Prithviraj Chauhan Biography In Hindi – पृथ्वीराज चौहान की जीवनी

Table of Contents

नमस्कार मित्रो आज के हमारे लेख में आपका स्वागत है आज हम Prithviraj Chauhan Biography In Hindi में चौहान वंश जन्मे हिंदूऔ के आखरी शासक पृथ्वीराज चौहान का जीवन परिचय बताने वाले है। 

भारतीय इतिहास में एक बहुत ही प्रसिद्ध और चर्चित नाम एव बहुत ही कम आयु में पृथ्वीराज चौहान ने अपने पिता की मृत्यु के पश्चात दिल्ली और अजमेर का शासन संभाला और कई सीमाओं तक फैलाया था। लेकिन विश्वासघात के शिकार हुए और अपनी रियासत हार बैठे लेकिन यह कमी कोई हिंदू शासक पूरी नहीं कर पाया आज हम prithviraj chauhan wife ,मौत के वक्त prithviraj chauhan age और prithviraj chauhan history in hindi की जानकारी देंगे। पृथ्वीराज चौहान के पिता का नाम सोमेश्वर चौहान और माता का नाम कपूर देवी और चौहान वंश के थे।

उन्हें राय पिथौरा भी कहा जाता है पृथ्वीराज चौहान छोटे से ही एक कुशल योद्धा थे ,युद्ध के अनेक गुण सीख रखे थे उन्होंने अपने बचपन में ही शब्दभेदी बाण विद्या का भी अभ्यास किया था। बरदाई ने मोहम्मद गोरी को पृथ्वीराज के शब्दभेदी वाण चलाने की कला के बारे में बताया था। जब गोरी को यकीन नहीं हुआ तो चंद बरदाई ने अपनी योजना के मुताबिक पृथ्वीराज को तीर-कमान देकर अपनी आंखों से ये कला देखने की बात कही. पृथ्वीराज नामक बालक महाराजाओं के छत्र अपने बल से हर लेगा। सिंहासन की शोभा को बढाएगा अर्थात् कलियुग में पृथ्वी में सूर्य के समान देदीप्यमान होगा।

Prithviraj Chauhan Biography In Hindi –

 नाम

पृथ्वीराज चौहाण

 जन्म

1 जून 1163

 जन्म स्थान

पाटण ,गुजरात ( भारत )

 पिता

सोमेश्वर

 माता

कर्पूरदेवी 

 बहन

प्रथा ( छोटी )

 पत्निया

13

 वंश

चौहाण

 मृत्यु

अजमेर ( राजस्थान )

 आयु ( मृत्यु के समय ) 

28 वर्ष

पृथ्वीराज चौहान का जीवन परिचय  –

चौहान का जन्म 1168 में हुआ था वह बाल काल से ही प्रभावशाली और शक्तिशाली थे उनके पिता की मृत्यु हुई तो उन्होंने 13 साल की उम्र में अजमेर के राजगढ़ की गति को संभाल लिय।  पृथ्वीराज चौहान का शासन सन 1178 से 1192 तक रहा जो उत्तर भारत में 12 वीं सदी, पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को युद्ध में लगभग 17 बार हराय।

वह अपने  बचपन के मित्र चंदबरदाई उनके लिए किसी भाई से कम नहीं थे चंदबरदाई तोमर वंश के शासक अंग पाल की बेटी के पुत्र थे चंदबरदाई बाद में दिल्ली के शासक हुए और पृथ्वीराज चौहान के सहयोग से पिथौरागढ़ का निर्माण किया जो वर्तमान में दिल्ली में पुराने किले के नाम से जाना जाता है।

इसके बारेमे भी जानिए :- माधव राव पेशवा की जीवनी

पृथ्वीराज चौहान का इतिहास – prithviraj chauhan history

dharti ka veer yodha prithviraj chauhan के शासनकाल के दौरान के शिलालेख संख्या में कम हैं और स्वयं राजा द्वारा जारी नहीं किए गए हैं। उनके बारे में अधिकांश जानकारी मध्ययुगीन पौराणिक वृत्तांतों से आती है।तराइन की लड़ाई के मुस्लिम खातों के अलावा हिन्दू और जैन लेखकों द्वारा कई मध्ययुगीन महाकाव्य में उनका उल्लेख किया गया है। इनमें पृथ्वीराज विजय, हम्मीर महावाक्य और पृथ्वीराज रासो शामिल हैं।

