Madhav Rao Peshwa Biography In Hindi – माधव राव पेशवा की जीवनी

नमस्कार मित्रो आज के हमारे लेख में आपका स्वागत है आज हम Madhav Rao Peshwa Biography In Hindi मे  बहुत ही धार्मिक, निष्कपट, कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व वाले माधव राव पेशवा जीवन परिचय बताने वाले है। 

पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों की भयानक हार के बाद पेशवा बनने वाले माधव राव बचपन से ही प्रतिभाशाली और जनकल्याण की भावना से ओत-प्रोत थे। वह एक सफल राजनीतिज्ञ कुशल व्यवस्थापक और दक्ष सेनानी भी रह चुके हैं। आज हम madhavrao peshwa death reason ,madhavrao peshwa son और madhavrao peshwa father की जानकारी बताने वाले है। माधवराव के अंदर उनके पाता बालाजी विश्वनाथ की दूरदर्शिता, बाजीराव की संलग्नता व नेतृत्वशक्ति के अलावा भरपूर क्षमता थी। 

पानीपत की पराजय से पीड़ित माधवराव का शासनकाल 11 वर्ष का रहा जिसमें से 2 वर्ष उनका गृह युद्ध में बीता और अंतिम वर्ष यक्ष्मा जैसे घातक रोग का सामना करते हुए व्यतीत हो गया। वह सिर्फ 8 वर्ष ही स्वतंत्र रूप से सक्रिय रहे फिरभी अपने साम्राज्य का विस्तार किया और अपनी शासन व्यवस्था को सुसंगठित किया. यही कारण है कि मराठा साम्राज्य के इतिहास में माधवराव को सबसे महान पेशवा कहा जाता है। 

Madhav Rao Peshwa Biography In Hindi –

 नाम  माधवराव
 अन्य नाम  श्रीमंत माधवराव बल्लाल पेशवा
 जन्म  14 फरवरी 1745
 जन्म स्थान  सवनूर, मराठा साम्राज्य (अब कर्नाटक में) भारत
 पिता  नानासाहेब पेशवा
 माता  गोपिकाबाई
 पत्नी  रमाबाई (सती प्रथा के दौरान वर्ष 1772 में मृत्यु)
 भाई  विश्वास राव, नारायण राव
 व्यवसाय  मराठा साम्राज्य के चौथे पेशवा 
 शासन काल  23 जून 1761 – 18 नवंबर 1772
 मृत्यु  18 नवंबर 1772
 मृत्यु कारण  तपेदिक की बीमारी
 आयु (मृत्यु के समय)  27 वर्ष
 मृत्यु स्थल  थूर, महाराष्ट्र
 समाधि स्थल  गणेश चिंतामणि मंदिर के पास, महाराष्ट्र के नजदीक थूर, महारा

माधव राव पेशवा का जन्म और प्रारंभिक जीवन –

Madhav Rao पेशवा का जन्म सन 1761 में हुआ था और इनके पिता का नाम बालाजी बाजीराव था. माधवराव इनके ज्येष्ठ पुत्र थे।  माधवराव ने सिर्फ 16 वर्ष की उम्र में ही पेशवा पद ग्रहण किया था।, पेशवा बनने के बाद शुरू के दिनों में माधवराव के चाचा रघुनाथ राव ही उसकी ओर से शासन करते थे. लेकिन उन्होंने बहुत जल्द शासनसूत्र अपने हाथों में ले लिया। 

अपने शासनकाल में उन्होंने पानीपत की हार के फलस्वरूप पेशवा की खोई सत्ता और प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित कर दिया. निजाम को दो बार हार का सामना करना पड़ा. उसने पेशवा की शक्ति को तोड़ने का हर संभव प्रयत्न किया था लेकिन उसे असफलता ही हाथ लगी थी।

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माधव राव पेशवा पद की प्राप्ति –

