Raja Ram Mohan Roy Biography In Hindi – राजा राममोहन राय का जीवन परिचय

आज के हमारे लेख में आपका स्वागत है। नमस्कार मित्रो आज हम Raja Ram Mohan Roy Biography In Hindi बताएँगे। सती और बाल विवाह की प्रथाओं को खत्म करने वाले राजा राममोहन राय की जीवनी बताने वाले है। 

वह भारतीय पुनजोगरण का अग्रदूत और आधुनिक भारत के जनक थे। भारतीय भाषाय प्रेस के प्रवर्तक ,जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता तथा बंगाल में नव-जागरण युग के पितामह थे। आज इस पोस्ट में raja ram mohan roy contribution ,raja ram mohan roy gift to monotheism और raja ram mohan roy brahmo samaj की माहिती बताने वाले है। 

राजा राममोहन राय सति प्रथा और बाल विवाह की प्रथाओं को खत्म करने के प्रयासों के लिये बहुत प्रसिद्ध है। वे एक महान विद्वान और स्वतंत्र विचारक थे | उन्हें बंगाल के नवयुग का प्रवर्तक भी कहा जाता है। राजा राममोहन राय के राजनीतिक विचार और राजा राममोहन राय के आर्थिक विचार ने पुरे भारत की परिस्थितियों का बदलाव किया जिसे चलके नवनिर्माण शुरू हुआ था। और एक आधुनिक भारत की शुरुआत हुई थी। तो चलिए raja ram mohan roy history बताते है। 

Raja Ram Mohan Roy Biography In Hindi –

 नाम   राजा राममोहन राय
 जन्म     22 मई 1772
 पिता  रामकंतो रॉय 
 माता  तैरिणी 
 जन्म स्थान  बंगाल के हुगली जिले का राधानगर गांव
 मृत्यु  27 सितम्बर 1833 

राजा राममोहन राय का जीवन परिचय –

22 मई 1772 को बंगाल के हुगली जिले के राधानगर गांव में राजा राममोहन राय का जन्म हुआ था | पिता का नाम रामकांत रॉय और माता तैरिनी था। उनके पितामह कृष्ण चन्द्र बनर्जी बंगाल की नवाब की सेवा में थे। उन्हें राय की उपाधि प्राप्त थी। ब्रिटिश शाशकों के समक्ष दिल्ली के मुग़ल सम्राट की स्थिति स्पष्ट करने के कारण सम्राट ने उन्हें राजा की उपाधि से विभूषित किया था | प्रतिभा के धनी राजा राम मोहन राय बहुभाषाविद थे। 

 राम मोहन राय का परिवार वैष्णव था। जो धर्म संबधित मामलो में बहुत कट्टर था। जैसा की उस समय प्रचलनमे था। उनकी शादी 9 वर्ष की उम्र में ही कर दी गयी थी। लेकिन उनकी प्रथम पत्नी का जल्द ही देहांत होगया था। इसके बाद 10 वर्ष की उम्र में दूसरी शादी की गयी। जिसे उन्हें दो पुत्र हुए लेकिन 1826 में उस पत्नी का भी देहांत हो गया | उसके बाद उसने तीसरी भी शादी की पर वो भी ज़्यादा दिन तक जीवित नहीं रही थी। 

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राजा राम मोहन राय की शिक्षा – Raja Ram Mohan Roy Education

 राम मोहन राय विद्वता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता की 15 वर्ष की आयु में ही उन्होंने बंगला,पर्शियन,अरेबिक और संस्कृत जैसी भाषाओ सिख ली थी। राजा राम मोहन राय ने पारंम्भिक शिक्षा संस्कृत और बंगाली भाषा अपने गांव के स्कूल से ही ली लेकिन उन्हें | पटना के मदरसे भेज दिया.जहां उन्होंने अरेबिक और पर्शियन जैसी भाषा ओ सिख ली थी | उन्होंने 22 वर्ष की आयु में इंग्लिश भाषा सिख ली थी। 