इन ग्रंथों में स्तुतिपूर्ण सम्बन्धी विवरण हैं और इसलिए यह पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं हैं। पृथ्वीराज विजय पृथ्वीराज के शासनकाल से एकमात्र जीवित साहित्यिक पाठ है। पृथ्वीराज चौहान रासो जिसने पृथ्वीराज को एक महान राजा के रूप में लोकप्रिय किया को राजा के दरबारी कवि चंद बरदाई द्वारा लिखा कहा जाता है। हालांकि, यह अतिरंजित लेखनों से भरा है जिनमें से कई इतिहास के उद्देश्यों के लिए बेकार हैं।

पृथ्वीराज का उल्लेख करने वाले अन्य वृत्तांत और ग्रंथों में प्रबन्ध चिंतामणि, प्रबन्ध कोष और पृथ्वीराज प्रबन्ध शामिल हैं। उनकी मृत्यु के सदियों बाद इनकी रचना की गई थी और इसमें अतिशयोक्ति और काल दोष वाले उपाख्यान हैं। पृथ्वीराज चौहान का उल्लेख जैनों की एक पट्टावली में भी किया गया है

जो एक संस्कृत ग्रन्थ है। इसमें जैन भिक्षुओं की जीवनी है। जबकि इसे 1336 में पूरा कर लिया था लेकिन जिस हिस्से में पृथ्वीराज का उल्लेख है वह 1250 के आसपास लिखा गया था। चंदेला कवि जगनिका का आल्हा-खंड (या आल्हा रासो) भी चंदेलों के खिलाफ पृथ्वीराज के युद्ध का अतिरंजित वर्णन प्रदान करता है।

पृथ्वीराज चौहान की कहानी – Prithviraj Chauhan Story

पृथ्वीराज का जन्म चौहान राजा सोमेश्वर और रानी कर्पूरादेवी के घर हुआ था। पृथ्वीराज और उनके छोटे भाई हरिराज दोनों का जन्म गुजरात में हुआ था जहाँ उनके पिता सोमेश्वर को उनके रिश्तेदारों ने चालुक्य दरबार में पाला था। पृथ्वीराज गुजरात से अजमेर चले गए जब पृथ्वीराज द्वितीय की मृत्यु के बाद उनके पिता सोमेश्वर को चौहान राजा का ताज पहनाया गया। सोमेश्वर की मृत्यु 1177 (1234 (वि.स.) में हुई थी।

जब पृथ्वीराज लगभग 11 वर्ष के थे। पृथ्वीराज, जो उस समय नाबालिग थे ने अपनी मां के साथ राजगद्दी पर विराजमान हुए। इतिहासकार दशरथ शर्मा के अनुसार, पृथ्वीराज चौहान ने 1180 (1237 वि.स.) में प्रशासन का वास्तविक नियंत्रण ग्रहण किया। दिल्ली में अब खंडहर हो चुके किला राय पिथौरा के निर्माण का श्रेय पृथ्वीराज को दिया जाता है।

पृथ्वीराज रासो के अनुसार दिल्ली के शासक अनंगपाल तोमर ने अपने दामाद पृथ्वीराज को शहर दिया था और जब वह इसे वापस चाहते थे तब हार गए थे। यह ऐतिहासिक रूप से गलत है चूँकि पृथ्वीराज के चाचा विग्रहराज चतुर्थ द्वारा दिल्ली को चौहान क्षेत्र में ले लिया गया था। इसके अलावा ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि अनंगपाल तोमर की मृत्यु पृथ्वीराज के जन्म से पहले हो गई थी। उनकी बेटी की पृथ्वीराज से शादी के बारे में दावा बाद की तारीख में किया गया है।

पृथ्वीराज चौहान की 13 पत्नियों के नाम -prithviraj chauhan wife

  • जम्भावती पडिहारी
  • पंवारी इच्छनी
  • दाहिया
  • जालन्धरी
  • गूजरी
  • बडगू
  • यादवी पद्मावती
  • यादवी शशिव्रता
  • कछवाही
  • पुडीरनी
  • शशिव्रता
  • २्न्द्रावती
  • संयोगिता गाहड़वाल

पृथ्वीराज चौहान के पूर्वज –

Prithviraj chauhan के पूर्ववर्तियों ने 12वीं शताब्दी तक भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों पर कब्जा करने वाले मुस्लिम राजवंशों के कई हमलों का सामना किया था।12वीं शताब्दी के अंत तक ग़ज़नी आधारित ग़ोरी वंश ने चौहान राज्य के पश्चिम के क्षेत्र को नियंत्रित कर लिया था। 1175 में जब पृथ्वीराज एक बच्चा था, मोहम्मद ग़ोरी ने सिंधु नदी को पार किया और मुल्तान पर कब्जा कर लिया।