‘पेशवा बालाजी बाजीराव’ (नाना साहब) ने अपनी मृत्यु के पूर्व ही यह निर्णय कर दिया था कि उनके बाद अल्पवयस्क होने के बावजूद उनका बड़ा पुत्र ‘माधवराव’ ही पेशवा की गद्दी पर बैठेगा तथा उसके वयस्क होने तक उसका चाचा रघुनाथराव (राघोबा) पेशवा की ओर से राजकाज सँभालेगा। इसी निर्णय के अनुसार पेशवा बालाजी बाजीराव के निधन होने पर श्राद्धकार्य संपन्न हो जाने के बाद माधवराव को छत्रपति से मिलने के लिए सतारा ले जाया गया। वहीं 20 जुलाई 1761 को छत्रपति के द्वारा माधवराव को ‘पेशवा-पद’ के वस्त्र प्रदान किये गये। 

गृह कलह और इससे निराश –

सतारा से लौटने के बाद राघोबा ने अल्पवयस्क पेशवा के संरक्षक के रूप में शासन की बागडोर अपने हाथों में ले ली। सखाराम बापू दीवान नियुक्त किये गये। पेशवा की माता गोपिकाबाई महान् पेशवा बाजीराव के समय से ही पेशवाई के विभिन्न कार्यों तथा संकटों को भी देखती आई थी तथा काफी अनुभव प्राप्त थी। उन्हें राघोबा द्वारा सारा अधिकार अपने हाथ में ले लिया जाना अच्छा नहीं लगाथा।

उन्हें पेशवा के भविष्य की चिंता होने लगी। उन्होंने राघोबा के एकाधिकार का विरोध करना आरंभ किया। इस प्रकार पूना के दरबार में गृह कलह आरंभ हुआ। सरदारों के दो पक्ष बन गये। एक गोपिकाबाई का समर्थक था और दूसरा राघोबा का। गोपिकाबाई के समर्थकों में प्रमुख थे– बाबूराव फड़णवीस, त्रिंबकराव पेठे, आनंदराव रस्ते, तात्या घोड़पड़े, गोपाल राव पटवर्धन, भवानराव प्रतिनिधि आदि।

रघुनाथराव के समर्थकों में प्रमुख थे सखाराम बापू, चिन्तो विट्ठल रायरीकर, महिपतराव चिटणिस, कृष्णराव पारसनीस, आबा पुरंदरे, विठ्ठल शिवदेव विंचूरकर, नारोशंकर राजबहादुर आदि। अनेक प्रमुख लोगों सहित आम जनता की स्वाभाविक सहानुभूति बालक पेशवा के प्रति थी और इसलिए जब राघोबा तथा सखाराम बापू को लगा कि उनका विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है। 

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त्याग पत्र देने की धमकी – 

तो उन्होंने बालक पेशवा तथा गोपिकाबाई को विवश करने के उद्देश्य से अपने-अपने पदों से त्याग पत्र देने की धमकी देने लगे। उनका मानना था कि उनके बिना राजकार्य संभव ही नहीं हो पाएगा और तब मजबूरन गोपिकाबाई को झुकना पड़ेगा। परंतु गोपिकाबाई ने चतुराई का परिचय देते हुए इन दोनों को अलग ही रखते हुए इनके स्थानों पर बाबूराव फड़णवीस तथा त्रिंबकराव पेठे को नियुक्त कर देने की बात की।

इससे राघोबा अत्यंत क्रुद्ध होकर निजाम को पेशवा के विरुद्ध भड़काने लगा। इसके साथ ही अपनी स्वयं की सेना भी एकत्र करने लगा। अल्पवयस्क होने के बावजूद माधवराव में स्वाभाविक दूरदर्शिता थी और वे विवेक संपन्न थे। उन्होंने राघोबा को समझाने और प्रसन्न करने का प्रयत्न किया तथा इस बात के लिए भी राजी हो गये कि भविष्य में उनकी सलाह के अनुसार कार्य करेंगे।

