Krishna Dev Rai Biography In Hindi – कृष्ण देव राय की जीवनी

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नमस्कार मित्रो आज के हमारे लेख में आपका स्वागत है ,आज हम Krishna Dev Rai Biography In Hindi में दक्षिण भारत के एक महान महाराजा जिन्होंने न केवल युद्ध शैली से सबका दिल जीता है, बल्कि राजपरंपरा से अपनी ही पहचान बनाई कृष्ण देव राय की जीवनी बताने वाले है। 

भारत में हमेशा से ही कई ऐसे महान राजा हुए हैं, जिन्होंने न केवल युद्ध शैली से सबका दिल जीता है, बल्कि राजपरंपरा से अपनी एक अलग पहचान बनाई है। आज श्री कृष्ण देव राय कहां के राजा थे ? ,कृष्णदेव राय के आठ दरबारी और कृष्ण देव राय की उपलब्धियों का वर्णन करें गे। भारत देश वैसे तो वीर रत्नो को जन्म देने वाली भूमि रही है ऐसे ही कृष्ण देव राय संबंधित है वह सभी जानकारी से आपको परहेज कारने वाले है।  

देश में चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक महान, हर्षवर्धन और राजा भोज जैसे न जाने कितने ऐसे राजा हैं, जिन्होंने इतिहास को न केवल बदल दिया, बल्कि उसमें अपनी अलग छाप छोड़ दी. इसी कड़ी में एक नाम आता है दक्षिण भारत के एक राजा का. इस राजा का नाम है कृष्णदेव राय , यह वह राजा हैं जिनकी सोच का कायल अकबर भी था।  तो चलिए भारत के महान राजा कृष्ण देव राय किसके समकालीन थे उसकी सम्पूर्ण माहिती बताना शुरू करते है। 

Krishna Dev Rai Biography In Hindi –

 नाम

 कृष्ण देव राय

 जन्म

 16 फरवरी 1471

 पिता

 तुलुव नरस नायक

 माता

 नागला देवी

 पत्नी

 अन्नपूर्णा देवी, चिन्ना देवी, तिरुमला देवी,

 भाई

 वीर नरसिंह

 बेटा

 तिरुमला राय

 शासन-काल

 1509-1529 तक

 मृत्यु

 1529, हम्पी,कर्नाटक

कृष्ण देव राय की जीवनी –

Krishna Dev Rai का जन्म का जन्म 16 फरवरी 1471 में हम्पी (कर्नाटक) में हुआ था। उनको आंध्र्भोज, आंध्र पितामह और अभिनव भोज की उपाधि दी गयी थी। राजा कृष्ण देवराय सोलहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत के एक विजयनगर राज्य के शासक थे। जिस तरह शिवाजी महराज पृथ्वीराज राज चौहान थे उसी प्रकार महा बलशाली योद्धा कृष्ण देवराय थे उनकी ख्याति उत्तर के चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, चंद्रगुप्त मौर्य, , पुष्यमित्र,स्कंदगुप्त और महाराजा भोज के समान ही थी है।  बाबर ने अपनी आत्मकथा में बाबरनामा में महा बलशाली कृष्णदेव राय जी को तत्कालीन भारत का सबसे शक्तिशाली राजा बताया था।

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 कृष्ण देवराय का प्रारंभिक जीवन –

राजा कृष्णदेव राय ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर दिया। कृष्णदेव राय विजयनगर साम्राज्य के महानतम शासक थे। उन्होंने ईसवी वर्ष 1509 से 1529 तक शासन किया. संगम वंश के शासक कृष्णदेवराय के शासन काल में विजयनगर साम्राज्य दक्षिण भारत की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति के रूप में उभरा. कृष्णदेव राय ने आंध्रभोज, आंध्र पितामह और अभिनव भोज उपाधियां धारण की थीं. मुगल सम्राट अकबर ने कृष्ण देवराय के जीवन से बहुत कुछ सीख लेकर अनुसरण किया था , कृष्णदेव राय की मृत्यु 1529 में जहर दिए जाने के बाद बीमार पड़ने के कारण हुई । 

