Raja Ranjit Singh Biography In Hindi – राजा रणजीत सिंह की जीवनी

Raja Ranjit Singh पंजाब क्षेत्र में स्थित सिख साम्राज्य के संस्थापक थे. वह 19 वीं शताब्दी की शुरुआत में सत्ता में आए और उनका साम्राज्य 1799 से 1849 तक अस्तित्व में रहा. 18 वीं शताब्दी के दौरान पंजाब में 12 सिख मिसल्स में से एक सुकरचकिया मिसल के कमांडर महा सिंह के बेटे के रूप में जन्मे- रणजीत सिंह ने अपने साहसी पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए एक और बड़ा नेता बन गए.

 नाम   महाराजा रणजीत सिंह
 जन्म  13 नवंबर 1780
 जन्म स्थान   गुजरांवाला, सुकरचकिया मसल
 पिता  महा सिंह
 माता   राज कौर
 पत्नी  मेहताब कौर
 उत्तराधिकारी  खड़क सिंह
 उपलब्धि   सिख साम्राज्य के संस्थापक शेर-ए-पंजाब नाम से विख्यात
 मृत्यु  27 जून 1839
 मृत्यु स्थान  लाहौर, पंजाब

राजा रणजीत सिंह का जन्म और बचपन – Birth and childhood of Raja Ranjit Singh

महाराजा रणजीत सिंह का जन्म एक ऐसे समय में हुआ था जब पंजाब के अधिकांश हिस्सों में सिखों द्वारा एक कंफ़ेडरेट सरबत खालसा प्रणाली के तहत शासन किया गया था और इस क्षेत्र को गुटों के रूप में जाना जाता था. रणजीत जब 12 साल के थे तब उनके पिता की मृत्यु हो गई, जिसका पालन-पोषण उनकी मां राज कौर और बाद में उनकी सास सदा कौर ने किया. महाराजा रणजीत सिंह 18 वर्ष की आयु में सुकेरचकिया मिसल के अधिपति के रूप में पदभार संभाला. मिसल अरबी शब्द है जिसका भावार्थ “दल” होता हैं. प्रत्येक दल का एक सरदार होता था.

रणजीत सिंह महत्वाकांक्षी शासक और एक साहसी योद्धा थे उन्होंने सभी अन्य गुमराहों पर विजय प्राप्त करना शुरू कर दिया और भंगी मसल से लाहौर के विनाश ने सत्ता में अपने उदय के पहले महत्वपूर्ण कदम को चिह्नित किया. अंततः रणजीत सिंह ने सतलज से झेलम तक मध्य पंजाब के क्षेत्र पर विजय प्राप्त की, अपने क्षेत्र का विस्तार किया और सिख साम्राज्य की स्थापना की. बहादुरी और साहस के कारण उन्होंने “शेर-ए-पंजाब” (“पंजाब का शेर”) का खिताब अर्जित किया.

राजा रंजीत सिंह का प्रारंभिक जीवन – Early life of Raja Ranjit Singh

रणजीत सिंह का जन्म 13 नवंबर 1780 को गुजरांवाला, सुकरचकिया मसल (वर्तमान पाकिस्तान) में महा सिंह और उनकी पत्नी राज कौर के घर हुआ था. उनके पिता सुकरचकिया मसल के कमांडर थे. बचपन में रणजीत सिंह छोटी चेचक बीमारी से पीड़ित हो गए थे, जिसके परिणामस्वरूप वह एक आंख से देख नहीं पाते थे.

जब वह 12 साल के थे तब उनके पिता महा सिंह की मृत्यु हो गयी थी, जिसके बाद उन्हें उनकी माँ ने पाला था. उनका विवाह 1796 में कन्हैया मसल के सरदार गुरबख्श सिंह संधू और सदा कौर की बेटी मेहताब कौर से हुआ था. जब वह 16 साल के थे. उनकी शादी के बाद उनकी सास ने भी उनके जीवन में सक्रिय रुचि लेना शुरू कर दिया.

रणजीत नाम कैसे पड़ा –

शुरू में उनका नाम बुद्ध सिंह था। कहा जाता है कि उनके पिता महा सिंह ने एक युद्ध में छत्तर सरदार को हराया था। महासिंह ने इस युद्ध में अपनी जीत के बाद बेटे का नाम रणजीत रख दिया जिसका मतलब विजेता होता है।

राजा रणजीत सिंह 10 साल की उम्र में युद्ध का पहला स्वाद 

रणजीत सिंह का जन्म सन 1780 में गुजरांवाला में हुआ था. उनके पिता का नाम महा सिंह और माता का नाम राज कौर था. चूंकि, उनके पिता सुकर चाकिया मिसल के मुखिया थे, जोकि उस समय का जाना माना संगठन था. इस कारण उनकी नन्हीं आंखों ने हमेशा वीरता की तस्वीरें देखी और उनके कानों ने साहस के किस्से सुने. रणजीत सिंह को युद्ध का पहला स्वाद था, जब वह शायद दस साल के थे.

असल में उस दौर में साहिब सिंह भांगी नामक एक शासक हुआ करता था, जिसका वास्ता गुजरात से था. उसने रणजीत सिंह के पिता को कमजोर जानकर उन पर हमला कर दिया. बाद में जब उसे कड़ी टक्कर मिली, तो उसने खुद को एक सोधरन के किले में कैद कर लिया. साथ ही वहां से महा सिंह की सेना पर वार करना शुरु कर दिया. चूंकि, उसके इरादे नेक नहीं थे, इसलिए महा सिंह ने तय किया कि वह किसी भी कीमत पर उसे किले से निकाल कर रहेंगे और सबक सिखायेंगे, ताकि कोई और उसकी तरह दुस्साहस न कर सके. इसके लिए उन्होंने पूरे किले की घेराबंदी कर ली. महीनों तक वह अपने सैनिकों के साथ पड़े रहे, लेकिन साहिब सिंह भांगी को परास्त नहीं कर सके.

पिता महा सिंह का स्वास्थ बिगड़ने लगा –

दूसरी तरफ उनका स्वास्थ्य भी तेजी से बिगड़ने लगा. इसकी खबर जब भांगी के दूसरे साथियों को मिली तो वह उसे बचाने के लिए वहां पहुंच गए. उन्हें लगा था कि महा सिंह बीमार है, इसलिए उन्हें हराना बहुत आसान होगा. एक हद तक वह सही भी थे, किन्तु उन्हें नहीं पता था कि महा सिंह के साथ उनका 10 साल का बेटा भी इस युद्ध का हिस्सा था, जोकि पिता की जगह खुद मोर्चा संभाल चुका था. जैसे ही वह किले के पास पहुंचे, रणजीत सिंह ने अपने नेतृत्व में अपनी सेना को उन पर हमला करने का आदेश दिया.

अंत में परिणाम यह रहा कि इस लड़ाई में उनके चलते ही महा सिंह की जीत हुई. हालांकि, महा सिंह इसके बाद ज्यादा दिनों तक जिंदा नहीं रह सके और अगले दो वर्ष बाद 1792 में मृत्यु को प्यारे हो गए थे. पिता की मृत्यु के बाद उनकी सत्ता के राजपाट का सारा बोझ रणजीत सिंह के कंधों पर आ गया. हालांकि, वह उम्र में बहुत छोटे थे, इसलिए उनकी मां ने उनकी मदद की और उन्हें इसके लिए तैयार किया.बाद में 12 अप्रैल 1801 को वह आधिकारिक रुप में महाराजा की उपाधि से नवाजे गए.

राजा रणजीत सिंह का शासनकाल और साम्राज्य –

रंजीत सिंह 18 साल की उम्र में सुकेरचकिया मसलक के अधिपति बन गए. सत्ता संभालने के बाद उन्होंने अपने क्षेत्र का विस्तार करने के लिए अभियान शुरू किए. उन्होंने अन्य गुमराहों की भरपाई करते हुए अपने विजय अभियान की शुरुआत की और 1799 में भंगी मसल से लाहौर पर कब्जा कर लिया और बाद में इसे अपनी राजधानी बनाया. फिर उन्होंने पंजाब के बाकी हिस्सों पर कब्जा कर लिया.

1801 में उन्होंने सभी सिख गुटों को एक राज्य में एकजुट किया और 12 अप्रैल को बैसाखी के दिन “महाराजा” की उपाधि ग्रहण की. इस समय उनकी आयु मात्र 20 साल थी. फिर उन्होंने आगे अपने क्षेत्र का विस्तार किया. उन्होंने 1802 में भंगी मिस्ल शासक माई सुखन से अमृतसर के पवित्र शहर को जीत लिया. उन्होंने 1807 में अफगान प्रमुख कुतुब उद-दीन से कसूर पर कब्जा करके अपनी जीत जारी रखी.

वह 1809 में हिमालय के कम हिमालय में कांगड़ा के राजा संसार चंद की मदद करने के लिए गए थे. सेनाओं को हराने के बाद उन्होंने कांगड़ा को अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया. 1813 में, महाराजा रणजीत सिंह कश्मीर में एक बार्कज़े अफगान अभियान में शामिल हो गए, लेकिन बार्केज़ द्वारा धोखा दिया गया था. फिर भी वह अपदस्थ अफगान राजा के भाई शाह शोज को बचाने के लिए गया और पेशावर के दक्षिण-पूर्व में सिंधु नदी पर अटॉक के किले पर कब्जा कर लिया.

तब उन्होंने शाह शोजा पर प्रसिद्ध कोह-ए-नूर हीरे के साथ भाग लेने का दबाव डाला जो उनके कब्जे में था.उन्होंने अफगानों से लड़ने और उन्हें पंजाब से बाहर निकालने में कई साल बिताए. आखिरकार उन्होंने पेशावर सहित पश्तून क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और 1818 में मुल्तान प्रांत भी जीत लिया. उसने इन विजय के साथ मुल्तान क्षेत्र में सौ वर्षों से अधिक के मुस्लिम शासन को समाप्त कर दिया. उन्होंने 1819 में कश्मीर पर कब्जा कर लिया.

रणजीत सिंह एक धर्मनिरपेक्ष शासक थे, जिनका सभी धर्मों में बहुत सम्मान था. उनकी सेनाओं में सिख, मुस्लिम और हिंदू शामिल थे और उनके कमांडर भी विभिन्न धार्मिक समुदायों से आते थे. 1820 में उन्होंने पैदल सेना और तोपखाने को प्रशिक्षित करने के लिए कई यूरोपीय अधिकारियों का उपयोग करके अपनी सेना का आधुनिकीकरण करना शुरू किया. उत्तर-पश्चिम सीमांत में हुई विजय में आधुनिक सेना ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया.

1830 के दशक तक अंग्रेज भारत में अपने क्षेत्रों का विस्तार करने लगे थे. वे सिंध प्रांत को अपने लिए रखने पर आमादा थे और रणजीत सिंह को उनकी योजनाओं को स्वीकार करने की कोशिश करते थे. यह रणजीत सिंह के लिए स्वीकार्य नहीं था और उन्होंने डोगरा कमांडर जोरावर सिंह के नेतृत्व में एक अभियान को अधिकृत किया जिसने अंततः 1834 में रणजीत सिंह के उत्तरी क्षेत्रों को लद्दाख में विस्तारित किया.

1837 में सिखों और अफगानों के बीच आखिरी टकराव जमरूद की लड़ाई में हुआ था. सिख खैबर दर्रे को पार करने की ओर बढ़ रहे थे और अफगान सेनाओं ने जमरूद पर उनका सामना किया. अफ़गानों ने पेशावर पर आक्रमण करने वाले सिखों को वापस लेने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहे. 1839 में रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई और 1846 में सिख सेना को प्रथम एंग्लो-सिख युद्ध में हराया गया. 1849 में द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध के अंत तक पंजाब में अंग्रेजों ने सिख साम्राज्य का अंत कर दिया.

पंजाब के बाहर साम्राज्य विस्तार –

अपनी लाहौर विजय के बाद रणजीत सिंह ने अपने सिख साम्राज्य को विस्तार देना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने पंजाब के बाकी हिस्से के अलावा पंजाब से परे इलाके जैसे कश्मीर, हिमालय के इलाके और पोठोहार क्षेत्र पर अपना ध्यान केंद्रित किया। 1802 में उन्होंने अमृतसर को अपने साम्राज्य में मिला लिया। 1807 में उन्होंने अफगानी शासक कुतबुद्दीन को हराया और कसूर पर कब्जा कर लिया। 1818 में मुल्तान और 1819 में कश्मीर सिख साम्राज्य का हिस्सा बन चुका था। अफगानों और सिखों के बीच 1813 और 1837 के बीच कई युद्ध हुए। 1837 में जमरुद का युद्ध उनके बीच आखिरी भिड़ंत थी। इस भिड़ंत में रणजीत सिंह के एक बेहतरीन सिपाहसालार हरि सिंह नलवा मारे गए थे। इस युद्ध में कुछ सामरिक कारणों से अफगानों को बढ़त हासिल हुई और उन्होंने काबुल पर वापस कब्जा कर लिया।