परंतु, राघोबा स्वयं पेशवा पद पर आसीन होना चाहता था इसलिए उसने अनुचित माँगें रखीं। इस संदर्भ में गोविन्द सखाराम सरदेसाई ने लिखा है एक मास तक अनिश्चित रहने के बाद रघुनाथराव ने यह स्पष्ट माँग रखी कि पाँच महत्व साली गढ़ों सहित उसको 10 लाख वार्षिक आय की अलग जागीर दी जाय। पेशवा इस प्रकार की प्रतिद्वन्द्वी सत्ता को सहन करने के लिए कदापि तैयार न था। अतः उसने दृढ़ता के साथ इस माँग का विरोध किया।

राघोबा के द्वारा पेशवा का पराजय –

अपने मनोनुकूल पेशवा द्वारा माँग पूरी न किये जाने पर राघोबा ने अपनी निजी सेना तथा निजाम की सहायता लेकर युद्ध छेड़ दिया। 7 नवंबर 1762 ईस्वी को पुणे से 30 मील दूर दक्षिण-पूर्व में घोड़ नदी के किनारे युद्ध हुआ, परंतु निर्णय न हो पाया।पेशवा वहाँ से सेना हटाकर भीमा नदी के किनारे आलेगाँव चले गये। राघोबा ने निजाम की सेना के साथ पीछा करते हुए वहाँ पहुँचकर 12 नवंबर को अचानक पेश्वा पर आक्रमण किया, जिसके लिए पेशवा तैयार न हो पाये थे।

परिणामस्वरूप उनकी घोर पराजय हुई। इस गृहयुद्ध को लंबे समय तक न चलने देने के उत्तम उद्देश्य से पेशवा ने स्वयं राघोबा के शिविर में जाकर आत्मसमर्पण कर दिया। राघोबा ने ऊपर से यह दिखाया कि उसे पद या सत्ता का मोह नहीं है, परंतु गुप्त रूप से पेशवा तथा उनकी माता को एक प्रकार से नजरबंद कर दिया। दो हजार सैनिकों के एक रक्षादल को पेशवा पर कड़ी नजर रखने के लिए नियुक्त कर दिया।

इसी प्रकार गोपिकाबाई को भी शनिवारवाड़ा में ही कड़ी सुरक्षा में रखा गया। अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिए राघोबा ने समस्त अनुभवी तथा पेशवा के विश्वसनीय कर्मचारियों को पद से हटाकर अपने लोगों को बहाल कर दिया। राघोबा की प्रतिहिंसा से बचने के लिए अनेक प्रमुख सरदार निजाम के यहाँ चले गये।[5] पुणे में दिनोंदिन राघोबा के प्रति असंतोष बढ़ता ही चला गया।

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Madhav Rao एक कुशल शासक बने –

माधवराव पेशवा ने बहुत छोटी उम्र में अपना पदभार संभाला था. उसकी अल्पावस्था का फायदा उठाने के उद्देश्य से निजाम ने महाराष्ट्र पर हमला बोल दिया था अब माधवराव के स्वार्थी चाचा रघुनाथराव ने उसे अपने अधीन रखने के उद्देश्य से मराठों के कट्टर शत्रु निजाम के साथ गठबंधन कर लिया था। रघुनाथराव ने निजाम के साथ मिलकर माधवराव को आलेगांव में परास्त कर 12 नवंबर 1762 में उसे बंदी बना लिया लेकिन माधवराव का विरोध में वह असफल रहा था। 

इसके बाद माधवराव पेशवा ने साल 1763 में राक्षसभुवन में निजाम को पूरी तरह परास्त किया. युद्ध क्षेत्र से लौटते ही Madhav Rao ने अपने चाचा के प्रभुत्व से अपने आप को मुक्त किया हैदरअली जिसके शौर्य से अंग्रेज सेनानायक भी आतंतिक हुए थे. माधवराव ने उसे भी चार अभियानों में परास्त किया था. पानीपत युद्ध से पहले की तरह ही मराठा साम्राज्य भारत में फिर से सर्वशक्तिशाली प्रमाणित हुआ था। 