1178 में उसने गुजरात पर आक्रमण किया, जिस पर चालुक्यों (सोलंकियों) का शासन था। चौहानों को ग़ोरी आक्रमण का सामना नहीं करना पड़ा क्योंकि गुजरात के चालुक्यों ने 1178 में कसरावद के युद्ध में मोहम्मद को हरा दिया था। अगले कुछ वर्षों में मोहम्मद ग़ोरी ने पेशावर, सिंध और पंजाब को जीतते हुए, चौहानों के पश्चिम में अपनी शक्ति को मजबूत किया। उन्होंने अपना अड्डा ग़ज़नी से पंजाब कर दिया और अपने साम्राज्य का विस्तार पूर्व की ओर करने का प्रयास किया।

इससे उन्हें पृथ्वीराज के साथ संघर्ष में आना पड़ा। मध्यकालीन मुस्लिम लेखकों ने दोनों शासकों के बीच केवल एक या दो लड़ाइयों का उल्लेख किया है। तबक़ात-ए-नासिरी और तारिख-ए-फ़िरिश्ता में तराइन की दो लड़ाइयों का ज़िक्र है। जमी-उल-हिकाया और ताज-उल-मासीर ने तराइन की केवल दूसरी लड़ाई का उल्लेख किया है जिसमें पृथ्वीराज की हार हुई थी। हालांकि, हिन्दू और जैन लेखकों का कहना है कि पृथ्वीराज ने मारे जाने से पहले कई बार मोहम्मद को हराया था।

जैसे कि हम्मीर महाकाव्य दावा करता है कि दोनों के बीच 9 लड़ाइयाँ हुई , पृथ्वीराज प्रबन्ध में 8 का जिक्र है, प्रबन्ध कोष 21 लड़ाइयों का दावा करता है जबकि प्रबन्ध चिंतामणि 22 बतलाता है। जबकि यह लेखन संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, यह संभव है कि पृथ्वीराज के शासनकाल के दौरान ग़ोरियों और चौहानों के बीच दो से अधिक मुठभेड़ हुईं।

इसके बारेमे भी जानिए :-  माधव राव पेशवा की जीवनी

पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को कैसे मारा – dharti ka veer yodha prithviraj chauhan

चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच लगभग 17 युद्ध हुये (कहीं 21 युद्धों का भी उल्लेख है), जिनमें 16 बार पृथ्वीराज ने गौरी को पराजित किया एवं छोड़ दिया। किंवदंतियों के अनुसार पृथ्वीराज चौहान ने 16 बार मोहम्मद गौरी को पराजित किया और हर बार गौरी ने उससे पैरों में गिरकर क्षमा मांगी और पृथ्वीराज ने उसे छोड़ दिया।

यदि तार्किक रूप से भी देखें तो यह ठीक नहीं लगता। यह सही है कि पृथ्वीराज युवा था, उच्च्श्रन्ख्ल था लेकिन वह 21 भीषण युद्ध लड़ कर जीत चुका था, इसलिए कम से कम वह इतना अदूरदर्शी या सीधे शब्दों में कहें तो मुर्ख नहीं हो सकता था कि एक ही गलती को बार बार तब तक दोहराता रहे जब तक स्वयं हार नहीं गया।

पृथ्वीराज चौहान की पहली लड़ाई – 

1190–1191 के दौरान, मोहम्मद ग़ौर ने चौहान क्षेत्र पर आक्रमण किया और तबरहिन्दा या तबर-ए-हिन्द (बठिंडा) पर कब्जा कर लिया। उन्होंने इसे 1,200 घुड़सवारों के समर्थन वाले ज़िया-उद-दीन, तुलक़ के क़ाज़ी के अधीन रखा। जब पृथ्वीराज को इस बारे में पता चला, तो उसने दिल्ली के गोविंदराजा सहित अपने सामंतों के साथ तबरहिन्दा की ओर प्रस्थान किया।

तबरहिन्दा पर विजय प्राप्त करने के बाद मुहम्मद की मूल योजना अपने घर लौटने की थी लेकिन जब उन्होंने पृथ्वीराज के बारे में सुना, तो उन्होंने लड़ाई का फैसला किया। वह एक सेना के साथ चल पड़े और तराईन में पृथ्वीराज की सेना का सामना किया। आगामी लड़ाई में, पृथ्वीराज की सेना ने निर्णायक रूप से ग़ोरियों को हरा दिया।