लेकिन संस्कृत भाषा सिख ने के लिये raja ram mohan roy school काशी तक गये उन्होंने वेदो और उपनिषदो का अध्यन किया उन्होंने अपने जीवन में बाइबल के साथ ही कुरान और अन्य इस्लामिक ग्रंथो का अध्यन किया |वे अरबी,ग्रीक, लेटिन भाषा भी जानते थे | उनके माता पिता ने एक शास्त्री के रूप में तैयार किया था। 

राजा राममोहन और उनका प्रारम्भिक विद्रोही जीवन – 

वो हिन्दू पूजा और परम्पराओ के खिलाफ थे। उन्हें समाज में फैले हुये कुतरियो और अंध विश्वास को पुरजोर विरोध किया था | परन्तु उनके पिता पारम्परिक कट्टर वैष्णव धर्म के पालन करने वाले थे. राजा राममोहन राय ने 14 वर्ष की आयु में ही सन्यास लेने की इच्छा वक्त की लेकिन उनकी माँ ने एक ही हठ पकड़ी थी। राजा राम मोहन राय के परम्परा विरोधी पथ पर चलने और धार्मिक मान्यताओं के विरोध करेने के कारण राजा राम मोहन राय और उनके पिता के साथ मतभेत होने लगा था। झगड़ा बढ़ता देखर उन्होंने अपना घर छोड़ दिया,और वो हिमाल्य और तिब्बक के तरफ चले गये थे।

वापस लौटने से पहले बहोत भ्रमण किया और देश दुनिया के साथ सत्य को भी जाना -समझाना उसको उनकी धर्म की जीजीसा और बढ़ने लगी लेकिन वो घर लोट आएं। जब राजा राम मोहन राय की शादी करवाई थी | तब raja ram mohan roy family को ऐसा लगा था | की शादी के बाद वो अपने विचार बदल लगे लेकिन उनके पर कोई असर नहीं पड़ी थी। विवाह के बाद वाराणसी जाकर उपनिषद और हिन्दू दर्शन शास्त्र का अध्यन किया,लेकिन उनके पिता का देहांत हुवा तो 1803 में वो मुर्शिदाबाद लोट आये। 

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राजा राम मोहन राय का करियर – 

पिता के मृत्यु होजाने के बाद राजा राम मोहन राय वे अपनी जिम्मेदारी का काम देखने लगे। 1805 में में ईस्ट इंडिया कंपनी के एक निम्न पदाधिकारी जॉन दिग्बॉय ने उन्हें पश्चिमी सभ्यता और साहित्य से परिचय करवाया था। 10 साल तक उन्होंने दिग्बाय के असिस्टेंट के रूप में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी में काम किया था।  1809 से लेकर 1814 तक उन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी के रीवेन्यु डिपार्टमेंट में काम किया था। 

राजा राममोहन राय के उदारवादी विचार – 

1803 में रॉय ने हिन्दू धर्म में शामिल विभिन्न मतों में अंध-विश्वासों पर अपनी राय रखी। उन्होंने एकेश्वर वाद के सिद्धांत का अनुमोदन किया, जिसके अनुसार एक ईश्वर ही सृष्टि का निर्माता हैं। इस मत को वेदों और उपनिषदों द्वारा समझाते हुए उन्होंने इनकी संकृत भाषा को बंगाली और हिंदी और इंग्लिश में अनुवाद किया। इनमें रॉय ने समझाया कि एक महाशक्ति हैं। जो मानव की जानाकरी से बाहर हैं।   और इस ब्रह्मांड को वो ही चलाती हैं। 1814 में राजा राम मोहन राय ने आत्मीय सभा की स्थापना की राम मोहन ने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कई मुहिम चलाई 1822 में उन्होंने इंग्लिश मीडियम स्कूल की स्थापना की थी। 

1828 में राजा राम मोहन राय ने ब्रह्म समाज की स्थापना की. इसके द्वारा वो धार्मिक ढोंगों को और समाज में क्रिश्चेनिटी के बढ़ते प्रभाव को देखना-समझना चाहते थे। राजा राममोहन राय के सामाजिक सुधार के  सती प्रथा विरोध में चलाये जाने वाले अभियानों को प्रयासों को तब सफलता मिली।  जब 1829 में सती प्रथा पर रोक लगा दी गई। ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए काम करते हुए। वो इस निष्कर्ष पर पहुंचे। कि उन्हें वेदांत के सिद्धांतों को पुन परिभाषित करने की आवश्यकता हैं। वो पश्चिमी और भारतीय संस्कृति का संगम करवाना चाहते थे। 