निजाम का आक्रमण तथा Madhav Rao की पूर्ण सत्ता-प्राप्ति –

निजाम ने अपने भाई सलावतजंग को पदच्युत कर अपने समय के चतुर कूटनीतिज्ञ विट्ठल सुंदर को अपना दीवान बनाया था। विठ्ठल सुंदर ने जब देखा कि पानीपत की पराजय तथा उसके उपरांत गृहकलह के कारण मराठा राज्य निर्बल हो गया है तो उसने निजाम को पुणे पर आक्रमण करने का सुझाव दिया था । निजाम ने पेशवा को लिखा कि भीमा नदी के पूर्व का सारा प्रान्त तथा पहले उससे लिये गये उसके सभी किले उसको सौंप दिये जाएँ। जिन मराठा सरदारों की जागीर छीन ली गयी है वे उन्हें लौटा दी जाएँ।

उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति को दीवान बनाया जाए तथा पेशवा दरबार का सारा राजकाज उसकी सलाह से किया जाए।निजाम के द्वारा इस प्रकार के दुस्साहसपूर्ण तथा अपमानजनक कदम उठाये जाने की बातों से समस्त मराठा सरदारों में जागरूकता की लहर सी दौड़ गयी और इस राष्ट्र-संकट के समय सभी एकजुट हो गये थे। 

सखाराम बापू तथा अन्य सरदारों ने भी राघोबा के अत्याचारों से त्रस्त होकर हैदराबाद गये हुए समस्त अनुभवी पुराने सरदारों को समझा-बुझाकर वापस बुला लिया। अब तक नजरबंदी में रह रहे पेशवा माधवराव ने ऐसे समय में अपना अपमान भुलाकर अपने विवेक तथा दूरदर्शिता का पूरा परिचय दिया तथा निजाम का सामना करने को तैयार हो गये।

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करुणा जनक पत्र –

Madhav Rao ने अपनी माता को करुणाजनक पत्र लिखे जिनमें उसने स्थिति का स्पष्ट वर्णन किया तथा उसका मुकाबला करने के लिए सम्मिलित प्रयास की आवश्यकता पर जोर दिया।  उसके चाचा राघुनाथराव तथा सखाराम बापू दोनों ने पूर्ण हृदय से इसका नेतृत्व ग्ररहण करना स्वीकार कर लिया। एक विशाल सेना लेकर निजाम पुणे की ओर बढ़ा तथा मल्हारराव होलकर एवं दमाजी गायकवाड़ जैसे सेनानायकों के साथ मराठा सेना भी तैयार हुई।

हालाँकि यह सेना इतनी शक्तिशाली न हो पायी थी कि खुले मैदान में निजाम की सेना का सामना कर सके। अतः एक ओर निजाम पुणे की ओर बढ़ रहा था तो दूसरी ओर पेशवा राघोबा के साथ औरंगाबाद की ओर बढ़ रहे थे। दोनों ने दोनों के प्रदेशों में भयंकर लूटपाट की। पुणे के प्रमुख लोगों के साथ वहाँ की जनता को भी भागना पड़ा। निजाम की सेना ने पुणे को लूट लिया। पुणे की कुछ प्रमुख हस्तियों ने जिसमें नाना फडणवीस भी थे, लोहगढ़ के किले में शरण ली।

गोपिकाबाई को भी नारायणराव के साथ भागना पड़ा तथा उसने सिंहगढ़ में शरण ली। धीरे-धीरे निजाम के सभी मराठा सरदार उससे दूर होने लगे तथा पेशवा की शक्ति प्रबल होने लगी। राक्षसभुवन नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में जबरदस्त युद्ध हुआ तथा निजाम की बुरी तरह पराजय हुई। उसके दीवान विट्ठल सुंदर भी इस युद्ध में मारे गये।

