेजों के खिलाफ रोष पैदा हो गया था।

वहीं कुंवर सिंह के अंदर बचपन से ही देश को आजाद करवाने की आग प्रज्वलित थी, इसी वजह से उनका मन शुरु से ही शौर्य युक्त कामों में ज्यादा लगता था। कुंवर का विवाह मेवारी के सिसोदिया राजपूताना शासक फतेह नारायण सिंह की बेटी के साथ हुआ था, जो कि बिहारसिंह जिले के बडे़ और समृद्ध जमींदार और मेवाड़ के महाराणा प्रताप के वंशज भी थे।

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Veer Kunwar Singh ने अंग्रेजों का विरोध –

साल 1848 – 49 में जब क्रूर अंग्रेजी शासकों की विलय नीति से बड़े-बड़े शासकों के अंदर डर जाग गया था। उस समय कुंवर वीर सिंह, अंग्रेजों के खिलाफ भड़ उठे। वहीं इसके बाद अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए हिंदु और मुसलमान दोनों एक जुट हो गए। दरअसल, अंग्रेजों की अत्याचारी नीतियों के कारण किसानों के अंदर भी रोष पैदा हो गया था। वहीं इस दौरान सभी राज्यों के राजा अंग्रेजों के खिलाफ विरोध कर रहे थे। 

इसी वक्त बिहार के दानापुर रेजिमेंट, रामगढ़ के सिपाहियों और बंगाल के बैरकपुर ने अंग्रेजो के खिलाफ धावा बोल दिया। इसके साथ ही इसी दौरान मेरठ, लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, झांसी और दिल्ली में भी विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। इस दौरान वीर कुंवर सिंह ने अपने साहस, पराक्रम और कुशल सैन्य शक्ति के साथ इसका नेतृत्व किया और ब्रिटिश सरकार को उनके आगे घुटने टेंकने को मजबूर कर दिया था।

आजमगढ़ की आजादी –

अपने अभियान के दौरान कुंवर सिंह ने आरा शहर और जगदीशपुर को तो आजाद कराया ही, साथ ही आजमगढ़ को भी आजाद कराया. आजमगढ़ को आजाद कराने में भी उनकी सूझबूझ कारगर साबित हुई। उन्होंने देखा कि आजमगढ़ से सैनिक लखनऊ भेजे गये हैं, तो उन्होंने मौके का फायदा उठाकर आजमगढ़ पर कब्जा कर लिया और उनकी वजह से आजमगढ़ 81 दिनों तक आजाद रहा था।

 जगदीशपुर की आजादी –

25 जुलाई, 1857 को जब आरा शहर पर विद्रोहियों का कब्जा हो गया था तो कुंवर सिंह ने तत्काल आरा शहर के प्रशासन को सुव्यवस्थित किया. हालांकि आजादी चंद दिनों की ही थी। मगर उनके शासन प्रबंध की लोग खूब तारीफ करते थे. उनकी आखिरी जीत जगदीशपुर की आजादी थी. आजमगढ़ से जब वे लौटे तो सीधे जगदीशपुर पहुंचे थे। 

हालांकि रास्ते में एक युद्ध के दौरान उनकी बांह में गोली लग गयी थी और जैसा कि हर कोई जानता है कि संक्रमण से बचने के लिए उन्होंने खुद ही अपनी बांह काटकर गंगा को अर्पित कर दिया था. फिर वे जगदीशपुर पहुंचे और शानदार जीत हासिल की. 26 अप्रैल तक वे जीवित रहे. ये चार दिन आजादी के थे।

धरमन बाई के लिए मस्जिदे बनवायीं –

Kunwar Singh को देखने का हमारा नजरिया बदल गया है. हम उन्हें खास जाति तक सीमित कर देखते हैं, मगर जब जानेंगे कि उस वक्त उनके अगल-बगल सहयोगी कौन थे, तो नजरिया बदल जायेगा उनकी दूसरी पत्नी धरमन बाई मुसलिम थीं. धरमन उनके साथ युद्ध अभियान में भी गयी थीं. उन्होंने कुंवर सिंह को आर्थिक सहयोग भी किया. कुंवर सिंह ने धरमन के लिए आरा शहर में दो मसजिदें बनवायीं थी। 