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शैक्षिक योगदान – 

Raja Ram Mohan Roy ने इंग्लिश स्कूलों के स्थापना के साथ ही कोलकाता में हिन्दू कॉलेज़े की भी स्थापना की जो की कालांन्तर में देश का बेस्ट शैक्षिक संस्थान बन गया. वो चाहते थे कि देश का युवा और बच्चे नयी से नयी तकनीक की जानकारी हासिल करे इसके लिए। यदि स्कूल में इंग्लिश भी पढ़ना पड़े तो ये बेहतर हैं.राजा राममोहन 1815 में शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के लिए कलकत्ता आए थे. रबिन्द्र नाथ टेगोर और बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्य ने भी उनके पद चिन्हों का अनुकरण किया। 

 Raja Ram Mohan Roy Sati Pratha –

200 साल पहले जब सती प्रथा जैसी बुराइओं ने समाज को जकड़ रखा था | राजा राम मोहन राय ने समाज सुधारक के लिये महत्व भूमिका निभाई उन्होंने सती प्रथा का विरोध किया था। जब पति मर जाता था। तो महिला पति को भी साथ ही चिता में बैठना पड़ता था। लेकिन राजा राम मोहन राय को उनका भाई की मृत्यु हो जाने से उनकी भाभी को चिता में बैठना पड़ा था। तो यह देखा कर राजा राम मोहन राय को दुःख सहन नहीं कर पाये। इस लिये राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा पे विरोध किया उन्होंने महिलाओ के लिए पुरुषो के समान अधिकार के लिए प्रचार किया की उन्हें पुनर्विवाह का अधिकार और संपति रखने का अधिकार के लिए वकालत की। 

1828 में राजा राम मोहन राय ने ‘ब्रह्म “समाजकी स्थापना की। उस समय की समाज में फैली सबसे खतरनाक और अंधविश्वास से भरी परंपरा जैसी सती प्रथा बाल विवाह खिलाफ मुहीम चलाई। राजा राम मोहन राय ने बताया था। की किसी भी वेद में कोई उल्लेख नहीं किया गया है। उन्होंने गवर्नर जनरल लोड विलयम बेटिग की मदद से सती प्रथा के खिलाफ एक कानून का निर्माण करवाया। उन्होंने राज्यों में जा -जा कर लोगो की सोच और इस परंपरा को बदलने में काफी मेहनत और प्रयास किया। सती प्रथा की raja ram mohan roy book भी लिखी है। 

आत्मीय सभा का गठन –

सती प्रथा के के बाद 1814 में आत्मीय सभा का गठन समाज के समाजिक धार्मिक सुधारा करनेका प्रयाश किया जिसे महिला दुबारा शादी कर सके| राजा राम मोहन राय एक ऐसे व्यक्ति थे। जो सती प्रथा और बाल विवाह पे विरोध किया था। 

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बाल विवाह – 

बालविवाह केवल भारत मैं ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में होते आएं हैं। और समूचे विश्व में भारत का बालविवाह में दूसरा स्थान हैं। सम्पूर्ण भारत मैं विश्व के 40% बालविवाह होते हैं और समूचे भारत में 49% लड़कियों का विवाह 18 वर्ष की आयु से पूर्व ही हो जाता हैं। यह प्रथा भारत में शुरू से नहीं थी। ये दिल्ली सल्तनत के समय में अस्तित्व में आया जब राजशाही प्रथा प्रचलन में थी।

भारतीय बाल विवाह को लड़कियों को विदेशी शासकों से बलात्कार और अपहरण से बचाने के लिये एक हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता था। बाल विवाह को शुरु करने का एक और कारण था। बड़े बुजुर्गों को अपने पौतो को देखने की चाह अधिक होती थी इसलिये वो कम आयु में ही बच्चों की शादी कर देते थे। जिससे कि मरने से पहले वो अपने पौत्रों के साथ कुछ समय बिता सकें।