प्रतिष्ठा बढ़ाई –

25 सितंबर 1763 ईस्वी को संधि हुई और निजाम को स्वार्थवश राघोबा ने जितने प्रदेश दे दिए थे, वे सभी (22 लाख आय के) प्रदेश निजाम ने पेशवा को समर्पित कर दिये। इस संधि को औरंगाबाद की संधि कहा जाता है। माधवराव की दूरदर्शिता तथा पराक्रम का इस युद्ध में पूरा परिचय मिला तथा मराठा सरदारों में उनकी प्रतिष्ठा काफी बढ़ गयी।

पानीपत की पराजय के कारण मराठों की खोयी हुई प्रतिष्ठा कुछ हद तक इस विजय से पुनः प्राप्त हो गयी। दो वर्षों से चल रहा गृह कलह एक प्रकार से समाप्त हो गया तथा पेशवा पूर्ण शक्ति-संपन्न होकर शासन सँभालने लगे। समस्त शासनाधिकार अपने हाथ में लेकर पेशवा ने योग्य सरदारों को पुनः उपयुक्त पदों पर बहाल किया। भवानराव पुनः प्रतिनिधि बनाये गये।

बालाजी जनार्दन भानु को फड़णवीस पद पर नियुक्त किया गया तथा पेशवा ने सभी सरदारों से उत्तम संबंध बना लिये। महादजी शिंदे को अपना सहयोगी बना लिया। इस समय मराठा राज्य के रंगमंच पर नयी उम्र की तीन विभूतियों का उदय हुआ। दोनों किसी प्रकार से पानीपत के युद्ध से बच निकले थे, अब एक त्रिमूर्ति बन गये जिसके ऊपर मराठा राष्ट्र का भविष्य निर्भर था।

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Madhav Rao पेशवा पानीपत का तृतीय युद्ध –

पानीपत का तृतीय युद्ध अहमद शाह अब्दाली और मराठों के बीच हुआ। पानीपत की तीसरी लड़ाई (95.5 किमी) उत्तर में मराठा साम्राज्य और अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली, दो भारतीय मुस्लिम राजा अफगान दोआब और अवध के नवाब सुजा -उद- दौला (दिल्ली के सहयोगी दलों) के एक गठबंधन के साथ अहमद शाह अब्दाली के एक उत्तरी अभियान बल के बीच पर 14 जनवरी 1761, पानीपत, के बारे में 60 मील की दूरी पर हुआ।

लड़ाई 18 वीं सदी में सबसे बड़े, लड़ाई में से एक माना जाता है और एक ही दिन में एक क्लासिक गठन दो सेनाओं के बीच लड़ाई की रिपोर्ट में मौत की शायद सबसे बड़ी संख्या है। मुग़ल राज का अंत ( 1680 -1770 ) में शुरु हो गया था, जब मुगलों के ज्यादातर भू भागों पर मराठाओं का आधिपत्य हो गया था। गुजरात और मालवा के बाद बाजी राव ने १७३७ में दिल्ली पर मुगलों को हराकर अपने अधीन कर लिया था और दक्षिण दिल्ली के ज्यादातर भागों पर अपने मराठाओं का राज था।

बाजी राव के पुत्र बाला जी बाजी राव ने बाद में पंजाब को भी जीतकर अपने अधीन करके मराठाओं की विजय पताका उत्तर भारत में फैला दी थी। पंजाब विजय ने1758 में अफगानिस्तान के दुर्रानी शासकों से टकराव को अनिवार्य कर दिया था। १७५९ में दुर्रानी शासक अहमद शाह अब्दाली ने कुछ पसतून कबीलो के सरदारों और भारत में अवध के नवाबों से मिलकर गंगा के दोआब क्षेत्र में मराठाओं से युद्ध के लिए सेना एकत्रित की।

तीसरा युद्ध –

इसमें रोहलिआ अफगान ने भी उसकी सहायता की। पानीपत का तीसरा युद्ध इस तरह सम्मिलित इस्लामिक सेना और मराठाओं के बीच लड़ा गया। अवध के नवाब ने इसे इस्लामिक सेना का नाम दिया और बाकी मुसल्मानों को भी इस्लाम के नाम पर इकट्ठा किया। जबकि मराठा सेना ने अन्य हिन्दू राजाओं से सहायता की उम्मीद की 14 जनवरी 1761 को हुए इस युद्ध में भूखे ही युद्ध में पहुँचे मराठाओं को सुरवती विजय के बाद हार का मुख देखना पड़ा.