विजयनगर साम्राज्य के सबसे यशस्वी सम्राट कृष्ण देवराय की ख्याति उत्तर के चंद्रगुप्त मौर्य, पुष्यमित्र, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, स्कंदगुप्त, हर्षवर्धन और महाराजा भोज से कम नहीं है। जिस तरह उत्तर भारत में महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी महाराज, बाजीराव और पृथ्वीराज चौहान ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया था, उसी तरह दक्षिण भारत में राजा कृष्ण देवराय और उनके पूर्वजों ने अपनी मातृभूमि की रक्षा और सम्मान को बचाने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। 

सेनानायक के बेटे से बन गए राजकुमार – Krishna Dev Rai

तुगलक वंश के शासक मुहम्मद तुगलक के शासनकाल (1324-1351) के अंतिम समय उसकी गलत नीतियों की वजह से पूरे राज्य में अव्यवस्था फ़ैल गई थी. इसका दक्षिण के राजाओं ने खूब फायदा उठाया. उन्होंने अपने राज्यों को स्वतंत्र घोषित कर दिया था. इसी दौरान हरिहर और बुक्का ने 1336 ई. में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की. इस राज्य के सबसे शक्तिशाली राजा कृष्ण देवराय थे। महान राजा Krishna Dev Rai का जन्म 16 फरवरी को 1471 में कर्नाटक के हम्पी में हुआ था ,उनके पिता थे तुलुव नरस नायक , उनके पिता सालुव वंश के एक सेनानायक थे। 

नरस नायक सालुव वंश के दूसरे और अंतिम शासक इम्माडि नरसिंह के संरक्षक थे। अल्पायु इम्माडि नरसिंह को कैदी बना कर उनके पिता ने 491 में विजयनगर की बागडोर ले ली. पिता के राजा बनते ही कृष्ण देव की किस्मत ही बदल गई. पल भर में उनकी जिंदगी एक सेनानायक के बेटे से राजा के बेटे में बदल गई. हर सुविधा उनके पास आ गई थी। एक आलीशान जिंदगी वह व्यतीत करने लगे. हालांकि तभी उनके ऊपर बुरी किस्मत के बादल मंडराने लगे. उनके पिता को राज संभाले ज्यादा वक़्त हुआ ही नहीं था कि उनकी मौत हो गई , पिता की मौत के बाद राज्य बिखरने लगा , ऐसी स्थिति में कृष्ण देव के बड़े भाई आई गद्दी संभालने के लिए। 

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कृष्णदेव राय का शासनकाल – Krishnadeva Raya Reign

1509 से 1529 तक Krishna Dev Rai का शासन काल था। इस समय उनके पूर्वजों ने एक इस महँ साम्राज्य की नीव रखी जिसे विजय नगर का नाम दिया गया। विजय नगर का अर्थ है जीत का शहर । इस राज्य की राजधानी का नाम डम्पी और हम्पी था। हम्पी के मंदिरों और महलों की हालत को देखकर उसके भव्य होने का पता लगाया जाता है ऐसे महलों को यूनेस्को ने विश्‍व धरोहर में शामिल कर दिया है। जैसे आज के समय में न्यूयॉर्क, हांगकाग, और दुबई विश्व व्यापार और आधुनिकता के प्रमाण बताया हैं, वैसे ही उस समय में हम्पी का समय हुआ करता था।

भारत के इतिहास में मध्यकाल में दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य को उसी तरह की प्रतिष्ठा प्राप्त थी जैसे कि प्राचीनकाल में उज्जैनी मगध या थाणेश्वर के राज्यों को प्राप्त हुआ करती थी। कृष्णदेव राय विजयनगर साम्राज्य के महान शासको में से एक थे, संगम वंश के शासक कृष्णदेवराय के शासन काल में विजयनगर साम्राज्य दक्षिण भारत की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति के रूप में उभरा। मुगल के सम्राट अकबर ने भी कृष्ण देवराय के जीवनकाल से बहुत सी नयी सीख ली और उनका अनुसरण भी किया था ।