दहेज प्रथा –

दहेज़ का अर्थ है जो सम्पत्ति, विवाह के समय वधू के परिवार की तरफ़ से वर को दी जाती है। दहेज को उर्दू में जहेज़ कहते हैं। यूरोप, भारत, अफ्रीका और दुनिया के अन्य भागों में दहेज प्रथा का लंबा इतिहास है। भारत में इसे दहेज, हुँडा या वर-दक्षिणा के नाम से भी जाना जाता है। वधू के परिवार द्वारा नक़द या वस्तुओं के रूप में यह वर के परिवार को वधू के साथ दिया जाता है।

आज के आधुनिक समय में भी दहेज़ प्रथा नाम की बुराई हर जगह फैली हुई है। पिछड़े भारतीय समाज में दहेज़ प्रथा अभी भी विकराल रूप में है। दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के अनुसार दहेज लेने, देने या इसके लेन-देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद और 15,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है।

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डायन प्रथा – 

डाकन प्रथा एक कुप्रथा थी जो पहले राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में काफी प्रचलित थी | इसमें ग्रामीण औरतो पर डाकन यानिकि अपनी तांत्रिक शक्तियो से नन्हें शिशुओं को मारने वाली पर अंधविश्वास से उस पर आरोप लगाकर निर्दयतापूर्ण मार दिया जाता था। इस प्रथा के कारण सेकड़ो स्त्रियों को मार दिया जाता था। 16 वीं शताब्दी में राजपूत रियासतों ने कानून बनाकर इस प्रथा पर रोक लगादी थी। इस प्रथा पर सर्व प्रथम अप्रैल 1853 में मेवाड़ महाराणा सवरूप सिंह के समय में खेरवाड़ (उदयपुर ) में इसे गैर क़ानूनी घोषित कर दिया था |

बलि प्रथा – 

बलि प्रथा मानव जाति में वंशानुगत चली आ रही एक इस पारम्परिक व्यवस्था में मानव जाति द्वारा मानव समेत कई निर्दोष प्राणियों की हत्या यानि कत्ल कर दिया जाता है। विश्व में अनेक धर्म ऐसे हैं। जिनमें इस प्रथा का प्रचलन पाया जाता है। यह मनुष्य जाति द्वारा मात्र स्वार्थसिद्ध की व्यवस्था है। बलि प्रथा के मुख्य दो कारण पाये जाते थे एक धार्मिक और दूसरा स्वाथिक। 

मूर्ति पूजा का विरोध – 

Raja Ram Mohan Roy ने मूर्ति पूजा का भी खुलकर विरोध किया और एकेश्वरवाद के पक्ष में अपने तर्क रखे। उन्होंने “ट्रिनीटेरिएस्म” का भी विरोध किया जो कि क्रिश्चयन मान्यता हैं। इतिहास के अनुसार भगवान तीन व्यक्तियों में ही मिलता हैं गॉड,सन(पुत्र) जीसस और होली स्पिरिट. उन्होंने विभिन्न धर्मों के पूजा के तरीकों और बहुदेव वाद का भी विरोध किया था। “मैंने पूरे देश के दूरस्थ इलाकों का भ्रमण किया हैं और मैंने देखा कि सभी लोग ये विश्वास करते हैं एक ही भगवान हैं जिससे दुनिया चलती हैं। 

वेस्टर्न शिक्षा की वकालत  – Western Education Advocate

राजा राम मोहन की कुरान, उपनिषद, वेद, बाइबल जैसे धार्मिक ग्रंथो पर ही बराबर की पकड़ थी, ऐसे में इन सबको समझते हुए।  उनका दूसरी भाषा के प्रति आकर्षण होना स्वाभाविक था। वो इंग्लिश के माध्यम से भारत का विज्ञान में वैचारिक और सामाजिक विकास देख सकते थे। उनके समय में जब प्राचिविद और पश्चिमी सभ्यता की जंग चल रही थी। तब उन्होंने इन दोनों के संगम के साथ आगे बढने की इच्छा जाहिर की। उन्होंने  फिजिक्स, मैथ्स, बॉटनी, फिलोसफी जैसे विषयों को पढ़ने को कहा वही वेदों और उपनिषदों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता बताई थी।