उनकी बहन करमन बाई के नाम पर आज भी आरा शहर में एक मोहल्ला है. युद्ध व प्रशासन में उनके सहयोगी सभी समुदाय के थे. वे सवर्ण थे, मगर अंग्रेजों ने कई जगह लिखा है कि आरा के विद्रोह में ज्यादातर निचले तबके के लोगों ने सक्रिय भागीदारी की थी. उनमें कुंवर सिंह को लेकर गजब का क्रेज था। 

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 अदालत में लगी पुकार-आरा शहर हाजिर हो –

कटघरे में शहर : स्वतंत्रता संग्राम में पूरे भारत में एकमात्र किसी शहर पर चला था बगावत का मुकदमा पूरे भारत में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एकमात्र शहर आरा पर बगावत के आरोप में मुकदमा चला था. इसमें अभियुक्त कोई व्यक्ति नहीं, आरा शहर था। शहर पर 1858 के अधिनियम X के तहत बगावत का आरोप था. सुनवाई कर रहे मजिस्ट्रेट डब्ल्यू जे हर्शेल के सामने आरोप से संबंधित सबूत व गवाह पेश किये गये थे. ‘गवर्नमेंट वर्सेस द टाउन ऑफ आरा’ मुकदमा 1859 में चला था। 

दरअसल, अंग्रेज पूरे आरा शहर से आरा हाउस की घेराबंदी का बदला लेना चाहते थे. आरा पर कब्जा के बाद 6 अगस्त, 1857 को ड्रम-हेड कोर्ट मार्शल के तहत 16 लोगों को फांसी देने के बाद भी अंग्रेजों की नाराजगी शांत नहीं हुई थी। आंदोलन में पूरे शहर के लोगों की भागीदारी से वे काफी नाराज थे. उस वक्त आरा के सत्र न्यायाधीश आर्थर लिटिलडेल थे. वे 26 जुलाई से 2 अगस्त तक आरा हाउस में घिरे हुए थे। 

3 अगस्त को मेजर विन्सेंट आयर के फैजी दल द्वारा गजराजगंज-बीबीगंज में मुठभेड़ के बाद आरा पर फिर से कब्जा कर लेने के दिन से कोर्ट मार्शल की डायरी लिटिलडेल ने रखनी शुरू की 6 अगस्त के कोर्ट मार्शल का वर्णन डायरी में था. जिन 16 लोगों को फांसी दी गयी थी, उनमें से तीन आरा शहर के थे. फांसी पर चढ़े गुलाम याह्मया कुंवर सिंह के वकील थे और उन्हें आरा का प्रोभेस्ट मार्शल कुंवर सिंह ने नियुक्त किया था. विद्रोहियों द्वारा गठित सरकार में मजिस्ट्रेट की भूमिका इन्होंने निभायी थी। 

शहरवासियों को आरोपमुक्त किया –

उम्र के आखिरी पड़ाव में मनवाया अपनी बहादुरी और शौर्य लोहा -मैं आरा शहरवासियों को आरोपमुक्त करता हूं सबूतों और गवाहों के बाद मजिस्ट्रेट हर्शेल ने फैसले में कहा- उस समय शहर जो भी सजा का अधिकारी रहा हो, दो साल बीत जाने के बाद मामला बदल गया है. शहर ने क्या नहीं किया उसकी जगह इस बात पर जोर देना चाहिए कि शहर ने क्या किया था। प्रामाणिक रूप से यह बात स्थापित हो चुकी है कि लोगों ने देसी अधिकारियों की उस समय रक्षा की जब सारा शहर बागी सिपाहियों से भरा हुआ था। 