पेशवा Madhav Rao प्रथम (शासनकाल- 1761-1772 ) मराठा साम्राज्य के चौथे पूर्णाधिकार प्राप्त पेशवा थे। वे मराठा साम्राज्य के महानतम पेशवा के रूप में मान्य हैं। जिनके अल्पवयस्क होने के बावजूद अद्भुत दूरदर्शिता एवं संगठन-क्षमता के कारण पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों की खोयी शक्ति एवं प्रतिष्ठा की पुनर्प्राप्ति संभव हो पायी।

11 वर्षों की अपनी अल्पकालीन शासनावधि में भी आरंभिक 2 वर्ष गृहकलह में तथा अंतिम वर्ष क्षय रोग की पीड़ा में गुजर जाने के बावजूद उन्होंने न केवल उत्तम शासन-प्रबंध स्थापित किया, बल्कि अपनी दूरदर्शिता से योग्य सरदारों को एकजुट कर तथा नाना फडणवीस एवं महादजी शिंदे दोनों का सहयोग लेकर मराठा साम्राज्य को भी सर्वोच्च विस्तार तक पहुँचा दिया।

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माधव राव पेशवा का हैदरअली पर विजय –

पानीपत में मराठों की पराजय के बाद मैसूर में हैदरअली को अपना प्रभाव-विस्तार करने की स्वाभाविक छूट मिल गयी थी।  मैसूर और कर्नाटक पर सत्ता स्थापित करने से भी संतुष्ट नहीं हुआ। एक विशाल साम्राज्य का शासक होने का स्वप्न देखने लगा। उसने एक बड़ी सेना एकत्रित करके मराठऔ पर आक्रमण किया पेशवा माधवराव ने मराठा सेना का नेतृत्व कर हैदर अली को तीन बार प्रत्याक्रमण किया। 

1770 से 1772 के जुलाई तक चले तीसरे आक्रमण में आरंभिक 6 महीने तक स्वयं पेशवा अभियान में उपस्थित रहे। बाद में अस्वस्थ हो जाने के कारण त्रिम्बकराव पेठे को सेनानायक बनाकर पुणे वापस आ गये। 7 मार्च 1771 को मोती तालाब के युद्ध में हैदरअली पराजित हो गया। पेशवा की इच्छा हैदरअली को गद्दी से हटाकर पूर्व हिंदू राजा को राज्य सौंपने की थी, परंतु राघोबा ने पेशवा के अधिकार में कमी रखने के उद्देश्य से ऐसा न होने दिया |

हैदरअली निजाम की भाँति दक्षिण में मराठों का खुला दुश्मन था, रघुनाथराव ने यह प्रबन्ध किया कि अगर पेशवा उससे अधिक शक्तिशाली सिद्ध हो तो अन्त में हैदरअली को बराबर के जोड़ के रूप में छोड़ दिया जाय। किसी न किसी बहाने हैदरअली को सरल शर्तें देकर रघुनाथ राव ने युद्ध बन्द करने का प्रस्ताव किया। हैदरअली का पूर्णतया दमन करने की योजना कुछ समय के लिए स्थगित कर दी गयी। 30 मार्च को हैदरअली के प्रतिनिधि मीर फैजुल्ला के द्वारा सन्धि पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये गये।