पृथ्वीराज चौहान की तराई की दूसरी लड़ाई – 

तराइ की दूसरी लड़ाई में युद्धक्षेत्र पुन: दो सेनाओं की भयंकर भिड़ंत का साक्षी बन रहा था। भारत के भविष्य और भाग्य के लिए यह युद्ध बहुत ही महत्वपूर्ण होने जा रहा था। भारत अपने महान पराक्रमी सम्राट के नेतृत्व में धर्मयुद्ध कर रहा था, जबकि विदेशी आततायी सेना अपने सुल्तान के नेतृत्व में भारत की अस्मिता को लूटने के लिए युद्ध कर रही थी।

युद्ध प्रारंभ हो गया। ‘भगवा ध्वज’ की आन के लिए राजपूतों ने विदेशी आक्रांता और उसकी सेना को गाजर, मूली की भांति काटना आरंभ कर दिया। ‘भगवा ध्वज’ जितना हवा में फहराता था उतना ही अपने हिंदू वीरों की बाजुएं शत्रुओं के लिए फड़क उठती थीं और उनकी तलवारें निरंतर शत्रु का काल बनती जा रही थीं। सायंकाल तक के युद्ध में ही स्थिति स्पष्ट होने लगी, विदेशी सेना युद्ध क्षेत्र से भागने को विवश हो गयी।

उसे अपनी पराजय के पुराने अनुभव स्मरण हो आये और पराजय के भावों ने उसे घेर लिया। इसलिए शत्रु सेना मैदान छोड़ देने में ही अपना हित देख रही थी। लाशों के लगे ढेर में मुस्लिम सेना के सैनिकों की अधिक संख्या देखकर शेष शत्रु सेना का मनोबल टूट गया और उसे लगा कि हिंदू इस बार भी खदेड़, खदेड़ कर मारेंगे। मौहम्मद गोरी को भी गोविंदराय की वीरता के पुराने अनुभव ने आकर घेर लिया था।

इसके बारेमे भी जानिए :- भारतीय थल सेना की पूरी जानकारी हिंदी

जयचंद की गद्दारी –

इसलिए वह भी मैदान छोड़ऩे न छोड़ऩे के द्वंद में फंस गया था। ‘जयचंद’ जैसे देशद्रोही जमकर उसका साथ दे रहे थे, जिन्हें देखकर उसे संतोष होता था, परंतु हिंदू सेना के पराक्रमी प्रहार को देखकर उसका हृदय कांपता था।एक ध्यान देने योग्य बात मुस्लिम और विदेशी शत्रु इतिहास लेखकों ने भारत में राष्ट्रवाद की भावना को मारने तथा हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक हिंदू शब्द का या हिंदू सेना का जहां प्रयोग बार बार होना चाहिए था, वहां वैसा किया नहीं है।

इन्होंने पृथ्वीराज चौहान की सेना को राष्ट्रीय सेना या हिंदू सेना न कहकर ‘राजपूत सेना’ कहा है। इससे उन्हें दो लाभ हुए-एक तो भारत में राष्ट्रवाद की भावना को मारने में सहायता मिली। (यह अलग बात है कि वह मरी नहीं) दूसरे हिंदुओं में जातिवाद को प्रोत्साहन मिला। हिंदू एक ऐसा शब्द था जो हममें जातीय अभिमान भरता था।

इसलिए उसे हमारे लिए सामूहिक रूप से प्रयुक्त न कर, हमारे लिए खंडित मानसिकता को दर्शाने वाले शब्दों यथा राजपूत सेना, मराठा सेना, सिक्ख सेना आदि का प्रयोग किया गया। निरंतर इसी झूठ को दोहराते रहने से कुछ सीमा तक हम पर इस झूठ का प्रभाव भी पड़ा। मौहम्मद गोरी ने चली नई चाल मौहम्मद गोरी ने जब देखा कि वह एक बार पुन अपमान जनक पराजय का सामना करने जा रहा है।

हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान –

उसने हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान को ऊंची आवाज में संबोधित कर उससे युद्ध बंद करने की प्रार्थना की। गोरी ने पृथ्वीराज चौहान से कहा कि इस बार हमें तुम्हारा भाई (जयचंद) यहां युद्ध के लिए ले आया है, अन्यथा मैं तो कभी हिंदुस्तान नहीं आता। अब मेरी आप से विनती है कि आप मुझे ससम्मान अपने देश जाने दें। बस, मैं इतना अवसर आपसे चाहता हूं कि मैंने अपने देश एक व्यक्ति को चिट्ठी लेकर भेजा है, वह उस चिट्ठी का उत्तर लिखा लाए तो मैं यहां से चला जाऊंगा।