कृष्णदेव राय का राज्याभिषेक –

Krishna Dev Rai से पहले उनके बड़े भाई वहां की राजगद्दी संभाले हुए थे। उनका नाम नरसिंह था 1505-1509 ई. तक उनके बड़े भाई ने वहां की बाग़डोर संभाली कुछ लोगों का मानना हैं नरसिंह 1510 ई. तक तो विजयनगर की गद्दी पर ही बैठे थे , परन्तु चालीस वर्ष की उम्र में उन्हें किसी अज्ञात बीमारी ने घेर लिया और 1509 ई. में वह मृत्यु को प्राप्त हो गये। वीर नरसिंह का देहांत होने के बाद 8 अगस्त सन 1509 ई. को कृष्ण देवराय का विजयनगर साम्राज्य के सिंहासन पर राजतिलक किया गया था ।

Krishnadev Rai courtier ( कृष्णदेव राय के दरबारी )

अवंतिका जनपद के महान राजा विक्रमादित्य ने नवरत्न रखने की परम्परा की शुरूआत की थी. इस परम्परा का अनुसरण कई राजाओं ने किया , कृष्णदेवराय के दरबार में तेलुगु साहित्य के आठ सर्वश्रेष्ठ कवि रहते थे जिन्हें अष्ट दिग्गज कहा जाता था , कृष्णदेव राय के दरबारी के नाम अल्लसीन पेड्डना, तेनालीराम रामकृष्ण, नंदितिम्मन, यादय्यगी मल्लन, घूर्जर्टि, भट्टमूर्ति, जिंग्लीरन्न और अच्युलराजु रामचंद्र थे । 

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कृष्णदेव राय का साहित्य में योगदान –

कृष्णदेवराय कन्नड भाषी क्षेत्र में जन्मे ऐसे महान राजा थे, जिनकी मुख्य साहित्यिक रचना तेलुगु भाषा में रचित थी , कृष्ण देवराय तेलुगु साहित्य के महान विद्वान थे उन्होंने तेलुगु के प्रसिद्ध ग्रन्थ अमुक्त माल्यद की रचना की. उनकी यह रचना तेलुगु के पांच महाकाव्यों में से एक है , कृष्णदेवराय ने संस्कृत भाषा में नाटक जाम्बवती कल्याणम् और ऊषा परिणय की रचना की थी। 

कृष्णदेव राय जी के दरबार के अष्टदिग्गज कवि –

महान एवं कुशल प्रशासक श्री कृष्णदेवराय जी के दरबार में तेलुगु साहित्य के 8 महान कवि भी रहते थे, जिन्हें ”अष्टदिग्गज” के रुप में जाना जाता है।अष्टदिग्गज कवियों में प्रमुख अल्लसानि पेद्दन को तुलुगु कविता के पितामह की उपाधि दी गई थी। अष्टदिग्गजों में दूसरे महान कवि नन्दी तिम्मन थे, जिन्होंने पारिजातहरण की रचना की थी। अष्टदिग्गजों में तीसरे कवि भट्टूमूर्ति, चौथे कवि धुर्जटि, पांचवे कवि माद्य्यगरी मल्लन, छठवें कवि अच्चलराजु रामचन्द्र, सातवें कवि पिंगलीसूरत्र और आठवें कवि मुक्कू तिरुलराय थे।

कृष्णदेव राय जी के पुर्तगालियों के साथ संबंध –

इतिहास के महान शासकों में एक Krishna Dev Rai  जी ने एक समझौते के तहत पुर्तगालियों के साथ दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाया था। दरअसल, उस दौरान अरब एवं फारस के होने वाले घोड़े के व्यापार पर पुर्तगालियों का पूरा अधिकार था। इसलिए कृष्णदेव राय जी ने अपनी समझदारी के साथ पुर्तगाली शासक अल्बुकर्क के साथ संधि कर ली, ताकि वे बिना किसी रुकावट के व्यापार कर सकें। पुर्तगालियों के साथ श्री कृष्णदेवराय जी की संधि के मुताबिक पुर्तगाली अपने घोड़ों को सिर्फ विजयनगर में भी बेचने के लिए तैयार था। वरहीं कृ्ष्णदेव राय जी ने पुर्तगालियों को भटकल में किला बनाने के लिए इस शर्त पर किला बनाने के लिए अनमति दी थी कि वे मुस्लिमों से गोवा छीन लेंगे।