उत्तर में पुन महान विजय –

पानीपत में पराजय के परिणामस्वरूप उत्तर भारत में मराठा राज्य प्राय नष्ट ही हो गया था। दिल्ली, आगरा, दोआब, बुंदेलखंड, मालवा आदि स्थानों के छोटे-छोटे शासक मराठा सत्ता का पूरी तरह से अंत करने के प्रयत्न में लगे हुए थे। माधवराव पेशवा ने उत्तर भारत के अपने खोये हुए राज्य पर पुन सत्ता स्थापित करने का पुरजोर प्रयत्न आरंभ किया। 1761 में जयपुर के राजा माधव सिंह को मल्हार राव होलकर के द्वारा परास्त करवा कर राजपूतों पर मराठों की धाक पुन जमादी ।

पेशवा ने महादजी शिंदे के मुख्य नायकत्व में तुकोजीराव होलकर तथा रामचंद्र गणेश के साथ विसाजी कृष्ण नामक दो सेनानायकों को भी उत्तर भारत भेजा। महादजी शिंदे की सूझबूझ तथा प्रबल पराक्रम के कारण जाट तथा रुहेलों का दमन हुआ, फर्रुखाबाद के नवाब बंगश तथा बुंदेलखंड के शासक तो परास्त हुए ही, महादजी ने अंग्रेजों के संरक्षण में इलाहाबाद में अपने दुर्दिन काट रहे मुगल बादशाह शाहआलम को भी मुक्त करा लिया था 

दिल्ली ले जाकर उन्हें पुन सिंहासनासीन करवा दिया। दिल्ली पर पुन मराठा शक्ति का प्रभुत्व कायम हुआ और इसके साथ ही महादजी का यशोसूर्य भी दिग-दिगंत में दीपित हो उठा। बादशाह शाहआलम ने महादजी को अनेक उपाधियों के अतिरिक्त वकील ए मुतलक की उपाधि भी प्रदान की जिसका अधिकार बादशाह से कुछ ही कम होता था। इस प्रकार पेशवा माधवराव की सूझबूझ दूरदर्शिता तथा संगठन क्षमता के कारण मराठा साम्राज्य अपने सर्वोच्च विस्तार तक पहुँच गया।

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माधव राव पेश्वा रोग एवम मृत्यु –

अपने अल्पकालीन शासन में भी बड़े-बड़े कार्य करने वाले पेशवा माधवराव के अंतिम 2 वर्ष बड़े कष्टपूर्ण बीते। उन्हें क्षय रोग हो गया था, जिसके कारण वे पीड़ा से तड़पते हुए शैया पर ही पड़े रहते थे। कभी-कभी पीड़ा इतनी तीव्र हो जाती थी कि वे अपने सेवकों से अपना अंत कर देने को कहने लगते थे। परंतु इतनी पीड़ा झेलने के बावजूद उनकी समझ मंद नहीं पड़ी थी तथा वे अंतिम समय तक मराठा राज्य के उज्ज्वल भविष्य के लिए चिंतित रहे।

उन्होंने राघोबा को भी मुक्त करके अपने पास बुला कर अपने छोटे भाई नारायणराव को उन्हें सौंपते हुए उनकी रक्षा करने का वचन देने को कहा। राघोबा ने वचन दिया कि वे सदा उनकी सहायता तथा रक्षा करेंगे। पेशवा की साध्वी पत्नी रमाबाई पति परायणा थी तथा पेशवा की रुग्णावस्था में अधिकतर उनके निकट ही रहती थी। पेशवा की बड़ी इच्छा थी कि उन्हें इष्टदेव भगवान् गणेश के चरणों में मृत्यु प्राप्त हो।

उनकी इच्छा के अनुरूप उन्हें थेऊर के मंदिर में ले जाया गया। वहीं से महीनों राजकार्य का भी संचालन होते रहा। 18 नवंबर 1772 ईस्वी को पेशवा माधवराव का निधन हो गया। उनकी पतिपरायणा पत्नी रमाबाई स्वेच्छापूर्वक, लोगों के काफी मना करने के बावजूद, सती हो गयी।