हम बार-बार कहते आये हैं कि भारत ने इन बर्बर विदेशी आक्रांताओं की युद्धशैली की घृणित और धोखे से भरी नीतियों को कभी समझा नहीं, क्योंकि भारत की युद्धनीति में ऐसे धोखों को कायरता माना जाता रहा है। शत्रु यदि प्राणदान मांग रहा है तो उसे प्राणदान देना क्षत्रिय धर्म माना गया है। हमने चूक ये की कि शत्रु दुष्टता के साथ भी जब धोखे की चालें चल रहा था तो हमने उस समय भी उसकी बातों पर विश्वास किया और उसकी चालों में अपने देश का अहित कर बैठे थे। 

अन्यथा ना तो हमारा पराक्रम हारा और ना ही हमारा उत्साह ठंडा पड़ा। शत्रु के प्रति दिखाई जाने वाली इसी अनावश्यक उदारता के हमारे परंपरागत गुण को ही वीर सावरकर ने ‘सदगुण-विकृति’ कहकर अभिहित किया है। फलस्वरूप पृथ्वी राज चौहाण गोरी की बातों के जाल में फंस गये। हिंदू सम्राट ने अपनी सेना को युद्धबंदी की आज्ञा दे दी। युद्धबंद होते ही गोरी की सेना को संभलने का अवसर मिल गया।

राणा समरसिंह –

जबकि चौहान की राष्ट्रीय सेना अपने शिविरों में जाकर शांति के साथ सो गयी। गोरी ऐसे ही अवसर की खोज में था कि जब हिंदू सेना शांति के साथ सो रही हो तो उसी समय उस पर आक्रमण कर दिया जाए। पी.एन.ओक लिखते हैं :-”ठीक आधी रात को जबकि हिंदू सेना बड़ी शांति से सो रही थी गोरी ने चुपचाप और एकाएक उस पर धावा बोल दिया। छल और कपट के

मायाजाल में फंसे सोते वीर हिंदू सैनिकों को गोरी के कसाई दल ने हलाल कर दिया। इसी धोखे धड़ी के युद्ध में ही पृथ्वीराज चौहान ने भी वीरगति प्राप्त की। भारत माता के कई योद्घा काम आये तराइन के इस युद्ध में मां भारती के कई वीरपुत्र काम आये। इनमें एक थे चित्तौड़ के राणावंश के वीर शिरोमणि राणा समरसिंह और दूसरा वीर शिरोमणि था गोविंद राय।

जिसने तराइन के पहले युद्ध में पृथ्वीराज चौहान के परमशत्रु मौहम्मद गोरी को घायल किया था। राणा समरसिंह पृथ्वीराज चौहान के बहनोई भी थे और उन्होंने हर संकट में पृथ्वीराज चौहान का साथ बड़ी निष्ठा के साथ दिया था।राजनीति में यद्यपि संबंध अधिक महत्वपूर्ण नहीं होते परंतु हिंदू राजनीति में संबंधों का कितना महत्व होता है इसका पता हमें पृथ्वीराज चौहान और उनके बहनोई के संबंधों को देखकर ही चलता है।

हर संकट में पृथ्वीराज ने समरसिंह को स्मरण किया या उसके हर संकट का समरसिंह ने ध्यान रखा, यह पता ही नहीं चलता। तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पतली स्थिति को समरसिंह भली भांति जानते थे परंतु देश-धर्म के सम्मान को बचाने के लिए वह इस युद्ध में भी उसके साथ आ मिले और शत्रु के साथ जमकर संघर्ष किया। परंतु युद्ध में वह स्वयं, उनका पुत्र कल्याण और उनकी तेरह हजार हिंदू सेना शहीद होकर मां भारती के श्री चरणों में शहीद हो गयी।

इसके बारेमे भी जानिए :- बालाजी विश्वनाथ की जीवनी

गाय का वध करना पाप –

इसी प्रकार गोविंदराय को उसके हाथी ने ही ऊपर से पटक दिया और वह वीर भी अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान देकर इस असार-संसार से चला गया। इस प्रकार तराइन का युद्ध क्षेत्र हमारी पराजय का नहीं, अपितु हमारे वीर स्वतंत्रता सैनानियों के उत्कृष्ट बलिदानों का स्मारक है। जिसे यही सम्मान मिलना भी चाहिए। गायों के प्रति पृथ्वीराज चौहान की गहन आस्था बनी पराजय का कारण कपटी विदेशी आक्रांता ने हिंदू सम्राट और उसकी साहसी सेना को पराजित करने का एक और ढंग खोज निकाला।