इन अधिकारियों की सरगर्मी से तलाश की जा रही थी. शहर के लोगों ने उस समय क्षतिग्रस्त मकान की मरम्मत के लिए खर्च करने की पेशकश की बाद में सरकारी सैनिकों की अनुपस्थिति का फायदा उठा कर विद्रोहियों ने शहर पर फिर हमला बोला, तो शहर के लोगों ने प्रतिरोध किया. लोगों ने कुछ अवसरों पर जो उदासीनता दिखायी, वह दुखद है। मेरे विचार में शहर और वासियों का आचरण अन्य जिले-शहर की तुलना में बेहतर है, इसलिए मैं शहरवासियों को आरोपमुक्त करता हूं। 

80 साल के कुंवर सिंह से अंग्रेज डरते थे। 

प्रदेश सरकार ने हर्शेल के निर्णय को न्यायपूर्ण बताया और आयुक्त को निर्देश दिया कि आरा शहर पर दंड लगाने के पहले प्रस्ताव पर वहीं 1857 में जब भारत के सभी हिस्सों में लोग अंग्रेजों के खिलाफ विरोध कर रहे थे, उस समय बाबू कुंवर सिंह अपने उम्र के आखिरी पड़ाव में थे, उनकी उम्र उस समय 80 साल थी, तभी ब्रिटिशों के खिलाफ नेतृत्व करने का उन्हें संदेश आया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया था। 

क्योंकि उनके मन में अंग्रेजों के खिलाफ इतना गुस्सा भरा था और कुंवर सिंह को भारत को आजादी दिलवाने की इतनी छटपटाहट थी कि इस उम्र में भी उन्होंने अपने अदभुत साहस, धैर्य और वीर पराक्रम के साथ अंग्रेजों का डटकर सामना किया। यही नहीं उन्होंने अंग्रेजों के कार्यालयों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया, सरकारी खजाने को लूट लिया, यहां तक की जगदीशपुर में अंग्रेजों का झंडा उखाड़कर अपना झंडा फहराकर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए।

वहीं इसके बाद जब वे अपनी पलटन के साथ गंगा नदी पार कर रहे थे तब इस दौरान चुपचाप ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिकों उन्हे घेर लिया। अंग्रेजी सैनिकों ने गोलीबारी की जिससे कुंवर सिंह के एक हाथ में अंग्रेजों की गोली लग गई, जिसे उन्होंने अपना अपमान समझा और फिर तलवार से अपनी एक बांह काट कर गंगा नदी को समर्पित कर दी और एक हाथ से ही दुश्मनों का सामना किया।

किताबों और फिल्मों में Kunwar Singh –

कुंवर सिंह पर कई किताबें लिखी गयीं. इनमें से सबसे महत्वपूर्ण काली किंकर दत्त द्वारा लिखित पुस्तक बायोग्राफी ऑफ कुंवर सिंह एवं अमर सिंह है, जिसे पटना के केपी जायसवाल इंस्टीट्यूट ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शताब्दी वर्ष के मौके पर 1957 में प्रकाशित किया था. नेशनल बुक ट्रस्ट ने हिंदी में कुंवर सिंह और 1857 की क्रांति नामक पुस्तक का प्रकाशन किया था, जिसके तीन लेखक हैं- डॉ सुभाष शर्मा, अनंत कुमार सिंह और जवाहर पांडेय। 

श्रीनिवास कुमार सिन्हा ने पुस्तक लिखी है, वीर कुंवर सिंह, द ग्रेट वारियर ऑफ 1857. इसे कोणार्क प्रकाशन ने 1997 में प्रकाशित किया है. कुंवर सिंह के जीवन पर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक प्रकाश झा ने एक धारावाहिक का निर्माण भी किया था. 1992 में बने इस धारावाहिक का नाम था विद्रोह. इस धारावाहिक की शूटिंग बेतिया में हुई थी. विजय प्रकाश इसके लेखक थे और सतीश आनंद ने कुंवर सिंह की भूमिका निभायी थी। 

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Veer Kunwar Singh Death –

कुँवर सिंह सेना के साथ बलिया के पास शिवपुरी घाट से रात्रि के समय कश्तियों में गंगा नदी पार कर रहे थे तभी अंग्रेजी सेना वहां पहुंची और अंधाधुंध गोलियां चलाने लगी वीर कुंवर सिंह इस दौरान घायल हो गए और एक गोली उनके बांह में लगी. 23 अप्रैल 1858 को वे अपने महल में वापिस आए लेकिन आने के कुछ समय बाद ही 26 अप्रैल 1858 को उनकी मृत्यु हो गयी.