राजा रंजीत सिंह का व्यक्तिगत जीवन –

रणजीत सिंह ने कई विवाह किये थे. उनमें सिख, हिंदू और साथ ही मुस्लिम धर्म की पत्नियां थीं. उनकी कुछ पत्नियां के नाम मेहताब कौर, रानी राज कौर, रानी रतन कौर, रानी चंद कौर और रानी राज बंसो देवी थीं.उनके कई बच्चे भी थे जिनमें बेटे खड़क सिंह, ईशर सिंह, शेर सिंह, पशौरा सिंह और दलीप सिंह शामिल हैं. हालाँकि उन्होंने केवल खारक सिंह और दलीप सिंह को अपने जैविक पुत्र के रूप में स्वीकार किया. उन्हें एक शानदार व्यक्तित्व वाले एक सक्षम और न्यायप्रिय शासक के रूप में याद किया जाता है. उनका साम्राज्य धर्मनिरपेक्ष था जहां सभी धर्मों का सम्मान किया जाता था और उनकी धार्मिक मान्यताओं के कारण किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता था.  उन्होंने हरमंदिर साहिब के सुनहरे सौंदर्यीकरण में भी प्रमुख भूमिका निभाई. उनके साहस और वीरता के लिए उन्हें दुनिया भर में बहुत सम्मान दिया गया था इसीकारण उन्हें “शेर-ए-पंजाब” (“पंजाब का शेर”) के रूप में जाना जाता था.

रणजीत सिंह अफगानों के लिए काल बने –

महाराज बनते ही उन्होंने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया और अपने साम्राज्य का विस्तार शुरु कर दिया. उनके दौर में भारत में अफगानों ने अपना आतंक मचा रखा था. वह तेजी से लूट-पाट करने में लगे थे. रणजीत सिंह ने उनका इलाज करते हुए उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया. उन्होंने उनके खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ीं. इसके परिणाम स्वरुप वह उन्हें पश्चिमी पंजाब की ओर खदेड़ने में सफल रहे. आगे बढ़ते हुए उन्होंने पेशावर समेत पश्तून क्षेत्र पर अपना कब्जा जमाया, जोकि उनकी बड़ी सफलता साबित हुआ. यह एक ऐसा क्षेत्र था, जहां पर उनसे पहले किसी गैर मुस्लिम ने राज नहीं किया था.

वह यही नहीं रुके आगे बढ़ते हुए उन्होंने पेशावर, जम्मू कश्मीर और आनंदपुर तक अपनी विजय पताका लहराई.खुद को और ज्यादा मजबूत करते हुए उन्होंने एक विशेष सेना के गठन में अपनी अहम भूमिका अदा की, जिसे ‘सिख खालसा’ के नाम से जाना गया. कहा जाता है कि अपने शासन काल में उन्होंने पंजाब को एक समृद्ध और मजबूत राज्य बना दिया था. इतना मजबूत कि उनके जीते-जी अंग्रेज तक वहां कदम रखने से डरते रहे. आखिरकार उन्होंने मध्य पंजाब के क्षेत्र सतलुज से झेलम तक पर कब्जा कर, अपने क्षेत्र का विस्तार किया और सिख साम्राज्य की स्थापना की. उनकी बहादुरी और साहस के कारण उन्होंने “शेर-ए-पंजाब” कहा गया.

रणजीत सिंह सदा कौर की कुशलता से लाहौर के राजा बने –

इस मुश्किल घड़ी में Raja Ranjit Singh ने सदा कौर की सलाह ली. यह सदा कौर के लिए भी आसान नहीं था. लेकिन बिना डरे सदा कौर ने रणजीत सिंह को कहा लाहौर पर हमला होगा. कौर ने रणजीत से पूछा कि आपके पास कितनी सेना है. इस पर रणजीत सिंह ने बताया कि 3000 सैनिक तैयार है. सदा कौर के पास इस दौरान 2000 सैनिकों की फौज थी. सदा कौर ने कहा कि 5000 की कुल फौज के साथ हम लाहौर पर हमला करेंगे. रणजीत सिंह डरे हुए थे और उन्हें पता था कि यदि युद्ध हुआ तो हार निश्‍चित है.

उन्होंने सदा कौर को कहा, माताजी हमारी सेना जैसे ही कूच करेगी हम पर आक्रमण हो जाएगा. इसके बाद सदा कौर ने कहा कि नहीं हम अमृतसर जाएंगे. सैनिकों को कहें कि वहां हम पवित्र सरोवर में स्नान करेंगे. इसके बाद सेना सहित रणजीत और सदा कौर अमृतसर पहुंचे और डेरा डाला. यह बात आग की तरह फैल गई. इसके बाद वहीं पर देर रात तक सदा कौर ने रणजीत सिंह और सेना कमांडरों के साथ बैठक की और इसके तुरंत बाद सेना ने लाहौर की तरफ कूच किया.लाहौर के दरवाजे पर पहुंची सेना को देख वहां मौजूद दोनों कबीलों के लड़ाकों ने भागने में भलाई समझी. इसके बाद मुश्‍किल थी छेत सिंह के किले पर कब्जा करना.

