Krishnadevaraya Biography In Hindi – कृष्णदेवराय का जीवन परिचय

नमस्कार मित्रो आज के हमारे लेख में आपका स्वागत है ,आज हम Krishnadevaraya Biography In Hindi में दक्षिण भारत के एक महान महाराजा जिन्होंने न केवल युद्ध शैली से सबका दिल जीता है, बल्कि राजपरंपरा से अपनी ही पहचान बनाई कृष्णदेवराय का जन्म परिचय बताने वाले है। 

भारत में हमेशा से ही कई ऐसे महान राजा हुए हैं ,जैसे की चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक महान, हर्षवर्धन और राजा भोज जैसे न जाने कितने ऐसे राजा हैं, जिन्होंने इतिहास को न केवल बदल दिया, बल्कि उसमें अपनी अलग छाप छोड़ दी। आज sri krishnadevaraya history में सब को krishnadevaraya wife , krishnadevaraya son और how did krishnadevaraya died ? जैसी माहिती से महितगार करने वाले है। 

दक्षिण भारत के एक राजा कृष्णदेव राय यह वह राजा हैं जिनकी सोच का कायल अकबर भी था ,इतनी महान सोच वाले राजा थे ,आज हम कृष्ण देव राय की उपलब्धियों का वर्णन करें गे और कृष्णदेव राय ने किस नगर की स्थापना की थी उसकी भी जानकारी देने वाले है। उन्होंने अपने जीवन में प्रजाहित के लिए बहुत बड़ा योगदान दिया और प्रजालक्षी कार्य भी किये है उसकी सम्पूर्ण जानकारी इस आर्टिकल में मिलने वाली है तो चलिए शुरू करते है। 

नाम श्री कृष्णदेव राय
जन्म 16 फरवरी, 1471
जन्म स्थान  हम्पी, कर्नाटक
 पिता तुलुव नरसा नायक (बंटों के सरदार)
माता नागला देवी
पत्नी अन्नपूर्णा देवी, चिन्ना देवी, तिरुमला देवी,
 बेटा तिरुमला राय
शासन-काल 1509-1529 तक
मृत्यु 1529 हम्पी कर्नाटक

Krishnadevaraya Biography In Hindi –

Krishnadevaraya जी कर्नाटक के हंपी में 16 फरवरी, 1471 में तुलुव नरसा नायक के बेटे के रुप में जन्में थे, उनके पिता बंटों के सरदार थे। जिन्हें बाद में सालुव वंश के दूसरे और आखिरी शासक इम्माडि नरसिंह का संरक्षक बनाया गया था, वहीं बाद में उनके पिता ने इम्माडि नरसिंह को कैद कर सपूंर्ण उत्तर भारत में अपना अधिकार कर लिया था और 1492 ईसवी में उनके पिता ने विजयनगर की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी। इसके बाद 1503 ईसवी में उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। आपको बता दें कि कृष्णदेव राय जी बचपन से काफी कुशाग्र बुद्धि के बालक थे। वहीं वीर नरसिंह जी उनके बड़े भाई थे।

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कृष्णदेवराय का शासन काल – 

1509 से 1529 तक Krishnadevaraya का शासन काल था। इस समय उनके पूर्वजों ने एक इस महँ साम्राज्य की नीव रखी जिसे विजय नगर का नाम दिया गया। विजय नगर का अर्थ है जीत का शहर । इस राज्य की राजधानी का नाम डम्पी और हम्पी था। हम्पी के मंदिरों और महलों की हालत को देखकर उसके भव्य होने का पता लगाया जाता है ऐसे महलों को यूनेस्को ने विश्‍व धरोहर में शामिल कर दिया है। जैसे आज के समय में न्यूयॉर्क, हांगकाग, और दुबई विश्व व्यापार और आधुनिकता के प्रमाण बताया हैं, वैसे ही उस समय में हम्पी का समय हुआ करता था।

भारत के इतिहास में मध्यकाल में दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य को उसी तरह की प्रतिष्ठा प्राप्त थी जैसे कि प्राचीनकाल में उज्जैनी मगध या थाणेश्वर के राज्यों को प्राप्त हुआ करती थी। कृष्णदेव राय विजयनगर साम्राज्य के महान शासको में से एक थे, संगम वंश के शासक कृष्णदेवराय के शासन काल में विजयनगर साम्राज्य दक्षिण भारत की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति के रूप में उभरा। मुगल के अकबर ने भी कृष्ण देवराय के जीवनकाल से बहुत सी नयी सीख ली और उनका अनुसरण भी किया।