उसे यह भलीभांति ज्ञात था कि भारतीय लोगों की गाय के प्रति असीम श्रद्धा और गहन आस्था होती है और विषम से विषम परिस्थिति में भी एक हिंदू किसी गाय का वध करना पाप समझता है। पृथ्वीराज चौहान तराइन के दूसरे युद्ध में घायल हो गये थे। तब उन्हें उनके सैनिक घायलावस्था में लेकर चल दिये, तो मुसलमानों ने भारत के शेर को समाप्त करने का यह उत्तम अवसर समझा। कहा जाता है कि सिरसा के पास दोनों सेनाओं की मुठभेड़ हो गयी।

यहां पर भी जब गोरी ने अपनी पराजय होते देखी, तो कुछ ही दूरी पर घास चर रही कुछ गायों को अपनी सहायता का अचूक शस्त्र समझकर वह उनकी ओर भागा। गोरी के पीछे पृथ्वीराज चौहान ने अपना घोड़ा दौड़ा दिया। तब गोरी और उसके सैनिकों ने अपने प्राण बचाने के लिए पृथ्वीराज चौहान की सेना की ओर गायों

गाय माता के लिए तलवारे तानी गयी थी –

उसने अपने सैनिकों को आज्ञा दी कि सभी इन गायों को काटने के लिए अपनी-अपनी तलवारें इनकी गर्दनों पर तानलें। सभी सैनिकों ने ऐसा ही किया। तब गोरी ने भारत के हिंदू सम्राट से इन गायों की हत्या रोकने के लिए आत्मसमर्पण की शर्त रखी। कहा जाता है कि पृथ्वीराज चौहान गायों की संभावित प्राण हानि से कांप उठा।

उसका हृदय द्रवित हो गया और गायों के प्रति असीम करूणा व आस्था का भाव प्रदर्शित करते हुए वह घायलावस्था में अपने घोड़े से उतरा, एक हाथ में तलवार लिए धरती पर झुका तथा एक भारत की पवित्र मिट्टी को माथे से लगाकर गौमाताओं को प्रणाम करते हुए उनकी रक्षा के लिए विदेशी शत्रु के समक्ष अपनी तलवार सौंप दी।

वास्तव में यह तलवार Prithviraj chauhan की तलवार नहीं थी, अपितु यह तलवार भारत के गौरव और स्वाभिमान की तलवार थी। कुछ लोगों ने गोरी के इस कपट को निष्फल करने के लिए पृथ्वीराज चौहान से यहां अपेक्षा की है कि वह उस समय आपद-धर्म का निर्वाह करते हुए कुछ गायों का भी वध कर डालता तो कुछ भी अपराध नहीं होता, उसे आत्मसमर्पण करने में शीघ्रता नहीं करनी चाहिए थी।

परंतु जैसे भी हुआ, जो भी हुआ वह भारत का दुर्भाग्य ही था। यह सच है कि मैदान में भारत को इस समय हराना गोरी के लिए असंभव था, पृथ्वीराज चौहान भी यदि छल और कपट को अपनाकर शत्रु को शत्रु की भाषा में ही उत्तर देते तो निश्चय ही परिणाम कुछ और ही आते और देश का इतिहास भी तब कुछ और ही होता।

पृथ्वीराज चौहान की तलवार वजन –

  वजन

 60kg

 लंबाई

 38 इंच

 धरोहर

 790 साल पुरानी 

वीराज चौहान की 38 इंच लंबी तलवार है। इसमें सोने से मढ़ी मूठ चार इंच की है। 790 साल पुरानी यह धरोहर है। फलक पर सरकार श्री पृथ्वीराज बहादुर संवत 1282 उकेरा है इस महल में रखी है पृथ्वीराज चौहान की तलवार। 

इसके बारेमे भी जानिए :- नाना साहब पेशवा की जीवनी

पृथ्वीराज चौहान का अंतिम युद्ध –

Prithviraj chauhan में पृथ्वीराज के जीवन के अंतिम क्षणों का रोमांचकारी चित्रण इस प्रकार किया है:-(सिरसा गढ़ के इस युद्ध के समय) चौहान नरेश का मनोबल यथावत था। शीघ्रता से हाथी को त्यागकर घोड़े पर सवार होकर सिरसागढ़ को अपनी सुरक्षा का कवच बनाने की दृष्टि से शत्रु के घेरे को तोड़ते हुए निकल भागा। शत्रु पक्ष के एक दल ने चौहान का पीछा किया।