23 अप्रैल 1966 को भारत सरकार ने उनके नाम का मेमोरियल स्टैम्प भी जारी किया. कुंवर सिंह न केवल 1857 के महासमर के सबसे महान योद्धा थे बल्कि ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने उनके बारे में लिखा है, “उस बूढ़े राजपूत ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध अद्भुत वीरता और आन-बान के साथ लड़ाई लड़ी. वह जवान होते तो शायद अंग्रेजों को 1857 में ही भारत छोड़ना पड़ता.” इन्होंने 23 अप्रैल 1858 में, जगदीशपुर के पास अंतिम लड़ाई लड़ी थी।

Veer Kunwar Singh Biography Video – 

Veer Kunwar Singh से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य –

  • बाबू कुंवर सिंह का जन्म 1777 को बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में हुआ था।
  • इनका पूरा नाम बाबू वीर कुंवर सिंह था।
  • इनके पिता का नाम बाबू साहबजादा सिंह प्रसिद्ध शासक भोज के वंशजों में से थे।
  • 27 अप्रैल 1857 को दानापुर के सिपाहियों, भोजपुरी जवानों और अन्य साथियों के साथ आरा नगर पर बाबू वीर कुंवर सिंह ने कब्जा कर लिया था।
  • कुंवर सिंह न केवल 1857 के महासमर के सबसे महान योद्धा थे, बल्कि वह इस संग्राम के एक वयोवृद्ध योद्धा भी थे।
  • बाबू कुंवर सिंह की बदौलत अंग्रेजों की लाख कोशिशों के बाद भी भोजपुर लंबे समय तक स्वतंत्र रहा था।
  • कुंवर सिंह ने अपनी 80 साल की उम्र में लडाई लड़ी थी।
  • 23 अप्रैल, 1858 को जगदीशपुर के लोगों ने उनको सिंहासन पर बैठाया और राजा घोषित किया था।
  • ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने उनके बारे में लिखा है, ‘उस बूढ़े राजपूत ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध अद्भुत वीरता और आन-बान के साथ लड़ाई लड़ी।
  • इन्होंने 23 अप्रैल 1858 में, जगदीशपुर के पास अंतिम लड़ाई लड़ी थी।

कुंवर सिंह के प्रश्न –

1 .कुंवर सिंह के पिता कौन थे ?

बाबू साहबजादा सिंह कुंवर सिंह के पिता थे। 

2 .वीर कुंवर सिंह का जन्म कब और कहां हुआ था ?

13 नवंबर 1777 के दिन कुंवर सिंह का जन्म बिहार के जगदीशपुर में हुआ था। 

3 .वीर कुंवर सिंह ने क्या क्या सामाजिक कार्य किए ?

कुंवर सिंह ने निर्धनों की सहायता की, कुएं खुदवाये और तालाब बनवाये खुदवाये थे। 

4 .कुंवर सिंह का कौन सा हाथ बेकार हो गया था ?

कुंवर सिंह का दाया हाथ बेकार हो चूका था। 

5 .कुंवर सिंह कौन थे उनकी मृत्यु कैसे हुई ?

अंधाधुंध गोलियां चलाने लगी के कारन 26 अप्रैल 1858 को कुंवर सिंह की मृत्यु हो गयी थी। 

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Conclusion –

दोस्तों आशा करता हु आपको मेरा यह आर्टिकल Kunwar Singh Biography In Hindi बहुत अच्छी तरह से समज आ गया होगा। इस लेख के जरिये  हमने veer kunwar singh in hindi और how did kunwar singh died से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दे दी है अगर आपको इस तरह के अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है तो आप हमें कमेंट करके जरूर बता सकते है। और हमारे इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शयेर जरूर करे। जय हिन्द ।

2 thoughts on “Veer Kunwar Singh Biography In Hindi – वीर कुंवर सिंह की जीवनी”

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