Krishnadevaraya से पहले उनके बड़े भाई वहां की राजगद्दी संभाले हुए थे। उनका नाम नरसिंह था 1505-1509 ई. तक उनके बड़े भाई ने वहां की बाग़डोर संभाली कुछ लोगों का मानना हैं कि नरसिंह 1510 ई. तक तो विजयनगर की गद्दी पर ही बैठे थे।  परन्तु चालीस वर्ष की उम्र में उन्हें किसी अज्ञात बीमारी ने घेर लिया और 1509 ई. में वह मृत्यु को प्राप्त हो गये। वीर नरसिंह का देहांत होने के बाद 8 अगस्त सन 1509 ई. को कृष्ण देवराय का विजयनगर साम्राज्य के सिंहासन पर राजतिलक किया गया।

शास्त्रों के साथ शस्त्रों की भी शिक्षा प्राप्त की थी –

राजा Krishnadevaraya ने कला और साहित्य को भी प्रोत्साहित किया. वे तेलुगु साहित्य के महान विद्वान थे. कुमार व्यास का ‘कन्नड़-भारत’ कृष्ण देवराय को समर्पित है। उन्होंने तेलुगु के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अमुक्त माल्यद’ या ‘विस्वुवितीय’ की रचना की. कृष्ण देवराय ने संस्कृत भाषा में एक नाटक ‘जाम्बवती कल्याण’ की भी रचना की थी. इसके अलावा संस्कृत में उन्होंने ‘परिणय’, ‘सकलकथासार– संग्रहम’, ‘मदारसाचरित्र’, ‘सत्यवधु– परिणय’ भी लिखा। 

कृष्ण देवराय के दरबार में तेलुगु साहित्य के 8 सर्वश्रेष्ठ कवि हुआ करते थे. जिन्हें ‘अष्ट दिग्गज’ कहा गया है. ये ‘अष्ट दिग्गज’ मंत्रिपरिषद में शामिल थे और समाज कल्याण के कामों पर नज़र रखते थे. राजा तक प्रजा की सीधी पहुंच थी। राजा कृष्ण देवराय के दरबार के सबसे प्रमुख सलाहकार थे रामलिंगम यानि तेनालीराम. कृष्ण देवराय का अनुसरण करते हुए अकबर ने भी अपने नवरत्नों में बीरबल को रखा था। 

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कृष्णदेवराय ने कैसे बनाया था एक विशाल राज्य –

Krishnadevaraya जानते थे कि अगर उन्हें अपने राज्य को खुशहाल बनाना है, तो उन्हें प्रजा तक पहुँच रखनी होगी. इसके लिए भी उन्होंने एक अनूठी पहल शुरू की. उन्होंने अवंतिका जनपद के महान राजा विक्रमादित्य के नवरत्न रखने की परंपरा से प्रभावित होकर अष्ट दिग्गज की स्थापना की। यह अष्ट दिग्गज पूरी तरह से राजा कृष्ण देव के अधीन थे. उनका काम था कि राज्य को सुखी बनाए रखने के लिए राजा को सलाह दें. बात दुश्मनों की हो, जंग की हो या फिर प्रजा की ख़ुशी की. कृष्ण देव के यह अष्ट दिग्गज उन्हें हर चीज की सलाह देते थे। 

आपको जानकार हैरानी होगी कि बाद में अष्ट दिग्गज बदल कर नवरत्न कर दिए गए थे. इस समिति में बाद में तेनालीराम को भी शामिल कर लिया गया था. उन्हें कृष्ण देव राय के दरबार का सबसे प्रमुख और बुद्धिमान दरबारी माना जाता था। उनकी सलाह और बुधिमत्ता की वजह से कई बार राज्य को आक्रमणकारियों से निजात मिली. वहीं दरबार में उनकी मौजूदगी से राज्य में कला और संस्कृति को भी बढ़ावा मिला. ये कहने में कोई भी शक नहीं है कि वो विजयनगर साम्राज्य के चाणक्य थे। 

