Rani Laxmi Bai Biography In Hindi – रानी लक्ष्मी बाई की जीवनी

आज के हमारे लेख में आपका स्वागत है। नमस्कार मित्रो आज हम Rani Laxmi Bai Biography In Hindi बताएँगे। भारत की सबसे साहसिक वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई का जीवन परिचय बताने वाले है। 

भारत की शौर्य गाथाएं किसको नहीं पता! और उसमे rani lakshmi bai history का जिक्र आते ही हम अपने बचपन में लौट जाते हैं। और सुभद्रा कुमारी चौहान की वह पंक्तियां गुनगुनाने लगते हैं। जिनमें वह कहती हैं कि ” खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी ” . आज हम jhansi ki rani ,rani laxmi bai husband name और rani laxmi bai ki kahani  जानकारी बताने वाले है। रानी लक्ष्मीबाई की बचपन की कहानी ओर जानने की कोशिश करते हैं कि रानी लक्ष्मीबाई का बचपन कैसा था। 

rani laxmi bai ka janm 1835 में वाराणसी जिले के भदैनी में मोरोपन्त तांबे के घर में हुआ था । नाम रखा गया मणीकर्णिका  नाम बड़ा था, इसलिए घर वालों ने उसे मनु कहकर बुलाना शुरु कर दिया था। जिसे बाद में दुनिया ने लक्ष्मीबाई से प्रचलित हुए थे। rani laxmibai life story  बतादे की उन्होंने एक मर्द की तरह दुश्मनो को धूल चटाई थी। इतनाही नहीं मरते दमतक कभी भी हार नहीं मानी थी। तो चलिए rani laxmi bai jivani बताना शुरू करते है। 

Rani Laxmi Bai Biography In Hindi –

नाम झांसी की रानी लक्ष्मीबाई
उपनाम मनु, मणिकर्णिका
जन्म 19 नवंबर, 1828
जन्म भूमि वाराणसी, उत्तर प्रदेश
माता  भागीरथी बाई
पिता मोरोपंत  ताम्बे
अभिभावक भागीरथी बाई और मोरोपंत तांबे 
पति गंगाधर राव निवालकर 
संतान दामोदर राव ,आनंद  राव [ दत्तक  पुत्र ]
घराना  मराठा  साम्राज्य
प्रसिद्ध कार्य  1857 का स्वतंत्रता संग्राम
प्रसिद्धि मराठा शाशन ,स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम महिला 
मृत्यु 17 जून,1858 [ 29 वर्ष ]
मृत्यु स्थान ग्वालियर, मध्य प्रदेश
नागरिकता भारतीय

Rani Laxmi Bai Ka Jeevan Parichay –

देखते ही देखते मनु एक योद्धा की तरह कुशल हो गई। उनका ज्यादा से ज्यादा वक्त लड़ाई के मैदान  में गुजरने लगा। कहते है कि मनु के पिता संतान के रुप में पहले लड़का चाहते थे। ताकि उनका वंश आगे बढ सके। लेकिन जब मनु का जन्म हुआ तो उन्होंने तय कर लिया था। कि वह उसे ही बेटे की तरह तैयार करेंगे। मनु ने भी पिता को निराश नहीं किया। और पिताने सिखाए हर कौशल को जल्द से जल्द सीखती गईं। वह इसके लिए लड़कों के सामने मैदान में उतरने से कभी नहीं कतराईं। उनको देखकर सब उनके पिता से कहते थे मोरोपन्त तुम्हारी बिटियां बहुत खास है। यह आम लड़कियों की तरह नहीं है। 

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  • बचपन से ही थी दृढ़ निश्च्यवादी :-

rani laxmi bai hindi – मनु को बचपन से ही मानते थे कि वह लड़कों के जैसे सारे काम कर सकती हैं। एक बार उन्होंंने देखा कि उनके दोस्त नाना एक हाथी पे घूम रहे थे। हाथी को देखकर उनके अन्दर भी हाथी की सवारी की जिज्ञासा जागी. उन्होंंने नाना को टोकते हुए कहा कि वह हाथी की सवारी करना चाहती हैं। 

इस पर नाना ने उन्हें सीधे इनकार कर दिया। उनका मानना था कि मनु हाथी की सैर करने के योग्य नहीं हैं. यह बात मनु के दिल को छू गई और उन्होंंने नाना से कहा एक दिन मेरे पास भी अपने खुद के हाथी होंगे। वह भी एक दो नहीं बल्कि दस-दस। आगे जब वह झांसी की रानी बनी तो यह बात सच हुई। 