चौहान ने सिरसा के निकट पहुंचकर पीछा करते हुए दल का सामना किया, जहां अंतिम गति प्राप्त होने से पूर्व अनेकानेक शत्रुओं को भी यमलोक का रास्ता दिखा दिया। अंत में राजपूताने का शेर, (भारत की) स्वतंत्रता का पुरोधा, सूर्य कुल का भूषण, शाकंभरीश्वर महाराजा पृथ्वीराज चौहान का सूर्य अस्त हो गया और वह वीरांगना स्त्री (श्यामली) भी साथ ही शहीद हो गयी। सूर्य अस्त हो चुका है।

चौहान चिरनिद्रा में लीन हो धरती की कठोर शैया पर लेटे हैं। विशाल नेत्र बंद हैं, और चेहर आकाश की ओर है। इसके पास ही शत्रु सैनिकों के अनेकानेक शव क्षत विक्षत से बिखरे पड़े हैं। उनके कई अश्वों की लाशें भी दिखाई पड़ रही हैं। चौहान नरेश के शरीर पर करीब 24 से ज्यादा घावों से रक्त प्रवाहित हो रहा है।

पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु कैसे हुई – Prithviraj Chauhan Death

अधिकांश मध्ययुगीन स्रोतों में कहा गया है कि पृथ्वीराज को चौहान राजधानी अजमेर ले जाया गया जहाँ मोहम्मद ने उसे ग़ोरियों के अधीन राजा के रूप में बहाल करने की योजना बनाई थी। कुछ समय बाद, पृथ्वीराज ने मोहम्मद के खिलाफ विद्रोह कर दिया जिसके उपरान्त उन्हें मार दिया गया। पृथ्वीराज रासो का दावा है कि पृथ्वीराज को एक कैदी के रूप में ग़ज़नी ले जाया गया और अंधा कर दिया गया।

यह सुनकर, कवि चंद बरदाई ने गज़नी की यात्रा की और मोहम्मद ग़ोरी को चकमा दिया जिसमें पृथ्वीराज ने मोहम्मद की आवाज़ की दिशा में तीर चलाया और उसे मार डाला। कुछ ही समय बाद, पृथ्वीराज और चंद बरदाई ने एक दूसरे को मार डाला। यह एक काल्पनिक कथा है, जो ऐतिहासिक साक्ष्य द्वारा समर्थित नहीं है पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद मोहम्मद ग़ोरी ने एक दशक से अधिक समय तक शासन करना जारी रखा।

पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद, ग़ोरियों ने उनके पुत्र गोविंदराज को अजमेर के सिंहासन पर राजा नियुक्त किया। 1192 में, पृथ्वी राज चौहाण के छोटे भाई हरिराज ने गोविन्दराज को हटा दिया और अपने पैतृक राज्य का एक हिस्सा वापस ले लिया। गोविंदराजा रणस्तंभपुरा (आधुनिक रणथंभौर) चला गया जहाँ उसने शासकों की एक नई चौहान शाखा स्थापित की |

पृथ्वीराज चौहान की समाधि कहां है – 

Prithviraj chauhan – अफगानिस्तान के गजनी शहर के बाहरी क्षेत्र में पृथ्वीराज चौहान की समाधि आज भी यथास्थान है. लेकिन ससाधि के हालात आज अच्छे नहीं हैं.क्योंकि अफगानिस्तान और पाकिस्तान के लोगों की नजरों में मोहम्मद गोरी हीरो बना हुआ है.

जबकि पृथ्वीराज चौहान को अपना दुश्मन मानते हैं. चुकी पृथ्वीराज चौहान ने गोरी की हत्या की थी. यही वजह है कि पृथ्वीराज चौहान की समाधी को वे लोग तिरस्कार भरी नज़रों से देखते हैं.यहां तक की ठोकर भी मारा करते हैं. पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की प्रेम कहानी आज भी अमर है.