माधव राव पेशवा की कुछ बाते –

  • माधव राव 7 सितंबर 1769 को पुणे के पर्वती मंदिर से लौटते वक्त उनके चाचा ने माधवराव की हत्या करने की कोशिश की थी. लेकिन इस घटना में वे बाल-बाल बच गए थे। 

  • साल 1770 में माधवराव तीसरी बार हैदर अली को हराने की तैयारी में थे. लेकिन उस समय वे तपेदिक की बीमारी से पीड़ित थे।  इसलिए वे अपने महल में वापस आ गए। 

  • 18 नवंबर 1772 में गणेश चिंतामणि मंदिर में उनका निधन हो गया। 

  • उनको सबसे बड़ी सफलता उत्तरी भारत में मिली, जब साल 1771-72 में उनकी सेना ने मालवा और बुंदेलखंड पर फिर से अधिकार जमा लिया था। 

  • माधवराव पेशवा की मृत्यु के बाद 18वीं सदी के अंतिम तीन वर्षों के इतिहास में महादजी सिंधिया व नाना फडनवीस का वर्णन मिलता है. जिसमें से महादजी उत्तर भारत और नान फडनवीस दक्षिण भारत में प्रभावशाली रहे। 

  • धीरे-धीरे मराठा पेशवा सिर्फ नाम मात्र का अधिकारी रह गया और मराठा नेताओं में अपनी-अपनी शक्ति के लिए संघर्ष भी जारी रहा इस आपसी संघर्ष का पूरा लाभ अंग्रेजों ने ही उठाया। 

Madhav Rao Peshwa History Video –

Madhav Rao Peshwa Facts –

  • साल 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठा साम्राज्य को बड़ी नुकसान का सामना करना पड़ा था। 
  • माधवराव के बड़े भाई विश्वासराव की मृत्यु पानीपत की तीसरी लड़ाई में चचेरे भाई के हाथों हुई थी। 
  • मराठा साम्राज्य और निजाम के बीच शुरुआती युद्ध में माधवराव अपने चाचा रघुनाथराव के साथ संघर्ष कर रहे थे. तब माधवराव पेशवा और रघुनाथराव राजसी थे। 
  • साल 1764 में माधवराव ने मैसूर साम्राज्य पर जीत हासिल कर हैदर अली सुल्तान को पराजित किया था। 
  • ब्रिटिश अधिकारी मास्टिन ने 3 दिसंबर 1767 को पुणे जाकर माधवराव के साथ मुलाकात की थी. जिसमें अंग्रेजों ने यहां अपनी सेना स्थापित करने की मांग रखी थी लेकिन माधवराव ने उन्हें अनुमति नहीं दी। 

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माधव राव पेशवा के कुछ प्रश्न –

1 .माधवराव पेशवा के कितने बच्चे थे ?

उनको कोई बच्चा नहीं था 

2 .माधवराव पेशवा की कितनी पत्नियाँ थीं ?

रमाबाई नाम की माधवराव की पत्नी थी जिन्होंने अपने पति के मौत के बाद उनके पीछे सती हुए थे।  

3 .क्या माधवराव पेशवा ने दो बार शादी की ?

नहीं Madhav Rao Peshwa एक ही शादी की थी उनकी पत्नी का नाम रमाबाई था 

4 .माधवराव पेशवा के पिता कौन हैं ? 

Balaji Baji Rao माधवराव पेशवा के पिता थे। 

5 .रमाबाई पेशवा की मृत्यु कब हुई ?

18 November 1772 के दिन रमाबाई पेशवा की मृत्यु हुई थी। 

निष्कर्ष – 

दोस्तों आशा करता हु आपको मेरा यह आर्टिकल Madhav Rao Peshwa Biography In Hindi बहुत अच्छी तरह से समज आ गया होगा। इस लेख के जरिये  हमने madhav rao peshwa and ramabai और ramabai peshwa death reason से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दे दी है अगर आपको इस तरह के अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है तो आप हमें कमेंट करके जरूर बता सकते है। और हमारे इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शयेर जरूर करे। जय हिन्द ।

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