  • लक्ष्मीबाई का जन्म : –

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म एक महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण परिवार में सन 1828  में  काशी में हुआ था, जिसे अब वाराणसी के नाम से जाना जाता  हैं.  उनके पिता मोरोपंत ताम्बे बिठुर में न्यायालय में पेस्वा थे। इसी कारण वे इस कार्य से प्रभावित थी और उन्हें अन्य लड़कियों की अपेक्षा अधिक स्वतंत्रता भी प्राप्त थी. उनकी शिक्षा–दीक्षा में पढाई के साथ–साथ आत्म–रक्षा, घोड़ेसवारी, निशानेबाजी और घेराबंदी का प्रशिक्षण भी शामिल था|

उन्होंने अपनी सेना भी तैयार की थी.  उनकी माता भागीरथी  बाई एक गृहणी थी। उनका नाम बचपन में मणिकर्णिका रखा गया और परिवार के सदस्य प्यार से उन्हें ‘मनु’ कहकर पुकारते थे|  जब वे 4 वर्ष की थी, तभी उनकी माता का देहांत हो गया और उनके पालन–पोषण की सम्पूर्ण जवाबदारी उनके पिता पर आ गयी थी। 

  • लक्ष्मी बाई की शादी : –

rani laxmi bai in hindi – सन 1842 में उनका विवाह उत्तर भारत में स्थित झाँसी राज्य के महाराज गंगाधर राव नेवालकर के साथ हो गया, तब वे झाँसी की रानी बनी. उस  समय वे मात्र 14 वर्ष की थी। विवाह के पश्चात् ही उन्हें ‘लक्ष्मीबाई’ नाम मिला. उनका विवाह प्राचीन झाँसी में स्थित गणेश मंदिर में हुआ था. सन  1851 में उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम दामोदर राव रखा गया, परन्तु  दुर्भाग्यवश वह मात्र 4 मास ही जीवित रह सका था | 

ऐसा कहा जाता हैं कि महाराज गंगाधर राव नेवालकर अपने पुत्र की मृत्यु से कभी उभर ही नही पाए और सन 1853 में महाराज बहुत बीमार पड़ गये, तब उन दोनों ने मिलकर अपने रिश्तेदार महाराज गंगाधर राव के भाई के पुत्र को गोद लेना निश्चित किया। इस प्रकार गोद लिए गये पुत्र के उत्तराधिकार पर ब्रिटिश सरकार कोई आपत्ति न ले, इसलिए यह कार्य ब्रिटिश अफसरों की उपस्थिति में पूर्ण किया गया. इस बालक का नाम आनंद राव था, जिसे बाद में बदलकर दामोदर राव रखा गया। 

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रानी लक्ष्मी बनी उत्तराधिकारी –

21 नवम्बर, सन 1853 में महाराज गंगाधर राव नेवलेकर की मृत्यु हो गयी, उस समय रानी की आयु मात्र 18 वर्ष थी. परन्तु रानी ने अपना धैर्य और  सहस नहीं खोया और बालक दामोदर की आयु कम होने के कारण राज्य–काज का उत्तरदायित्व महारानी लक्ष्मीबाई ने स्वयं पर ले लिया था। उस समय  भारत में लॉर्ड देलहाउसि गवर्नर | उस समय यह नियम था कि शासन पर उत्तराधिकार तभी होगा, जब राजा का स्वयं का पुत्र हो, यदि पुत्र न हो तो उसका राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी में मिल जाएगा। 

राज्य परिवार को अपने खर्चों हेतु पेंशन दी जाएगी.उसने महाराज की मृत्यु का फायदा उठाने की कोशिश की. वह झाँसी को ब्रिटिश राज्य में मिलाना चाहता था. उसका कहना था कि महाराज गंगाधर राव नेवालकर और महारानी लक्ष्मीबाई कीअपनी कोई संतान नहीं हैं। उसने इस प्रकार गोद लिए गये पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया. तब महारानी लक्ष्मीबाई ने लंडन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मुक़दमा दाख़िर किया. पर वहाँ उनका मुकदमा ख़ारिज कर दिया गया.

साथ ही यह आदेश भी दिया गया की महारानी, झाँसी के किले को खाली कर दे और स्वयं रानी महल में जाकर रहें, इसके लिए उन्हें रूपये 60,000/- की पेंशन दी जाएगी। परन्तु रानी लक्ष्मीबाई अपनी झाँसी को न देने के फैसले पर मक्कम थी. वे अपनी झाँसी को सुरक्षित करना चाहती थी, जिसके लिए उन्होंने सेना संगठन प्रारंभ किया। 

रानी लक्ष्मी बाई की लड़ाई – Rani Laxmi Bai Ki Ladai 

rani laxmi bai images – झाँसी 1857 के संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया था | और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया था। इस सेना में महिलाओं की भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया। साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया। झलकारी बाई  जो लक्ष्मीबाई की हमशकल थी  उसको  अपनी सेना में प्रमुख स्थान दिया। 

1857 के सितम्बर तथा अक्टूबर के महीनों में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया था। और रानी ने सफलतापूर्वक इसे विफल कर दिया। 1858 के जनवरी मास  में ब्रितानी सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया। परन् रानी दामोदर राव के साथ अंग्रेज़ों से बच कर भाग निकलने में सफल हो गयी।

rani laxmi bai photo – रानी झाँसी से भाग कर कालपी  पहुँची और तात्या टोपे  से मिली। तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ने  ग्वालियर  के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक क़िले पर क़ब्ज़ा कर लिया। बाजीराव प्रथम के वंशज  अली बहादुर द्रितीय ने भी रानी लक्ष्मीबाई का साथ दिया और रानी लक्ष्मीबाई ने उन्हें राखी भेजी थी इसलिए वह भी इस युद्ध में उनके साथ शामिल हुए।

रानी लक्ष्मी बाई का 1857 का विद्रोह –

18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रितानी स लड़ाई की रिपोर्ट में ब्रितानी जनरल ह्यूरोज़ ने टिप्पणी कि रानी लक्ष्मीबाई अपनी सुन्दरता, चालाकी और दृढ़ता के लिये उल्लेखनीय तो थी ही, लेकीन विद्रोही नेताओं में सबसे अधिक ख़तरनाक भी थी। 10 मई , 1857 को मेरठ में भारतीय विद्रोह प्रारंभ हुआ, जिसका कारण था कि जो बंदूकों की नयी गोलियाँ थी, उस पर सूअर और गौमांस की परत चढ़ी थी. इससे हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं पर ठेस लगी थी और इस कारण यह विद्रोह देश भर  में फ़ैल गया था.

इस विद्रोह को दबाना ब्रिटिश सरकार के लिए ज्यादा जरुरी था, उन्होंने झाँसी को फ़िलहाल रानी लक्ष्मीबाई के आधीन छोड़ने का निर्णय लिया. इस दौरान सितम्बर–अक्टूबर, 1857 में रानी लक्ष्मीबाई को अपने पड़ोसी देशो ओरछा और दतिया के राजाओ के साथ युध्द करना पड़ा क्योकिं उन्होंने झाँसी पर चढ़ाई कर दी थी। इसके कुछ समय बाद मार्च,1858 में अंग्रेजों ने सर ” ह्यू रोज ” के नेतृत्व में झाँसी पर हमला कर दिया था।

तब झाँसी की ओर से तात्या टोपे के नेतृत्व में 20,000 सैनिकों के साथ यह लड़ाई लड़ी गयी, जो लगभग 2 सप्ताह तक चली थी। अंग्रेजी सेना किले की दवारों को तोड़ने में सफल रही और नगर पर कब्ज़ा कर लिया. इस समय अंग्रेज सरकार झाँसी को हथियाने में कामयाब रही और अंग्रेजी सैनिकों नगर में लूट–फ़ाट भी शुरू कर दिया. फिर भी रानी लक्ष्मीबाई  किसी प्रकार अपने पुत्र दामोदर राव को बचाने में सफल रही| 

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 काल्पी की लड़ाई – Kalpi Battle

इस युध्द में हार जाने के कारण उन्होंने सतत 24 घंटों में 102 मील का सफ़र तय किया और अपने दल के साथ काल्पी पहुंची और कुछ समय काल्पी में शरण ली, जहाँ वे ‘तात्या टोपे’ के साथ थी. तब वहाँ के पेस्वा ने परिस्थिति को समझ कर उन्हें शरण दी और अपना सैन्य बल भी प्रदान किया था। 22 मई, 1858 को सर ह्यू रोज ने काल्पी पर आक्रमण कर दिया, तब रानी लक्ष्मीबाई ने वीरता और रणनीति पूर्वक उन्हें परास्त किया और अंग्रेजो को पीछे हटना पड़ा. कुछ समय पश्चात् सर ह्यू रोज ने काल्पी पर फिर से हमला किया और इस बार रानी को हार का सामना करना पड़ा था। 

युद्ध में हारने के पश्चात् राव साहेब पेश्वा , बन्दा के नवाब, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई और अन्य मुख्य योध्दा गोपालपुर में एकत्र हुए. रानी ने ग्वालियर पर अधिकार प्राप्त करने का सुझाव दिया ताकि वे अपने लक्ष्य में सफल हो सके। वही रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने इस प्रकार गठित एक विद्रोही सेना के साथ मिलकर ग्वालियर पर चढ़ाई कर दी. वहाँ इन्होने ग्वालियर के महाराजा को परास्त किया था। और रणनीतिक तरीके से ग्वालियर के किले पर जीत हासिल की और ग्वालियर का राज्य पेश्वा को सौप दिया था। 

रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु  – Rani Laxmi Bai Death

photo of rani laxmi bai – 17 जून,1858 में किंग्स रॉयल आयरिश के खिलाफ युध्द लड़ते समय rani lakshmi bai led the revolt at ग्वालियर के पूर्व क्षेत्र का मोर्चा संभाला. इस युध्द में उनकी सेविकाए तक शामिल थी और पुरुषो की पोशाक धारण करने के साथ ही उतनी ही वीरता से युध्द भी कर रही थी। इस युध्द के दौरान वे अपने ‘राजरतन’ नामक घोड़े पर सवार नहीं थी और यह घोड़ा नया था, जो नहर के उस पार नही कूद पा रहा था, रानी इस स्थिति को समझ गयी और वीरता के साथ वही युध्द करती रही थी। 

इस समय वे बुरी तरह से घायल हो चुकी थी और वे घोड़े पर से गिर पड़ी. क्युकी वे पुरुष पोषक में थी। उन्हें अंग्रेजी सैनिक पहचान नही पाए और उन्हें छोड़ दिया. तब रानी के विश्वास पात्र सैनिक उन्हें पास के गंगादास मठ में ले गये और उन्हें गंगाजल दिया था। तब उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा बताई की “ कोई भी अंग्रेज अफसर उनकी मृत देह को हाथ न लगाए ”  इस प्रकार कोटा की सराई के पास ग्वालियर के फूलबाग क्षेत्र में उन्हें वीरगति प्राप्त हुई अर्थात् वे मृत्यु को प्राप्त हुई थे। 

Rani Laxmi Bai मौत के बाद – 

ब्रिटिश सरकार ने 3 दिन बाद ग्वालियर को हथिया लिया। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके पिता मोरोपंत ताम्बे को गिरफ्तार कर लिया गया और फांसी की सजा दी गयी। rani laxmi bai son दामोदर राव को ब्रिटिश राज्य ध्वारा  पेंशन दी गयी और उन्हें उनका उत्तराधिकार कभी नहीं मिला. बाद में राव इंदौर शहर में बस गये थे। और उन्होंने अपने जीवन का बहुत समय अंग्रेज सरकार को मनाने एवं अपने अधिकारों को पुनः प्राप्त करने के प्रयासों में व्यतीत किया था। उनकी मृत्यु 28 मई, 1906 को 58 वर्ष में हो गयी. इस प्रकार देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए उन्होंने अपनी जान तक न्यौछावर कर दी। 

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Rani Laxmi Bai Biography Video –

Rani Laxmi Bai Interesting Facts –

  • रानी लक्ष्मी बाई पर कविता रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार। खूब लड़ी मर्दानी बहुत प्रसिद्ध है। 
  • रानी लक्ष्मी बाई का विवाह 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ बड़े धूम-धाम से शाही से हुआ था ।
  • वर्तमान समय के शैक्षाणिक अभ्यासों में उनकी शौर्य की याद में रानी लक्ष्मी बाई पर निबंध लिखे जाते है। 
  • रानी लक्ष्मी बाई का नारा ‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’ था जो उन्होंने मरते दम तक निभाया था।  

रानी लक्ष्मीबाई के प्रश्न –

1 .rani laxmi bai ka janm kab hua ?

रानी लक्ष्मी बाई का जन्म 19 नवंबर, 1828  दिन हुआ था। 

2 .rani laxmi bai ki talavar ka vet ?

रानी लक्ष्मी बाई की तलवार का वेट 4 फुट लम्बी और उससे सेकड़ो दुश्मनो के सिर हुए थे।

3 .rani laxmi bai horse name kya tha ?

रानी लक्ष्मी बाई के घोड़े का नाम सारंगी ,पवन और बादल था। 

4 .rani laxmi bai ke bachapan ka nam kya tha ?

रानी लक्ष्मी बाई के बचपन का नाम मनु और मणिकर्णिका था। 

5 .laxmi bai ki saheli kaun thi ?

लक्ष्मी बाई की सहेली की बार करे तो वह नाना के साथ ही खेलती थी उसके अलावा बरछी, ढाल, कृपाण और कटारी उनकी सहेलिया थी।  

6 .laxmi bai kaha ki rani thi ?

लक्ष्मी बाई झांसी की रानी थी।

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Conclusion

आपको मेरा Rani Laxmi Bai Biography In Hindi बहुत अच्छी तरह से समज आया होगा।  लेख के जरिये  हमने rani laxmi bai slogan और jhansi ki rani history से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दी है। अगर आपको अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है। तो कमेंट करके जरूर बता सकते है। हमारे आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शयेर जरूर करे। जय हिन्द।

2 thoughts on “Rani Laxmi Bai Biography In Hindi – रानी लक्ष्मी बाई की जीवनी”

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