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कृष्ण देव राय जी ने गिरते राज्य को फिर से संभाला –

पिता की मौत के बाद बड़े भाई नरसिंह को राजगद्दी मिली. उन्होंने 1505 से 1509 तक राज्य को संभाला. राज्य सँभालते हुए उनके सामने कई बड़ी समस्याएं थी. एक तरफ जहाँ पूरे राज्य पर आक्रमण हो रहे थे. वहीं दूसरी ओर राज्य में भी विरोध के सुर सुनाई दे रहे थे. इस वजह से उनका पूरा शासनकाल सिर्फ आंतरिक विद्रोह एंव आक्रमणों से लड़ते हुए गुजरा. इस दौरान 40 की उम्र में उनकी मौत हो गई थी।

बेहद विपरीत हालात में राज्य की बागडोर कृष्ण देवराय ने अपने हाथों में ली. वो 1509 में राजगद्दी पर बैठे थे। राजगद्दी, जो दूर से सोने का सिंहासन नज़र आ रही थी वो कृष्ण देव राय के लिए एक काटों का हार थी. गद्दी पाने के बाद उनके पिता और भाई, तो पहले ही मर चुके थे. राज्य के अंदर लड़ाई चल रही थी. हर चीज उथलपुथल के दौर से गुजर रही थी. कोई और होता, तो शायद इस राजगद्दी से दूर भाग जाता मगर कृष्ण राय ने ऐसा नहीं किया। 

कृष्ण देव राय की किस्मत में कुछ और ही था –

राज्य की बागडोर हाथो में लेते ही उन्होंने राज्य में फैले विद्रोह को शांत किया और अपने राज्य की सीमा को मजबूत किया. वह बहुत ही शांति और सूजबूझ से अपने फैसले लेते थे. कहते हैं कि वह कभी भी सिर्फ अपना हित नहीं देखते थे , वह हमेशा एक बीच का रास्ता निकालते थे ताकि हर किसी का भला उससे हो ,यह भी एक कारण माना जाता है कि कृष्ण देव को एक महान राजा कहा जाता था. उन्होंने उस समय अपने राज्य को संभाला जब वह पूरी तरह से टूटने की कगार पर था. जो काम नामुमकिन सा लग रहा था उसे उन्होंने पूरा करके दिखा दिया था , इसके बाद उन्होंने अपना शासन शुरू किया था। 

कृष्णदेव राय जी के महान कार्य –

कृष्णदेव राय जी इतिहास के एक महान शासक थे, जिनकी तुलना महान सम्राट अशोक, विक्रमादित्य आदि से की जाती है। उन्होंने अपने काल में न सिर्फ कला, साहित्य आदि को बढ़ावा दिया, बल्कि स्थापत्य कला एवं वास्तुकला के भी शानदार नमूने पेश किए। उन्होंने कई खंडहरो में तब्दील मंदिरों का फिर से जीर्णोद्धार करवाया और विजयनगर वास्तुकला का एक शानदार नमूना पेश किया। उन्हो्ंने राजमहेन्द्रपुरम, अन्नतपुर, राजगोपुरम, रामेश्वरम समेत कई मंदिरों का निर्माण करवाया था ।

इसके अलावा उन्होंने कई जर्जर और बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाया। कृष्णदेवराय जी ने अपने शासनकाल में कई नहरों का निर्माण भी करवाया एवं पुर्तगालियों के साथ अच्छे व्यापारिक संबंध स्थापित किए। इसके साथ ही उन्होंने अपने शासनकाल में ”विवाह कर” जैसे कई गैरजरूरी करों को खत्म किया था ।

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कृष्णदेव राय जी द्वारा एक समृद्ध, संपन्न एवं शक्तिशाली राज्य की स्थापना –

