Mahakavi Sant Surdas Biography In Hindi – भक्त सूरदास की जीवनी

नमस्कार मित्रो आज के हमारे इस आर्टिकल में आपका स्वागत है ,आज हम Mahakavi Sant Surdas Biography In Hindi में 15 वी शताब्दी के अंधे संत, कवी और संगीतकार महाकवि संत सूरदास का जीवन परिचय बताने वाले है। 

सूरदास का नाम भक्ति की धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त कवियों में सर्वोपरि है , सूरदास अपने भगवान कृष्ण पर लिखी भक्ति गीतों के लिये जाने जाते है। सूरदास जी की रचनाओं में भगवान श्री कृष्ण के भाव स्पष्ट देखने को मिलते हैं। जो भी उनकी रचनाओं को पढ़ता है वो कृष्ण की भक्ति में डूब जाता है। आज surdas story हम सबको surdas wife name, surdas mother name और surdas ki mrityu kab hui thi के बारे में जानकारी बताने वाल है। 

उन्होंने अपनी रचनाओं में भगवान श्री कृष्ण का श्रृंगार और शांत रस में दिल को छू जाने वाला मार्मिक वर्णन किया हैं। सूरदास जी, को हिन्दी साहित्य की अच्छी जानकारी थी, अर्थात उन्हें हिन्दी साहित्य का विद्धान माना जाता था। आज इस लेख में सूरदास की भाषा शैली ,सूरदास के काव्य की विशेषताएं और सूरदास का साहित्यिक परिचय से सबको परिचित करवाते है। सूरदास का जन्म स्थान रुनकता है तो चलिए उस संत की सम्पूर्ण माहिती की और ले चलते है। 

नाम 

सूरदास 

बचपन का नाम

मदन मोहन

जन्म 

संवत् 1535 विक्रमी (स्पष्ट नहीं है)

जन्मस्थान

रुनकता

पिता

रामदास सारस्वत

माता

जमुनादास

 

गुरु

बल्लभाचार्य

कार्यक्षेत्र

कवि

रचनायें

सूरसागर, सूरसारावली,साहित्य-लहरी, नल-दमयन्ती, ब्याहलो

मृत्यु

संवत् 1642 विक्रमी (स्पष्ट नहीं है)

Mahakavi Sant Surdas Biography In Hindi –

महाकवि सूरदास का जन्‍म ‘रुनकता’ नामक ग्राम में सन् 1478 ई. में पं. रामदास घर हुआ था । पं. रामदास सारस्‍वत ब्राह्मण थे और माता जी का नाम जमुनादास। कुछ विद्वान् ‘सीही’ नामक स्‍थान को सूरदास का जन्‍मस्‍थल मानते है। सूरदास जी जन्‍म से अन्‍धे थे या नहीं इस सम्‍बन्‍ध में भी अनेक कत है। कुछ लोगों का कहना है कि बाल मनोवृत्तियों एवं मानव-स्‍वभाव का जैसा सूक्ष्‍म ओर सुन्‍दर वर्णन सूरदास ने किया है, वैसा कोई जन्‍मान्‍ध व्‍यक्ति कर ही नहीं कर सकता, इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि वे सम्‍भवत: बाद में अन्‍धे हुए होंगे।सूरदास जी श्री वल्‍लभाचार्य के शिष्‍य थे।

वे मथुरा के गऊघाट पर श्रीनाथ जी के मन्दिर में रहते थे। सूरदास जी का विवाह भी हुआ था। विरक्‍त होने से पहले वे अपने परिवार के साथ ही रहा करते थे। पहले वे दीनता कें पद गाया करते थे, किन्‍तु वल्‍लभाचार्य के सम्‍पर्क में अने के बाद वे कृष्‍णलीला का गान करने लगे। कहा जाता है कि एक बार मथुरा में सूरदास जी से तुलसी कभ्‍भेंट हुई थी और धीरे-धीरे दोनों में प्रेम-भाव बढ़ गया था। सूर से प्रभ‍ावित होकर ही तुलसीदास ने श्री कृष्‍ण गीतावली’ की रचना की थी।