सच्चे प्रेमी-प्रेमियों के लिए प्रेरणादाई. पृथ्वीराज चौहान कि दोनों आंखों को जब जलते सलाखे से जला दिया गया, तब भी उस वीर ने हिम्मत हारे बिना अपने शब्दभेदी बाण से मोहम्मद गोरी की हत्या कर डाली. और दुश्मन के हाथ मरने के बजाय, अपने दोस्त के हाथ मौत को गले लगाना उचित समझा। 

इसके बारेमे भी जानिए :- मिल्खा सिंह की जीवनी

पृथ्वीराज चौहान मूवी – Prithviraj Chauhan Movie

सम्राट पृथ्वीराज चौहान पर एक मूवी भी बनी हे  जिसमे अक्षय कुमार फिल्म के अभिनेता हे | और इस मूवी के निर्देशक Chandraprakash Dwivedi ने किया हे | मूवी के निर्माता Aditya Chopra जी हे और ऐ मूवी पृथ्वीराज चौहान के वीर साहस को देखते ही बनाई है। 

Prithviraj Chauhan Interesting facts –

  • मध्ययुगीन आत्मकथाएँ बताती हैं कि पृथ्वीराज चौहान ने इतिहास, गणित, चित्रकला, दर्शन, चिकित्सा और सेना जैसे विषयों का अध्ययन किया था। वे तीरंदाजी में विशेष रूप से कुशल थे।
  • पृथ्वीराज भारतीय इतिहास में एक बहुत ही प्रसिद्ध और चर्चित नाम ह। चौहान वंश जन्मे पृथ्वीराज चौहान आखरी हिंदू शासक थे बहुत ही कम आयु में उन्होंने अपने पिता की मृत्यु के पश्चात दिल्ली और अजमेर का शासन संभाला था। 
  • मोहम्मद और गौरीपृथ्वीराज  के बीच लगभग 17 युद्ध हुये (कहीं 21 युद्धों का भी उल्लेख है), जिनमें 16 बार पृथ्वीराज ने गौरी को पराजित किया एवं छोड़ दिया।
  • पृथ्वीराज का उल्लेख करने वाले अन्य वृत्तांत और ग्रंथों में प्रबन्ध चिंतामणि, प्रबन्ध कोष और पृथ्वीराज प्रबन्ध शामिल हैं। उनकी मृत्यु के सदियों बाद इनकी रचना की गई थी। 
  • उनके मृत्यु के बाद, ग़ोरियों ने उनके पुत्र गोविंदराज को अजमेर के सिंहासन पर राजा नियुक्त किया। 1192 में, पृथ्वी राज चौहाण के छोटे भाई हरिराज ने गोविन्दराज को हटा दिया और अपने पैतृक राज्य का एक हिस्सा वापस ले लिया।

पृथ्वीराज चौहान के कुछ प्रश्न –

1 .पृथ्वीराज चौहान कौन थे?

भारत के अन्तिम हिन्दूरा जा के रूप में प्रसिद्ध पृथ्वीराज १२३५ विक्रम संवत्सर में पंद्रह वर्ष (१५) की आयु में राज्य सिंहासन पर आरूढ़ हुए। पृथ्वीराज की तेरह रानियाँ थी। उन में से संयोगिता प्रसिद्धतम मानी जाती है।

2 .पृथ्वीराज चौहान ने गौरी को १७ बार क्यों छोड़ दिया ?

अपनी उदारता और दुश्मन के प्रति अपना सन्मान की वजह से पृथ्वीराज ने गौरी को 17 बार छोड़ दिया था। 

3 .क्या आप भी मानते हैं कि जयचंद गहड़वाल ने पृथ्वीराज चौहान से गद्दारी की थी?

राजा जयचंद एक ऐसा ही नाम हैं! उन्हें देश का गद्दार तक कहा जाता है. कहते हैं कि वह पृथ्वीराज चौहान से अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी का बदला लेने के लिए मोहम्मद गौरी से जा मिले थे। 

4 .पृथ्वीराज चौहान को लेकर गुज्जरों द्वारा की गई दावेदारी के प्रमाणिक आधार क्या हैं?

गुर्जरों ने इस आधार पर किया दावा गुर्जरों का मानना है कि अजमेर का चौहान राजवंश उन चारों राजवंशों में शामिल था, जो कि प्रतिहार, परमार, सोलंकी और चौहान राजवंशों में शामिल था। अजमेर के चौहान राजवंश से ही बगड़ावत गाथा का लिंक है, जिसे गुर्जर अपना अराध्य देव मानते हैं। 

इसके बारेमे भी जानिए :- किरण बेदी की जीवनी हिंदी

Conclusion –

दोस्तों आशा करता हु आपको मेरा यह आर्टिकल Prithviraj Chauhan Biography In Hindi बहुत अच्छी तरह से समज आ गया होगा। इस लेख के जरिये  हमने prithviraj chauhan height और prithviraj chauhan jayanti से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दे दी है अगर आपको इस तरह के अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है तो आप हमें कमेंट करके जरूर बता सकते है। और हमारे इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शयेर जरूर करे। जय हिन्द ।

error: Sorry Bro
%d bloggers like this: