Jai Shankar Prasad Biography In Hindi – जयशंकर प्रसाद की जीवनी हिं

नमस्कार मित्रो आज के हमारे आर्टिकल में आपका स्वागत है आज हम Jai Shankar Prasad Biography In Hindi में आपको हिन्दी के महान कवि, नाटकार, के साथ साथ कथाकार, और उपन्यासकार , निबन्धकार jai shankar prasad ka jeevan parichay बताने वाले है। 

जयशंकर प्रसाद के वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं ,आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में इनके कृतित्व का गौरव अक्षुण्ण है। आज हम jai shankar prasad ki jivani में आपको jai shankar prasad poems ,jaishankar prasad ki bhasha shaili और jaishankar prasad ka hindi sahitya mein sthan की जानकारी से ज्ञात करवाने वाले है। 

जयशंकर प्रसाद ने हिंदी काव्य में छायावाद की स्थापना की और उसीकी वजहसे खड़ी बोली के काव्य में कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई और वह काव्य की सिद्ध भाषा बन गई। जयशंकर प्रसाद एक युगप्रवर्तक लेखक थे और उन्होंने एक ही बारीमे कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरव करने लायक कृतियाँ दीं थी । तो चलिए इस महान कवी jaishankar prasad in hindi की सम्पूर्ण माहिती से महितगार करते है। 

  नाम    जयशंकर प्रसाद
  जन्म   30 जनवरी 1889ई
  जन्मस्थान   सरायगोवर्धन
  पिता   देवीप्रसाद साहू
  माता   श्री मति मुन्नी देवी
  मुत्यु   15 नवम्बर, सन् 1937 ई.
  मुत्युस्थान   वाराणसी, उत्तर प्रदेश में

Jai Shankar Prasad Biography In Hindi –

कवि के रूप में जयशंकर प्रसाद ऐक निराला, पन्त, महादेवी के साथ छायावाद के चौथे स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हुए है ,नाटक लेखन में भारतेंदु के बाद वे एक अलग धारा बहाने वाले युगप्रवर्तक नाटककार रहे जिनके नाटक आज भी पाठक चाव से पढते हैं। इसके अलावा कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में भी जयशंकर प्रसाद की कई यादगार कृतियाँ दी थी । विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करूणा और भारतीय मनीषा के ऐक से ऐक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन जयशंकर प्रसाद ने किया था ,जयशंकर प्रसाद की भाषा शैली बहुत ही सरल है इन्ही वजह से जयशंकर प्रसाद की कविता लहर पुरे भारत में छायी हुई है।

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Jai Shankar Prasad – ( जयशंकर प्रसाद का साहित्यिक परिचय )

48 वर्षो के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध और विभिन्न विधाओं में रचनाएं की थी ।जयशंकर प्रसाद का जन्म माघ शुक्ल 10, संवत्‌ 1946 वि 30 जनवरी 1889ई को काशी के सरायगोवर्धन में हुआ था । जयशंकर प्रसाद के पिता बाबू शिवरतन साहू दान देने में खूब ही आगे रहते थे और इनके पिता बाबू देवीप्रसाद जी कलाकारों का आदर करने के लिये वही पर उपस्थित रहे थे।

कच्ची गृहस्थी,मे ही मोसा की लडकी से शादी कर ली और एक अन्य पत्नि का भी उल्लेख आता है जयशंकर प्रसाद की कुल सात संताने मानी गयी है जिसमें छह पुत्रियां व एक पुत्र था, इन सबका सामना उन्होंने धीरता और गंभीरता के साथ किया। प्रसाद जी की प्रारंभिक शिक्षा काशी में क्वींस कालेज में हुई, और बाद में घर पर इनकी शिक्षा का व्यापक प्रबंध किया गया, जहाँ संस्कृत, हिंदी, उर्दू, तथा फारसी का अध्ययन जयशंकर प्रसाद किया। दीनबंधु ब्रह्मचारी जैसे विद्वान्‌ इनके संस्कृत के अध्यापक थे। इनके गुरुओं में ‘रसमय सिद्ध’ की भी चर्चा की जाती है।

जयशंकर प्रसाद की प्रमुख रचनाएं –

जयशंकर प्रसाद की कविताएं दो वर्गो में विभक्त की हुए है काव्यपथ जयशंकर प्रसाद की काव्य की विशेषताएँ और जयशंकर प्रसाद की महत्वपूर्ण रचनाएं में आँसू, लहर तथा कामायनी दूसरे वर्ग की रचनाएँ हैंउन्होंने काव्यरचना ब्रजभाषा में आरम्भ की और धीर-धीरे खड़ी बोली को अपनाते हुए इस भाँति अग्रसर हुए कि खड़ी बोली के मूर्धन्य कवियों में उनकी गणना की जाने लगी और वे युगवर्तक कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

– कानन कुसुम

– महाराणा का महत्व

– झरना(1918)

– आंसू – लहर

– कामायनी1935

– प्रेम पथिक

जयशंकर प्रसाद ने हिंदी काव्य में छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई और वह काव्य की सिद्ध भाषा बन गई।जयशंकर प्रसाद की सर्वप्रथम छायावादी रचना ‘खोलो द्वार’ 1914 ई. में इंदु में प्रकाशित की थी । वे छायावाद के प्रतिष्ठापक ही नहीं अपितु छायावादी पद्धति पर सरस संगीतमय गीतों के लिखनेवाले श्रेष्ठ कवि भी हैं। उन्होंने हिंदी में ‘करुणालय’ द्वारा गीत नाट्य का भी आरंभ किया था ।

जयशंकर प्रसाद ने बहुत ही अलग अलग काव्य लिखने के लिये मौलिक छंदचयन किया और अनेक छंद का संभवत जयशंकर प्रसाद सबसे पहले प्रयोग किया था ।जयशंकर प्रसाद ने नाटकीय ढंग पर काव्य और कथा-शैली का मनोवैज्ञानिक पथ पर विकास किया था । साथ ही कहानी कला की नई टेकनीक का संयोग काव्यकथा से कराया था ।जयशंकर प्रसाद ने प्रगीतों की ओर विशेष रूप से उन्होंने गद्य साहित्य को संपुष्ट किया और नीरस इतिवृत्तात्मक काव्यपद्धति को भावपद्धति के सिंहासन पर स्थापित किया।

जयशंकर प्रसाद के काव्यक्षेत्र में कीर्ति का मूलाधार ‘कामायनी’ है। और खड़ी बोली का यह अद्वितीय महाकव्य मनु और श्रद्धा को आधार बनाकर रचित मानवता को विजयिनी बनाने का संदेश दिया है।यह जयशंकर प्रसाद की रूपक कथाकाव्य है जिसमें मन, श्रद्धा और इड़ा के योग से अखंड आनंद की उत्तपति का रूपक प्रत्यभिज्ञा दर्शन के आधार पर संयोजित किया हुवा है । जयशंकर प्रसाद की यह कृति छायावाद और खड़ी बोली की काव्यगरिमा का ज्वलंत उदाहरण है। सुमित्रानंदन पंत इसे ‘हिंदी में ताजमहल के समान’ मानते हैं। शिल्पविधि, भाषासौष्ठव एवं भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से इसकी तुलना खड़ी बोली के किसी भी काव्य से नहीं की जा सकती है।

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जयशंकर प्रसाद के छन्द –

जयशंकर प्रसाद जी ने विविध छन्दों के माध्यम से काव्य को सक्सेस फूल प्रदान की है। और भावानुसार छन्द-परिवर्तन ‘कामायनी’ में दर्शनीय है। ‘आँसू’ के छन्द उसके विषय में सर्वधा अनुकूल हैं। जयशंकर प्रसाद ने गीतों का भी सफल प्रयोग किया है। भाषा की तत्समता, छन्द की गेयता और लय को प्रभावित नहीं करती है। जयशंकर प्रसाद की कामायनी के शिल्पी के रूप में प्रसादजी न केवल हिन्दी साहित्य की अपितु विश्व साहित्य की विभूति हैं। 

आपने भारतीय संस्कृति के विश्वजनीन सन्दर्भों को प्रस्तुत किया है तथा इतिहास के गौरवमय पृष्ठों को समक्ष लाकर हर भारतीय के हृदय को आत्म-गौरव का सुख प्रदान किया था | जयशंकर प्रसाद हिन्दी साहित्य के लिए माँ सरस्वती का प्रसाद हैं। 

जयशंकर प्रसाद की सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ –

• चित्राधार , जयशंकर प्रसाद

• आह ! वेदना मिली विदाई , जयशंकर प्रसाद

• बीती विभावरी जाग री , जयशंकर प्रसाद

• दो बूँदें , जयशंकर प्रसाद

• प्रयाणगीत , जयशंकर प्रसाद

• तुम कनक किरन , जयशंकर प्रसाद

• भारत महिमा , जयशंकर प्रसाद

• आत्‍मकथ्‍य , जयशंकर प्रसाद

• हिमाद्रि तुंग शृंग से , जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद के नाटक –

• सज्जन (1910 ई., महाभारत से)

• कल्याणी-परिणय (1912 ई., चन्द्रगुप्त मौर्य, सिल्यूकस, कार्नेलिया, कल्याणी)

• ‘करुणालय’ (1913, 1928 स्वतंत्र प्रकाशन, गीतिनाट्य, राजा हरिश्चन्द्र की कथा) इसका प्रथम प्रकाशन ‘इन्दु’ (1913 ई.) में हुआ।

• प्रायश्चित् (1013, जयचन्द, पृथ्वीराज, संयोगिता)

• राज्यश्री (1914)

• विशाख (1921)

• अजातशत्रु (1922)

• जनमेजय का नागयज्ञ (1926)

• कामना (1927)

• स्कन्दगुप्त (1928, विक्रमादित्य, पर्णदत्त, बन्धवर्मा, भीमवर्मा, मातृगुप्त, प्रपंचबुद्धि, शर्वनाग, धातुसेन (कुमारदास), भटार्क, पृथ्वीसेन, खिंगिल, मुद्गल,कुमारगुप्त, अननतदेवी, देवकी, जयमाला, देवसेना, विजया, तमला,रामा,मालिनी, स्कन्दगुप्त)

• एक घूँट (1929, बनलता, रसाल, आनन्द, प्रेमलता)

• चन्द्रगुप्त (1931, चाणक्य, चन्द्रगुप्त, सिकन्दर, पर्वतेश्वर, सिंहरण, आम्भीक, अलका, कल्याणी, कार्नेलिया, मालविका, शकटार)

• ध्रुवस्वामिनी (1933, चन्द्रगुप्त, रामगुप्त, शिखरस्वामी, पुरोहित, शकराज, खिंगिल, मिहिरदेव, ध्रुवस्वामिनी, मंदाकिनी, कोमा)

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जयशंकर प्रसाद की लोकप्रिय कहानियाँ –

कथा के क्षेत्र में जयशंकर प्रसाद आधुनिक] कहानियों के शरुआती दाता माने जाते हैं। सन्‌ 1912 ई. में ‘इंदु’ में जयशंकर प्रसाद ने पहली कहानी ‘ग्राम’ प्रकाशित हुई थी । और उनकी कुल 72 कहानियाँ लिखी हुए है । जयशंकर प्रसाद के कहानी संग्रह

• छाया

• प्रतिध्वनि

• आकाशदीप

• आंधी

• इन्द्रजाल

जयशंकर प्रसाद उनकी अनेक कहानियों में भावना की प्रधानता देते है लेकिन उन्होंने यथार्थ की दृष्टि से भी बहुत अछि कहानियाँ भी लिखी हुए थी ।जयशंकर प्रसाद की वातावरणप्रधान कहानियाँ अत्यंत सफल हुई हैं। और उन्होंने ऐतिहासिक, प्रागैतिहासिक एवं पौराणिक कथानकों पर मौलिक एवं कलात्मक कहानियाँ लिखी हुए हे ।

भावना-प्रधान प्रेमकथाएँ, समस्यामूलक । आदर्शोन्मुख यथार्थवादी उत्तम कहानियाँ, भी जयशंकर प्रसाद ने लिखी हुए हैं । ये कहानियाँ भावनाओं की मिठास तथा कवित्व से पूर्ण हैं।जयशंकर प्रसाद भारत के उन्नत अतीत का जीवित वातावरण प्रस्तुत करने में सिद्ध थे। जयशंकर प्रसाद कि ही ऐसी अनेक कहानियाँ हैं जयशंकर प्रसाद जिनमें आदि से अंत तक भारतीय संस्कृति एवं आदर्शो की रक्षा का सफल प्रयास किया गया है।

जयशंकर प्रसाद की कुछ श्रेष्ठ कहानियों के नाम हैं और आकाशदीप, गुंडा, पुरस्कार, सालवती, स्वर्ग के खंडहर में आँधी, इंद्रजाल, छोटा जादूगर, बिसाती, मधुआ, विरामचिह्न, समुद्रसंतरण; अपनी कहानियों में जिन अमर चरित्रों की उन्होंने सृष्टि सर्जन की थीं और , उनमें से कुछ हैं चंपा, मधुलिका, लैला, इरावती, सालवती और मधुआ का शराबी, गुंडा का नन्हकूसिंह और घीसू जो अपने अमिट प्रभाव छोड़ जाते हैं।

जयशंकर प्रसाद का उपन्यास – (Jai shankar Prasad Novel)

जयशंकर प्रसाद ने अपने जीवन के दौरान कुल तीन उपन्यास लिखे हैं जैसेकि ‘कंकाल’, में नागरिक सभ्यता का अंतर यथार्थ उद्घाटित किया हुवा हे । तितली’ में ग्रामीण जीवन के सुधार के संकेत दिऐ हुवे हैं। प्रथम यथार्थवादी उन्यास हैं ; दूसरे में आदर्शोन्मुख यथार्थ है। इन उपन्यासों के द्वारा जयशंकर प्रसाद जी हिंदी में यथार्थवादी उपन्यास लेखन के क्षेत्र में अपनी गरिमा प्रस्थापित करते हैं।

‘इरावती’ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया इनका अधूरा उपन्यास मान जाता है ,जो रोमांस के कारण ऐतिहासिक रोमांस के उपन्यासों में विशेष आदर का पात्र है।जयशंकर प्रसाद ने अपने उपन्यासों में ग्राम, नगर, प्रकृति और जीवन का मार्मिक चित्रण किया है जो भावुकता और कवित्व से पूर्ण होते हुए भी प्रौढ़ लोगों की शैल्पिक जिज्ञासा का समाधान करता है।

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जयशंकर प्रसाद के प्रमुख नाटक –

  • सज्‍जन
  • कल्‍याणी
  • परिणय
  • करुणालय
  • प्रायश्‍चित
  • राज्‍यश्री
  • विशाख
  • अजातशत्रु

जयशंकर प्रसाद द्वारा छायावाद की स्थापना –

जयशंकर प्रसाद ने हिंदी काव्य में छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई और वह काव्य की सिद्ध भाषा बन गई। वे छायावाद के प्रतिष्ठापक ही नहीं अपितु छायावादी पद्धति पर सरस संगीतमय गीतों के लिखनेवाले श्रेष्ठ कवि भी बने। काव्यक्षेत्र में प्रसाद की कीर्ति का मूलाधार ‘कामायनी’ है।

खड़ी बोली का यह अद्वितीय महाकाव्य मनु और श्रद्धा को आधार बनाकर रचित मानवता को विजयिनी बनाने का संदेश देता है। यह रूपक कथाकाव्य भी है जिसमें मन, श्रद्धा और इड़ा (बुद्धि) के योग से अखंड आनंद की उपलब्धि का रूपक प्रत्यभिज्ञा दर्शन के आधार पर खुबज संयोजित किया गया है।  जयशंकर प्रसाद की कृति छायावाद और खड़ी बोली की काव्यगरिमा का ज्वलंत उदाहरण देती हे । और तो और सुमित्रानन्दन पंत इसे ‘हिंदी में ताजमहल के समान’ मानते हैं।

शिल्पविधि, भाषासौष्ठव एवं भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से इसकी तुलना खड़ी बोली के किसी भी काव्य से नहीं की जा सकती है। जयशंकर प्रसाद ने अपने दौर के पारसी रंगमंच की परंपरा को अस्वीकारते हुए कहाथा की भारत के गौरवमय अतीत के अनमोल चरित्रों को सामने लाते हुए बताया था की अविस्मरनीय नाटकों की रचना की थी।जयशंकर प्रसाद के नाटक स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त आदि में स्वर्णिम अतीत को अपनी आखो की सामने रखकर जैसे एक सोये हुए देश को जागने की प्रेरणा दे रहे थे ।

जयशंकर प्रसाद के नाटकों में देशप्रेम का स्वर अत्यंत दर्शनीय है और इन नाटकों में कई अत्यंत सुंदर और प्रसिद्ध गीत मिलते हैं। ‘हिमाद्रि तुंग शृंग से’, ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ जैसे उनके नाटकों के गीत सुप्रसिद्ध रहे हैं। जयशंकर प्रसाद को मिले पुरस्कार (Jaishankar Prasad awards) की बात करे तो जयशंकर प्रसाद को ‘कामायनी’ पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ था।

जयशंकर प्रसाद की बहुमुखी प्रतिभा –

Jai shankar Prasad जी का जीवन 48 वर्ष का रहा था । इसी में जयशंकर प्रसाद की रचना प्रक्रिया बहुत ही विभिन्न साहित्यिक विधाओं में प्रतिफलित हुई कि कभी-कभी हमें खुद को यकीं नहीं होता हैं । कविता, उपन्यास, नाटक और निबन्ध सभी में जयशंकर प्रसाद की गति समान है। लेकिन उनकी हर विद्या में उनका कवि सर्वत्र है। एक कवि की फुचर की कल्पनाशीलता ने ही साहित्य को अन्य विधाओं में उन्हें विशिष्ट और व्यक्तिगत प्रयोग करने के लिये अनुप्रेरित किया गया था ।

जयशंकर प्रसाद की कहानियों का अपना पृथक् और सर्वथा मौलिक शिल्प है,जयशंकर प्रसाद के चरित्र-चित्रण का, भाषा-सौष्ठव का, वाक्यगठन का एक सर्वथा निजी प्रतिष्ठान है। जयशंकर प्रसाद की कहानियों का अपना ऐक पृथक् और शिल्प है, और उन्होंने जयशंकर प्रसाद के चरित्र-चित्रण का, भाषा-सौष्ठव का,उन्होंने वाक्यगठन का एक सर्वथा निजी प्रतिष्ठान दिया हे ।

उनके नाटकों में भी इसी प्रकार के अभिनव और श्लाघ्य प्रयोग मिलते हैं। और अभिनेयता को दृष्टि में रखकर उनकी बहुत आलोचना की गई तो उन्होंने एक बार कहा भी था। कि नाटक के लायक उनको होना चाहिये जयशंकर प्रसाद को न कि नाटक रंगमंच के लायक और फिर जयशंकर प्रसाद यह कथन ही नाटक रचना के विधान को बहुत ही अधिक महत्त्वपूर्ण सिद्व कर देता है।

कविता, नाटक, कहानी, उपन्यास-सभी क्षेत्रों में प्रसाद जी एक नवीन ‘स्कूल’ और नवीन जीवन-दर्शन की स्थापना करने में सफल हुये हैं। वे ‘छायावाद’ के संस्थापकों और उन्नायकों में से एक हैं। वैसे सर्वप्रथम कविता के क्षेत्र में इस नव-अनुभूति के वाहक वही रहे हैं और प्रथम विरोध भी उन्हीं को सहना पड़ा है। भाषा शैली और शब्द-विन्यास के निर्माण के लिये जितना संघर्ष प्रसाद जी को करना पङा है, उतना दूसरों को नही।

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Jai shankar Prasad Death (जयशंकर प्रसाद की मुत्यु)

जयशंकर प्रसाद की मुत्यु 15 नवम्बर, सन् 1937 ई. को वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हो गइ थी उनकी आयु- 48 वर्ष थी । जयशंकर प्रसाद जी भारत के जीवित वातावरण अनुकूलन प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त रखते हे । जयशंकर प्रसाद की कितनी ही कहानियाँ ऐसी रोमांचक हैं जिनमें आदि से अंत तक भारतीय संस्कृति एवं आदर्शो की रक्षा का सफल प्रयास किया गया है।  ‘आँसू’ ने उनके हृदय की उस पीड़ा को शब्द दिए जो उनके जीवन में अचानक मेहमान बनकर आई और हिन्दी भाषा को समृद्ध बनाकर चले गये।

Jai shankar Prasad Video –

जयशंकर प्रसाद के रोचक तथ्य –

  • जयशंकर प्रसाद ने हिंदी काव्य में छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई और वह काव्य की सिद्ध भाषा बन गई।
  • 48 वर्षो के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध और विभिन्न विधाओं में रचनाएं की थी। 
  • उन्होंने इतिहास के गौरवमय पृष्ठों को समक्ष लाकर हर भारतीय के हृदय को आत्म-गौरव का सुख प्रदान किया था। 
  • जयशंकर प्रसाद की कितनी ही कहानियाँ ऐसी रोमांचक हैं जिनमें आदि से अंत तक भारतीय संस्कृति एवं आदर्शो की रक्षा का सफल प्रयास किया गया है। 

जयशंकर प्रसाद के प्रश्न –

1 .जयशंकर प्रसाद की सर्वश्रेष्ठ रचना कौन सी है?

उनकी सर्वश्रेस्ट रचना की बात करे तो  ‘प्रेम-पथिक’ कविता ‘कवि और कविता’ शीर्षक निबंध मुख्य है। 

2 .जयशंकर प्रसाद के नाटक कौन कौन से हैं?

सज्‍जन ,कल्‍याणी ,परिणय ,करुणालय ,प्रायश्‍चित ,राज्‍यश्री ,विशाख और अजातशत्रु  जयशंकर प्रसाद के नाटक है। 

3 .जयशंकर प्रसाद की मृत्यु कब हुई?

15 नवंबर 1937 के दिन जयशंकर प्रसाद की मृत्यु  हुआ था। 

4 .जयशंकर प्रसाद का प्रथम नाटक कौन सा है?

जयशंकर प्रसाद का प्रथम नाटक तीसरी पत्नी का नाम क्या था है। 

5 .जयशंकर प्रसाद की कहानी कौन सी है?

जयशंकर प्रसाद की पाँच कथा-संग्रह प्रकाशित हुए-‘छाया’, ‘प्रतिध्वनि’, ‘आकाशदीप’, ‘आँधी’ तथा ‘इंद्रजाल’। इन पाँचों कहानी संग्रहों में उनकी तक़रीबन 70 से भी ज्यादा कहानियाँ है। 

6 .जयशंकर प्रसाद के माता पिता का नाम क्या था ?

उनके पिता का नाम देवीप्रसाद साहू और माता का नाम श्री मति मुन्नी देवी था। 

7 .जयशंकर प्रसाद का बचपन का नाम क्या था ?

बचपन में जयशंकर प्रसाद को ‘झारखण्डी’ कहकर पुकारा जाता था और इनका नामकरण संस्कार भी बैजनाथ धाम में ही हुआ।

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निष्कर्ष – 

दोस्तों आशा करता हु आपको मेरा यह आर्टिकल  Jai Shankar Prasad Biography In Hindi पूरी तरह से समज आ गया होगा। इस लेख jaishankar prasad ki kahani के जरिये  हमने jay shankar prasad kis vad ke kavi the से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दे दी है अगर आपको इस तरह के अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है तो आप हमें कमेंट करके जरूर बता सकते है। और हमारे इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करे। जय हिन्द ।

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