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सूरदास जी ने गुरू बल्लभाचार्य से ली शिक्षा –

surdas ke dohe – एक बार जब सूरदास जी अपनी वृन्दावन धाम की यात्रा के लिए निकले तो इस दौरान इनकी मुलाकात बल्लभाचार्य से हुई। जिसके बाद वह उनके शिष्य बन गए। गौऊघाट पर ही उनकी भेंट श्री वल्लभाचार्य से हुई और बाद में वह इनके शिष्य बन गए। महाकवि सूरदास ने बल्लभाचार्य से ही भक्ति की दीक्षा प्राप्त की। श्री वल्लभाचार्य ने सूरदास जी को सही मार्गदर्शन देकर श्री कृष्ण भक्ति के लिए प्रेरित किया। आपको बता दें कि भक्तिकाल के महाकवि surdas जी और उनके गुरु वल्लभाचार्य के बारे में एक रोचक तथ्य यह भी हैं कि सूरदास और उनकी आयु में महज 10 दिन का अंतर था। विद्धानों के मुताबिक गुरु बल्लभाचार्य का जन्म 1534 में वैशाख् कृष्ण एकादशी को हुआ था।

इसलिए कई विद्धान सूरदास का जन्म भी 1534 की वैशाख शुक्ल पंचमी के आसपास मानते हैं। आपको बता दें कि सूरदास जी के गुरु बल्लभाचार्य, अपने शिष्य को अपने साथ गोवर्धन पर्वत मंदिर पर ले जाते थे। वहीं पर ये श्रीनाथ जी की सेवा करते थे, और हर दिन दिन नए पद बनाकर इकतारे के माध्यम से उसका गायन करते थे। बल्लभाचार्य ने ही सूरदास जी को ही ‘भागवत लीला’ का गुणगान करने की सलाह दी थी। इसके बाद से ही उन्होंने श्रीकृष्ण का गुणगान शुरू कर दिया था। उनके गायन में श्री कृष्ण के प्रति भक्ति को स्पष्ट देखा जा सकता था। इससे पहले वह केवल दैन्य भाव से विनय के पद रचा करते थे। उनके पदों की संख्या ‘सहस्राधिक’ कही जाती है, जिनका संग्रहित रूप ‘सूरसागर’ के नाम से काफी मशहूर है।

मदन मोहन सूरदास कैसे बने –

surdas ke pad class 10 – कुछ जनश्रुतियों के अनुसार सूरदास के बचपन का नाम मदन मोहन था. मदन मोहन एक बहुत ही सुन्दर और तेज बुद्धि का नवयुवक था जो हर दिन नदी के किनारे जा कर बैठ जाता और गीत लिखता था. एक दिन एक ऐसा वाकया हुआ जिसने उसके मन को मोह लिया. हुआ ये कि एक सुन्दर नवयुवती नदी किनारे कपड़े धो रही थी, मदन मोहन का ध्यान उसकी तरफ चला गया , उस युवती ने मदन मोहन को ऐसा आकर्षित किया कि वह कविता लिखना भूल गया और पूरा ध्यान लगा कर उस युवती को देखने लगा , उनको ऐसा लगा मानो यमुना किनारे राधिका स्नान कर के बैठी हो। 

उस नवयुवती ने भी मदन मोहन की तरफ देखा और उसके पास आकर बोली आप मदन मोहन जी हो ना?जी हां मैं मदन मोहन हूँ, कविताये लिखता हूँ तथा गाता हूँ आपको देखा तो रुक गया. नवयुवती ने पूछा क्यों ? तो वह बोला आप हो ही इतनी सुन्दर , यह सिलसिला कई दिनों तक चला। जब यह बात मदन मोहन के पिता को पता चली तो उनको बहुत क्रोध आया और उन्होंने मदन मोहन को घर से निकाल दिया पर उस सुन्दर युवती का चेहरा उनके मन मस्तिष्क से नहीं जा रहा था | 

एक दिन वह मंदिर मे बैठा था तभी वह शादीशुदा और बहुत ही सुन्दर स्त्री आई  मदन मोहन उनके पीछे-पीछे चल दिया ,जब वह उसके घर पहुंचा तो उसके पति ने दरवाजा खोला तथा पूरे आदर सम्मान के साथ उसको अंदर बिठाया ,उनका ऐसा व्यवहार देखकर मदनमोहन को बहुत ग्लानि हुयी और फिर मदन मोहन ने दो जलती हुए सलाखें मांगी और उसे अपनी आँखों में डाल लिया। इस तरह मदन मोहन अंधे हो गया और बाद में महान कवि सूरदास के नाम से ख्याति अर्जित की थी। 

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सूरदास का व्यवसाय –

surdas bhajan – सूरदास जी जन्मान्ध थे अतः वैसे तो उनका कोई व्यवसाय या धंधा नही था। लेकिन वे जब छः वर्ष के थे तब सकुण बताया करते थे। इसके बदले में वे कोई पैसा नही लेते थे। जब वे सीही से दूर किसी सरोवार के निकट झोपड़ी बनाकर रहते थे तो वे गायनवादन करते थे। और शकुन भी बताते थे। गोघाट पर श्री बल्लभाचार्य जी से दीक्षा लेने पर गुरू जी ने गोवर्द्धन पर श्री नाथ जी के मंदिर पर कीर्तनीया का पद उन्हे प्रदान किया। अन्यथा उनका कोई व्यक्तिगत व्यवसाय और धंधा नही था जिससे आय या आमदनी प्राप्त हो सकें। केवल भगवान का श्रीमद्भगवत के अनुसार कृष्ण लीलागान करना ही उनका व्यवसाय था।

सूरदास के ग्रंथ और काव्य –

सूरदास के मत अनुसार श्री कृष्ण भक्ति करने और उनके अनुग्रह प्राप्त होने से मनुष्य जीव आत्मा को सद्गति प्राप्त हो सकती है। सूरदास ने वात्सल्य रस, शांत रस, और श्रिंगार रस को अपनाया था। surdas ने केवल अपनी कल्पना के सहारे श्री कृष्ण के बाल्य रूप का अदभूत, सुंदर, दिव्य वर्णन किया था। जिसमे बाल-कृष्ण की चपलता, स्पर्धा, अभिलाषा, और आकांक्षा का वर्णन कर के विश्वव्यापी बाल-कृष्ण स्वरूप का वर्णन प्रदर्शित किया था। सूरदास ने अत्यंत दुर्लभ ऐसा “भक्ति और श्रुंगार” को मिश्रित कर के, संयोग वियोग जैसा दिव्य वर्णन किया था जिसे किसी और के द्वारा पुन रचना अत्यंत कठिन होगा। स्थान संस्थान पर सूरदास के द्वारा लिखित कूट पद बेजोड़ हैं।

यशोदा मैया के पात्र के शील गुण पर सूरदास लिखे चित्रण प्रशंसनीय हैं। सूरदास के द्वारा लिखी गईं कविताओं में प्रकृति-सौन्दर्य का सुंदर, अदभूत वर्णन किया गया है। surdas कविताओं में पूर्व कालीन आख्यान, और ईतिहासिक स्थानों का वर्णन निरंतर होता था। सूरदास हिन्दी साहित्य के महा कवि माने जाते हैं। श्रीमद्भागवत गीता के गायन में सूरदास जी की रूचि बचपन से ही थी और आपसे भक्ति का एक पद सुनकर महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने आपको अपना शिष्य बना लिया और आप श्रीनाथजी के मंदिर में कीर्तन करने लगे| अष्टछाप के कवियों में surdas जी सर्वश्रेष्ठ कवि माने गए हैं, अष्टछाप का संगठन वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ ने किया था|

यह कैसे एक अंधे कवि ऐसे सावधानीपूर्वक और रंगीन विस्तार में मंच द्वारा कृष्ण के बचपन, चरण चित्रित सकता साहित्य के स्थानों में चमत्कार की एक है ,कृष्ण अपनी पहली दाँत काटने, अपने पहले शब्द के बोले, उसकी पहली बेबस कदम उठा, सूरदास के लिए सभी अवसरों के लिए प्रेरित गाने जो भी इस दिन के लिए गाया जाता है घरों के सैकड़ों की संख्या में माताओं जो अपने में बच्चे कृष्ण देखें द्वारा, रचना अपने बच्चों को. प्यार है कि एक बच्चे के रूप में किया गया था उसे इनकार कर दिया, प्यार है कि बाला गोपाला पर ब्रज में और बौछार अपने गीतों के माध्यम से बहती है।

कृष्ण भक्त के रूप में सूरदास जी –

अपने गुरु बल्लभाचार्य से शिक्षा लेने के बाद सूरदास जी पूरी तरह से भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में लीन हो गए। सूरदास जी की कृष्ण भक्ति के बारे में कई सारी कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के मुताबिक, एक बार surdas जी श्री कृष्ण की भक्ति नें इतने डूब गए थे कि वे कुंए में तक गिर गए थे, जिसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने खुद साक्षात दर्शन देकर उनकी जान बचाई थी। जिसके बाद देवी रूकमणी ने श्री कृष्ण से पूछा था कि, हे भगवन, तुमने सूरदास की जान क्यों बचाई। तब कृष्ण भगवान ने रुकमणी को कहा के सच्चे भक्तों की हमेशा मदद करनी चाहिए, और सूरदास जी उनके सच्चे उपासक थे जो निच्छल भाव से उनकी आराधना करते थे।

उन्होंने इसे सूरदास जी की उपासना का फल बताया, वहीं यह भी कहा जाता है कि जब श्री कृष्ण ने सूरदास की जान बचाई थी तो उन्हें नेत्र ज्योति लौटा दी थी। जिसके बाद सूरदास ने अपने प्रिय कृष्ण को सबसे पहले देखा था।इसके बाद श्री कृष्ण ने सूरदास की भक्ति से प्रसन्न होकर उनसे वरदान मांगने को कहा। जिसके बाद सूरदास ने कहा कि – मुझे सब कुछ मिल चुका हैं और सूरदास जी फिर से अपने प्रभु को देखने के बाद अंधा होना चाहते थे। क्योंकि वे अपने प्रभु के अलावा अन्य किसी को देखना नहीं चाहते थे। फिर क्या था भगवान श्री कृष्ण ने अपने प्रिय भक्त की मुराद पूरी कर दी और उन्हें फिर से उनकी नेत्र ज्योति छीन ली। इस दौरान भगवान श्री कृष्ण ने सूरदास जी को आशीर्वाद दिया कि उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैले और उन्हें हमेशा याद किया जाए।

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सूरदास का सूरसागर –

सूरसागर में लगभग एक लाख पद होने की बात कही जाती है। किन्तु वर्तमान संस्करणों में लगभग पाँच हजार पद ही मिलते हैं। विभिन्न स्थानों पर इसकी सौ से भी अधिक प्रतिलिपियाँ प्राप्त हुई हैं, जिनका प्रतिलिपि काल संवत् 1658 वि. से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक है इनमें प्राचीनतम प्रतिलिपि नाथद्वारा (मेवाड़) के “सरस्वती भण्डार’ में सुरक्षित पायी गई हैं। सूरसागर surdas का प्रधान एवं महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें प्रथम नौ अध्याय संक्षिप्त है, पर दशम स्कन्ध का बहुत विस्तार हो गया है।

इसमें भक्ति की प्रधानता है। इसके दो प्रसंग “कृष्ण की बाल-लीला’ और “भ्रमर-गीतसार’ अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। सूरसागर की सराहना करते हुए डॉक्टर हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है – “”काव्य गुणें की इस विशाल वनस्थली में एक अपना सहज सौन्दर्य है। वह उस रमणीय उद्यान के समान नहीं जिसका सौन्दर्य पद-पद पर माली के कृतित्व की याद दिलाता है, बल्कि उस अकृत्रिम वन-भूमि की भाँति है जिसका रचयिता रचना में घुलमिल गया है।” दार्शनिक विचारों की दृष्टि से “भागवत’ और “सूरसागर’ में पर्याप्त अन्तर है।

साहित्य लहरी – यह 118 पदों की एक लघु रचना है। इसके अन्तिम पद में सूरदास का वंशवृक्ष दिया है, जिसके अनुसार सूरदास का नाम सूरजदास है और वे चन्दबरदायी के वंशज सिद्ध होते हैं। अब इसे प्रक्षिप्त अंश माना गया है ओर शेष रचना पूर्ण प्रामाणिक मानी गई है। इसमें रस, अलंकार और नायिका-भेद का प्रतिपादन किया गया है। इस कृति का रचना-काल स्वयं कवि ने दे दिया है जिससे यह संवत् विक्रमी में रचित सिद्ध होती है। रस की दृष्टि से यह ग्रन्थ विशुद्ध श्रृंगार की कोटि में आता है।

सूरदास की कृतियॉं – Surdas works

भक्‍त शिरोमणि सूरदास ने लगभग सवा-लाख पदों की रचना की थी। ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ की खोज तथा पुस्‍तकालय में सुरक्षित नामावली के अनुसार सूरदास के ग्रन्‍थों की संख्‍या 25 मानी जाती है।

  • सूरसागर
  • सूरसारावली
  • साहित्‍य-लहरी
  • नाग लीला
  • गोवर्धन लीला
  • पद संग्रह
  • सूर पच्‍चीसी

surdas ने अपनी इन रचनाओं में श्रीकृष्‍ण की विविध लीलाओं का वर्णन किया है। इनकी कविता में भावपद और कलापक्ष दोनों समान रूप से प्रभावपूर्ण है। सभी पद गेय है, अत:उनमें माधुर्य गुूण की प्रधानता है। इनकी रचनाओं में व्‍यक्‍त सूक्ष्‍म दृष्टि का ही कमाल है कि आलोचक अब इनके अनघा होने में भी सन्‍देह करने लगे है।

सूरदास की शैली – Surdas style

सूरदास जी ने सरल एवं प्रभवपूर्ण शेली का प्रयोग किया है। इनका काव्‍य मुक्‍तक शैली आधारित है। कथा-वर्णन में वर्णनात्‍मक शैली का प्रयाेग हुआ है। दृष्‍टकूट-पदों में कुछ क्लिष्‍टता का समावेशअवश्‍य हो गया है।

सम्राट अकबर की सर्वश्रेष्ठ कवि सूरदास से मुलाकत –

महाकवि surdas जी के भक्तिमय गीत हर किसी को भगवान की तरफ मोहित करते हैं। वहीं सूरदास जी की पद-रचना और गान-विद्या की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। वहीं इसको सुनकर सम्राट अकबर भी कवि सूरदास से मिलने से लिए खुद को नहीं रोक सके। साहित्य में इस बात का जिक्र किया गया है कि अकबर के नौ रत्नों में से एक संगीतकार तानसेन ने सम्राट अकबर और महाकवि सूरदास जी की मथुरा में मुलाकात करवाई थी। surdas जी की पदों में भगवान श्री कृष्ण के सुंदर रूप और उनकी लीलाओं का वर्णन होता था।

जो भी उनके पद सुनता था, वो ही श्री कृष्ण की भक्ति रस में डूब जाता था। इस तरह अकबर भी सूरदास जी का भक्तिपूर्ण पद-गान सुनकर अत्याधिक खुश हुए। वहीं यह भी कहा जाता है कि सम्राट अकबर ने महाकवि सूरदास जी से उनका यशगान करने की इच्छा जताई लेकिन सूरदास जी को अपने प्रभु श्री कृष्ण के अलावा किसी और का वर्णन करना बिल्कुल भी पसंद नहीं था। इसके अलावा सूरदास जी के पद – रचनाओं ने महाराणा प्रताप जैसी सूरवीर को भी प्रभावित किया है।

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सूरदास की मृत्यु – Surdas death

surdas जी के जन्म की तरह मृत्यु के बारे में भी कई मतभेद है। सूरदास जी ने भक्ति के मार्ग को ही अपनाया। सूरदास जी ने अपने जीवन के आखिरी पल ब्रज में गुजारे। कई विद्धानों के मुताबिक सूर का निधन 1642 में हुआ था।इस तरह महान कवि सूरदास जी का पूरा जीवन श्री कृष्ण की भक्ति को समर्पित था।

Mahakavi Sant Surdas Video –

सूरदास के रोचकतथ्य –

  • भक्त सूरदास के द्वारा लिखी गईं कविताओं में प्रकृति-सौन्दर्य का सुंदर, अदभूत वर्णन किया गया है।
  • संत सूरसागर ने लगभग एक लाख पद होने की बात कही जाती है ,वर्तमान संस्करणों में लगभग पाँच हजार पद ही मिलते हैं।
  • सूरदास जी ने सरल एवं प्रभवपूर्ण शेली का प्रयोग किया है। इनका काव्‍य मुक्‍तक शैली आधारित है।
  • अकबर के नौ रत्नों में से एक संगीतकार तानसेन ने सम्राट अकबर और महाकवि सूरदास जी की मथुरा में मुलाकात करवाई थी।

सूरदास के प्रश्न –

1 .सूरदास की पत्नी का नाम क्या था ?

उनकी पत्नी का नाम कोई नहीं था क्योकि उन्होंने विवाह नहीं किया था। 

2 .सूरदास किस भक्ति के कवि हैं ?

वह कृष्णा भक्ति के कवी थे। 

3 .सूरदास का जन्म कब हुआ था ?

संवत् 1535 में सूरदास का जन्म हुआ था। 

4 .सूरदास जी किसके भक्त थे ?

भगवान कृष्ण के भक्त थे सूरदास जी । 

5 .सूरदास जी की काव्य भाषा क्या है ?

उनकी काव्य भाषा ब्रजभाषा थी जो गोपियों को बहुत प्रिय हुआ करती थी।  

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निष्कर्ष – 

दोस्तों आशा करता हु आपको मेरा यह आर्टिकल Mahakavi Sant Surdas Biography In Hindi आपको बहुत अच्छी तरह से समज आ गया होगा और पसंद भी आया होगा । इस लेख के जरिये  हमने surdas death date और सूरदास जी के भजन से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दे दी है अगर आपको इस तरह के अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है तो आप हमें कमेंट करके जरूर बता सकते है। और हमारे इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शयेर जरूर करे। जय हिन्द। 

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