उन्होंने लार्ड मेक्ले का भी सपोर्ट किया जो कि भारत की शिक्षा व्यवस्था बदलकर इसमें इंग्लिश को डालने वाले व्यक्ति थे। उनका उद्देश्य भारत को प्रगति की राह पर ले जाना था। 1835 तक भारत में प्रचलन में आई इंग्लिश के एजुकेशन सिस्टम को देखने के लिए जीवित नहीं रहें लेकिन इस बात को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता इस दिशा में कोई सकारात्मक कदम उठाने वाले पहले विचारकों में से एक थे। 

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राजा राममोहन राय का मृत्यु – Raja Ram Mohan Roy Death

 Ram Mohan Roy का मृत्यु का कारण  मेनी मैनिन्जाईटिस था। 1814 में उन्होंने आत्मीय सभा को आरम्भ किया और 1828 में उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की थी।  1831 से 1834 तक उन्होंने इंग्लैंड में अपने प्रवास काल के दौरान ब्रिटिश भारत की प्रशाशनिक पद्धति में सुधर के लिए आंदोलन किया था | 27 सितम्बर 1833 को इंग्लैंड के ब्रिस्टल में उनकी मृत्यु हो गई

Raja Ram Mohan Roy Biography Video –

Raja Ram Mohan Roy Facts –

  • राजा राममोहन राय की पुस्तके की बात करे तो वह बांग्ला, हिन्दी और फारसी भाषा का प्रयोग एक साथ करते थे। 
  • राजा राममोहन राय के विचार इस्लामिक एकेश्वरवाद के प्रति आकर्षित थे।
  • राममोहन राय ने ब्रह्ममैनिकल , संवाद कौमुदी , एकेश्वरवाद का उपहार (मिरात-उल-अखबार)  बंगदूत जैसे अखबारों का  प्रकाशन और संपादन किया था।
  • राजा राममोहन राय के बचपन का नाम राममोहन राय था। 
  • राममोहन राय के राजनीतिक विचारों का वर्णन करे तो ब्रह्मो समाज सभी धर्मों की एकता में विश्वास करके एक सच्चे मानवतावादी और लोकतांत्रिक थे। 
  • राजा राम मोहन राय को राजा की उपाधि 1829 में दिल्ली के राजा अकबर द्वितीय ने दी थी। 

राजा राममोहन राय के प्रश्न –

1 .raja ram mohan roy was born in which village ?

राजा राम मोहन रोय का जन्म राधानगर गांव में हुआ था। 

2 .raja ram mohan roy ne bharateey shiksha ko kis bhasha mein karane par bal diya ?

राजा राममोहन राय ने भारतीय शिक्षा को इंग्लिश भाषा में करने पर बल दिया था। 

3 .raja ram mohan roy kee mrtyu kab huee ?

राजा राममोहन राय की मृत्यु 27 सितम्बर 1833 के दिन हुई थी।  

4 .raja ram mohan roy ka janm kaha hua tha ?

राजा राममोहन राय का जन्म बंगाल के हुगली जिले के राधानगर गांव हुआ था

5 .raja ram mohan roy kaun the ?

राजा राममोहन राय भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत और आधुनिक भारत जनक थे। 

6 .raja ram mohan roy ne kis patrika ka sampadan kiya ? 

राजा राममोहन राय ने  ब्रह्ममैनिकल , संवाद कौमुदी , एकेश्वरवाद का उपहार बंगदूत पत्रिका का संपादन किया था। 

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Conclusion – 

 मेरा आर्टिकल Raja Ram Mohan Roy Biography In Hindi बहुत अच्छी तरह से समज आया होगा।  लेख के जरिये  हमने raja ram mohan roy news paper और raja ram mohan roy presentation से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दी है। अगर आपको अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है। तो कमेंट करके जरूर बता सकते है। हमारे आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शयेर जरूर करे। जय हिन्द।

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