कृष्णदेवराय के युद्धों – 

  • तालीकोट का युद्ध :-

एक समय ऐसा भी आया, जब कई सुल्तानों ने मिलकर Krishnadevaraya के विरुद्ध जिहाद बोल दिया। यह युद्ध ‘दीवानी’ नामक स्थान पर हुआ। मलिक अहमद बाहरी, नूरी ख़ान ख़्वाजा-ए-जहाँ, आदिलशाह, कुतुब उल-मुल्क, तमादुल मुल्क, दस्तूरी ममालिक, मिर्ज़ा लुत्फुल्लाह, इन सभी ने मिलकर हमला बोला।  इसमें बीदर का सुल्तान महमूद शाह द्वितीय घायल होकर घोड़े से गिर पड़ा। किंतु जब घायल सुल्तान महमूद शाह को सेनापति रामराज तिम्मा ने बचाकर मिर्ज़ा लुत्फुल्लाह के खेमे में पहुँचाया था और यूसुफ़ आदिल ख़ाँ मार डाला गया। इसे पक्षपात मानकर भ्रम हो गया और सुल्तानों में अविश्वास के कारण जिहाद असफल हो गया। इस लड़ाई में सुल्तानों को भारी क्षति उठानी पड़ी। उन्हें समूल नष्ट नहीं करना बाद में मंहगा पड़ा और सभी मुस्लिम रियासतें राजा कृष्णदेव राय विरुद्ध तालीकोट के युद्ध में पुन: संगठित हो गयीं।

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  • रायचूर की विजय :

विभिन्न युद्धों में लगातार विजय के कारण अपने जीवन काल में ही राजा कृष्णदेव राय लोक कथाओं के नायक हो गए थे। उन्हें अवतार कहा जाने लगा था और उनके पराक्रम की कहानियाँ प्रचलित हो गयी थीं। रायचूर विजय ने सचमुच उन्हें विश्व का महानतम सेनानायक बना दिया था। सबसे कठिन और भारतवर्ष का सबसे विशाल युद्ध रायचूर के क़िले के लिए हुआ था।  कृष्णदेव राय ने वीर नरसिंह राय को वचन दिया था कि वे रायचूर का क़िला भी जीतकर विजयनगर साम्राज्य में मिला लेंगे। यह अवसर भी अनायास ही कृष्णदेव राय के हाथ आया।

घटनाक्रम के अनुसार कृष्णदेव राय ने एक मुस्लिम दरबारी सीडे मरीकर को 50,000 सिक्के देकर घोड़े ख़रीदने के लिए गोवा भेजा था। किंतु वह अली आदिलशाह प्रथम के यहाँ भाग गया। सुल्तान आदिलशाह ने उसे वापस भेजना अस्वीकार कर दिया। तब कृष्णदेव राय ने युद्ध की घोषणा कर दी और बीदर, बरार, गोलकुण्डा के सुल्तानों को भी सूचना भेज दी। सभी सुल्तानों ने राजा का समर्थन किया। 11 अनी और 550 हाथियों की सेना ने चढ़ाई कर दी। मुख्य सेना में 10 लाख सैनिक थे।

कृष्णदेवराय का शक्तिशाली सैन्य –

राजा Krishnadevaraya के नेतृत्व में 6000 घुड़सवार, 4000 पैदल और 300 हाथी अलग थे। यह सेना कृष्णा नदी तक पहुंच गयी थी। 19 मई, 1520 को युद्ध प्रारंभ हुआ और आदिलशाही फ़ौज को पराजय की सामना करना पड़ा। लेकिन उसने तोपखाना आगे किया और विजयनगर की सेना को पीछे हटना पड़ा। अली आदिलशाह प्रथम को शराब पीने की आदत थी। एक रात्रि वह पीकर नाच देख रहा था, तभी वह अचानक उठा, नशे के जोश में हाथी मंगाया और नदी पार कर विजयनगर की सेना पर हमला करने चल दिया।

उसका सिपहसालार सलाबत ख़ाँ भी दूसरे हाथी पर कुछ अन्य हाथियों को लेकर चला। राजा कृष्णदेव राय के सजग सैनिकों ने हमले का करारा जवाब दिया और नशा काफूर होते ही आदिलशाह भागा। प्रात:काल होने तक उसके सिपाही और हाथी कृष्णा नदी में डूब गए या बह गए। ऐसी रणनीति ने उसके सिपाहियों और सेनापतियों का यकीन डिगा दिया। दूसरी ओर कृष्णदेव राय तब तक रणभूमि नहीं छोड़ते थे, जब तक आखिरी घायल सैनिक की चिकित्सा न हो जाए। अत: जब तोपखाने के सामने उनकी सेना पीछे हट गयी तो राजा ने केसरिया बाना धारण कर लिया।