Krishna Dev Rai जी एक बेहद बुद्धिमान एवं प्रभावशाली राजा थे, जिनके शासनकाल में विजयनगर सम्राज्य एक समृद्ध, संपन्न एवं शक्तिशाली राज्य बन गया था। उस समय यह हर दूसरे सम्राज्य के लिए एक आदर्श सम्राज्य था। कृष्णदेव राय जी के शासनकाल के समय उनके सम्राज्य के सभी लोगों को समान अधिकार प्राप्त थे। इसके साथ ही उस दौरान नागरिक की शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य सेवाओं का भी काफी ध्यान रखा जाता था। इसके अलावा उनके शासनकाल में कला और साहित्य को भी काफी बढ़ावा दिया गया, इसलिए उनके काल को स्वर्ण युग के रुप में देखा गया। दरअसल कृष्णदेवराय जी के शासन के समय कई भाषाओं में साहित्य भी काफी फला-फूला था।

यही नहीं उनके राज्य में तेलुगू, कन्नड़, संस्कृत, तमिल समेत कई कवियों में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था। आपको बता दें कि अष्टदिग्गज-आठ महान कवि उनके मुख्य दरबारी थे। काव्य, कविता और साहित्य के साथ-साथ कृष्णदेव राय जी संगीत के भी महान संरक्षक थे। आपको बता दें कि उनके दरबार में तेनाली राम जैसे महान संगीतकार मौजूद थे। यही नहीं उनका राज्य कला और वास्तुकला से समृद्ध राज्य भी था। कृष्णदेव राय जी के शासनकाल के समय ही हंपी में प्रसिद्ध विट्ठलस्वामी और हजारा मंदिर का निर्माण करवाया था। कई मंदिरों के अलावा यहां पर कई अन्य वास्तुकला और विजयनगर शैली के शानदार नमूने भी स्थापित किए गए थे।

कोण्डविड, उड़ीसा और रायचूर राज्य में विजय –

कृष्णदेव राय जी ने अपने शासनकाल में कई युद्ध में जीत हासिल कर अपने युद्ध और रण कौशल का परिचय दिया था। आपको बता दें कि उन्होंने पहले डेक्कन में सफलता हासिल की और फिर उड़ीसा के गजपति जागीरदार राजाओं पर जीत हासिल कर कावेरी नदी के गंगा राजा को हराया एवं अजेय जल दुर्ग पर अपना आधिपत्य स्थापित करने में कामयाबी हासिल की। कृष्णदेव राय जी ने अपने शासनकाल के दौरान अपने बड़े भाई वीर नरसिंह जी से किए गए वचन के अनुसार कोण्डविड, उड़ीसा और रायचूर राज्य को अपनी शक्ति से अपने अधीन कर लिया था ।

कृष्ण देव राय एक विद्वान और योद्धा भी थे –

एक अच्छे राजा की हर निशानी कृष्णदेव राय में मौजूद थी , सेनानायक के पुत्र होने की वजह से उन्हें युद्ध की समझ अच्छे से थी. इसी वजह से उन्हें जंग में हराना काफी मुश्किल काम था. माना जाता है कि अपने 21 वर्ष के शासन के दौरान उन्होंने 14 युद्ध लड़े. इस दौरान उन्होंने सभी युद्धों मे जीत हासिल की. आप को जानकर हैरानी होगी कि बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी‘ में कृष्ण देवराय को भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक तक बता दिया था।

कृष्ण देव राय के शासन में हर कोई उनसे प्रभावित था, फिर चाहे वह दोस्त हो या फिर दुश्मन Krishna Dev Rai न केवल एक योद्धा थे बल्कि एक विद्वान भी थे. उन्होंने तेलुगु के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अमुक्तमाल्यद’ या ‘विषुववृत्तीय’ की रचना की. ये बेहद हैरान करने वाली बात है, लेकिन उनकी यह रचना तेलुगु के पांच महाकाव्यों में से एक है. तेलुगु के अलावा कृष्ण देव राय ने संस्कृत भाषा में एक नाटक ‘जाम्बवती कल्याण’ को भी लिखा था। 

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Krishna Dev Rai Death ( कृष्णदेव राय जी की मृत्यु )

इतिहास के सबसे अधिक शक्तिशाली राजा कृ्ष्णदेव राय जी 1529 ईसवी में इस दुनिया को अलविदा कहकर हमेशा के लिए यह दुनिया छोड़कर चले गए थे। कुछ इतिहासकार उनकी मौत की वजह किसी अज्ञात बीमारी को मानते हैं। जबकि कुछ इतिहासकार कृष्णदेव राय जी की मौत का कारण पुत्र विलाप भी मानते हैं। दरअसल, राजा के इकलौते पुत्र तिरुमल राय की भी एक राजनैतिक षडयंत्र के तहत हत्या कर दी गई थी। हालांकि उनकी मौत के बाद 1530 में विजयनगर सम्राज्य की राजगद्दी पर अच्युत राय बैठा फिर 1542 में उनके राज की कमान सदाशिवराय ने संभाली।

Krishna Dev Rai History Video –

Krishna Dev Rai Interesting Facts –

  • राजा कृष्ण देवराय का जन्म का जन्म 16 फरवरी 1471 में हम्पी (कर्नाटक) में हुआ था। उनको आंध्र्भोज, आंध्र पितामह और अभिनव भोज की उपाधि दी गयी थी।
  • राजा कृष्णदेव राय ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर दिया था , कृष्णदेव राय विजयनगर साम्राज्य के महानतम शासक थे। 
  • कृष्णदेव राय के दरबारी के नाम अल्लसीन पेड्डना, तेनालीराम रामकृष्ण, नंदितिम्मन, यादय्यगी मल्लन, घूर्जर्टि, भट्टमूर्ति, जिंग्लीरन्न और अच्युलराजु रामचंद्र थे । 
  • कृष्णदेव राय की मृत्यु 1529 में जहर दिए जाने के बाद बीमार पड़ने के कारण हुई ऐसा कहाजाता था। 
  • विजयनगर साम्राज्य के सबसे यशस्वी सम्राट कृष्ण देवराय की ख्याति उत्तर के चंद्रगुप्त मौर्य, पुष्यमित्र, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, स्कंदगुप्त, हर्षवर्धन और महाराजा भोज से कम नहीं है।

Krishna Dev Rai Questions –

1 .कृष्ण देव राय की मृत्यु कैसे हुई ?

उनके पुत्र तिरुमल राय की भी एक राजनैतिक षडयंत्र के तहत हत्या कर दी गई थी ,उनके वियोग में कृष्ण देव राय की मृत्यु हुई थी। 

2 .कृष्ण देव राय द्वारा लिखित कृति थी ?

तेलुगु भाषा में कृष्ण देव राय का काव्य अमुक्तमाल्यद साहित्य का एक अनमोल रत्न कहाजाता है।

3 .कृष्ण देव राय को किसने हराया?

कृष्ण देव राय को किसी ने नहीं हराया था वह अपने पुत्र की मृत्यु के बाद उनके वियोग में चले जाने की वजह से मौत हो होचुकी थी। 

4 .कृष्ण देव राय की मृत्यु कब हुई?

1529, हम्पी,कर्नाटक में कृष्ण देव राय की मृत्यु हुई थी। 

5 .कृष्णदेवराय की उपलब्धियां क्या हैं?

तुलुवा राजवंश के तीसरे शासक कृष्णदेवराय ने साम्राज्य का विस्तार दक्षिण भारत में किया, जिसमें वर्तमान उत्तरी तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक, कटक तक विस्तार किया गया था। 

6 .कृष्णदेवराय किस भाषा में बात करते थे?

तेलुगु और कन्नड़ भाषामे बात किया करते थे महाराज कृष्णदेवराय। 

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Conclusion –

दोस्तों आशा करता हु आपको मेरा यह आर्टिकल Krishna Dev Rai Biography In Hindi आपको बहुत अच्छी तरह से समज आ गया होगा और पसंद भी आया होगा । इस लेख के जरिये  हमने राजा कृष्ण देव राय का प्रसिद्ध दरबारी और कृष्ण देव राय किस वंश का राजा था  से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दे दी है अगर आपको इस तरह के अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है तो आप हमें कमेंट करके जरूर बता सकते है। और हमारे इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शयेर जरूर करे। जय हिन्द ।

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