अपनी मुद्रा सेवकों को दे दीं ताकि रानियाँ सती हो सकें और स्वयं घोड़े पर सवार होकर नई व्यूह रचना बनाकर ऐसा आक्रमण किया कि सुल्तानी सेना घबरा गयी और पराजित होकर तितर-बितर हो गयी। सुल्तान आदिलशाह भाग गया और रायचूर क़िले पर विजयनगर साम्राज्य का अधिकार हो गया। आस-पास के अन्य सुल्तानों ने राजा की इस विजय का भयभीत होकर अभिनन्दन किया। जब आदिलशाह का दूत क्षमा याचना के लिए आया तो राजा का उत्तर था कि स्वयं आदिलशाह आकर उसके पैर चूमे थे। 

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कृष्णदेवराय की मृत्यु – (Krishnadevaraya Death)

सन 1529 में कृष्णदेव राय की मृत्यु हो गयी कहा जाता है उनकी मृत्यु जहर दिये जाने के कारण हुयी बाद में वे बीमार पड़ गये जिस कारण उनकी मृत्यु हो गयी ।कुछ इतिहासकार कृष्णदेव राय जी की मौत का कारण पुत्र विलाप भी मानते हैं।दरअसल, राजा के इकलौते पुत्र तिरुमल राय की भी एक राजनैतिक षडयंत्र के तहत हत्या कर दी गई थी।

Krishnadevaraya History Video –

कृष्णदेवराय के रोचक तथ्य –

  • कृष्ण देवराय ने राजमहेन्द्रपुरम, अन्नतपुर, राजगोपुरम, रामेश्वरम समेत कई मंदिरों का निर्माण करवाया था ,इसके अलावा कई जर्जर और बंजर भूमि को कृषि योग्य बना के प्रजा हित के कार्य किये थे। 
  • राजा के इकलौते पुत्र तिरुमल राय की भी एक राजनैतिक षडयंत्र के तहत हत्या कर दी गई थी।
  • कृष्ण देवराय तेलुगु साहित्य के महान विद्वान थे उन्होंने तेलुगु के प्रसिद्ध ग्रन्थ अमुक्त माल्यद की रचना की थी यह रचना तेलुगु के पांच महाकाव्यों में से एक है। 
  • कृष्णदेवराय के शासन काल में विजयनगर साम्राज्य दक्षिण भारत की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति के रूप में उभरा था। 
  • राजा कृष्णदेव राय का जन्म का जन्म 16 फरवरी 1471 में हम्पी (कर्नाटक) में हुआ था। उनको आंध्र्भोज, आंध्र पितामह और अभिनव भोज की उपाधि दी गयी थी।

कृष्णदेवराय के प्रश्न –

1 .राजा कृष्णदेव राय का प्रसिद्ध दरबारी कौन थे ?

कृष्णदेवराय के दरबार में तेलुगु साहित्य के आठ सर्वश्रेष्ठ कवि रहते थे।, दरबारी के नाम अल्लसीन पेड्डना, तेनालीराम रामकृष्ण, नंदितिम्मन, यादय्यगी मल्लन, घूर्जर्टि, भट्टमूर्ति, जिंग्लीरन्न और अच्युलराजु रामचंद्र थे। 

2 .कृष्णदेव राय कहां के राजा थे ?

कृष्णदेव राय विजयनगर के महाराजा थे। 

3 .अष्टदिग्गज क्या है ?

 कृष्णदेवराय जी के दरबार में तेलुगु साहित्य के 8 महान कवि भी रहते थे, जिन्हें ”अष्टदिग्गज” के रुप में जाना जाता है। 

4 .कृष्ण देव राय किसके समकालीन थे ?

कृष्ण देवराय मुगल बादशाह बाबर के समकालीन थे  बाबर ने उनकी आत्मकथा बाबरनामा में कृष्ण देवराय को भारत के शक्तिशाली राजा थे उसका वर्णन किया है।

5 .कृष्णदेव राय कौन से वंश से संबंधित थे ?

कृष्णदेव राय, तुलव वंश के राजा थे , उन्होंने 1509 से 1525 ई तक विजयनगर पर शासन किया था वह कूटनीति में माहिर हुआ करते था। 

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निष्कर्ष – 

दोस्तों आशा करता हु आपको मेरा यह आर्टिकल Krishnadevaraya Biography In Hindi आपको बहुत अच्छी तरह से समज आ गया होगा और पसंद भी आया होगा । इस लेख के जरिये  हमने krishnadevaraya wives names और krishnadevaraya achievements से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दे दी है अगर आपको इस तरह के अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है तो आप हमें कमेंट करके जरूर बता सकते है। और हमारे इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करे। जय हिन्द ।

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