लाहौर के गेट जनता ने रणजीत सिंह के ल‌िए खोल दिए थे. सेना ने खुशी के चलते गोलियां चलाना शुरू कर दिया. इसके बाद सदा कौर ने किले के दरवाजे पर जाकर दरबान से कहा कि उन्हें छेत सिंह से अकेले में मिलना है. छेत सिंह ने उन्हें किले के अंदर आने को कहा. बेखौफ सदा कौर बिना सिपाहियों या हथियार के अकेली छेत सिंह से मिलने पहुंच गईं. वहां उन्होंने छेत सिंह से कहा कि दोनों कबीलों को हमारी सेना ने मार दिया है. मैं आपकी भलाई चाहती हूं, इसलिए आप किला छोड़ दें, आपकी जागीरें आपकी ही रहेंगी बस लाहौर रणजीत सिंह का होगा. ऐसा नहीं करने पर उन्हें मार दिया जाएगा. इसके दो घंटे बाद छेत सिंह ने किले की चाबियां रणजीत सिंह के हवाले कर दीं. इस तरह बिना एक बूंद खून बहाए सदा कौर ने रणजीत सिंह को लाहौर की गद्दी संभलवा दी.

रणजीत सिंह आधुनिक सेना के हिमायती –

Raja Ranjit Singh आधुनिक सेना बनाना चाहते थे। इसके लिए उनको पश्चिमी युद्ध कौशल और तरीकों को अपनाने से भी परहेज नहीं था। उन्होंने अपनी सेना में कई यूरोपीय अधिकारियों को भी नियुक्त किया। उनकी सेना को खालसा आर्मी के नाम से जाना जाता था। उनकी सेना में जहां हरि सिंह नलवा, प्राण सुख यादव, गुरमुख सिंह लांबा, दीवान मोखम चंद और वीर सिंह ढिल्लो जैसे भारतीय जनरल थे तो फ्रांस के जीन फ्रैंकोइस अलार्ड और क्लाउड ऑगस्ट कोर्ट, इटली के जीन बापतिस्ते वेंचुरा और पाओलो डी एविटेबाइल, अमेरिका के जोसिया हरलान और स्कॉट-आयरिश मूल के अलेक्जेंडर गार्डनर जैसे सैन्य ऑफिसर भी शामिल थे।

गार्डनर रणजीत सिंह के निधन के बाद भी सिख सेना में रहे। सिख और अंग्रेजों के बीच पहले युद्ध के बाद गार्डनर कश्मीर के महाराजा की फौज में चले गए और कथित रूप से अपने अंतिम दिन श्रीनगर में गुजारे। फ्रेंच सिपाही जीन फ्रैंकॉइस अलार्ड भाड़े के सिपाही और अडवेंचर पसंद थे। उन्होंने नेपोलियन की सेना में अपनी सेवा दी थी। 1822 में वह रणजीत सिंह की सेना में शामिल हुए थे। रणजीत सिंह की फौज में वह ड्रैगून और लांसर्स नाम की कोर के प्रभारी थे जिनको बाद में महाराज की सेना की यूरोपीय ऑफिसर कोर का लीडर बना दिया गया।

Raja Ranjit Singh Biography

रणजीत सिंह का अवसान –

Raja Ranjit Singh की 27 जून 1839 को लाहौर में उनकी मृत्यु हो गई और वहीँ उनका अंतिम संस्कार किया गया और उनके अवशेष पंजाब के लाहौर में Raja Ranjit Singh की समाधि में रखे गए. उनके उत्तराधिकारी के रूप में पुत्र खड़क सिंह स्वीकार किया गया लेकिन उनकी मृत्यु के 10 वर्ष के भीतर सिख साम्राज्य का अंत हो गया. उन्हें एक शानदार व्यक्तित्व वाले एक सक्षम और न्यायप्रिय शासक के रूप में याद किया जाता है.

उनका साम्राज्य धर्मनिरपेक्ष था जहां सभी धर्मों का सम्मान किया जाता था और उनकी धार्मिक मान्यताओं के कारण किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता था. उन्होंने हरमंदिर साहिब के सुनहरे सौंदर्यीकरण में भी प्रमुख भूमिका निभाई. उनके साहस और वीरता के लिए उन्हें दुनिया भर में बहुत सम्मान दिया गया था इसीकारण उन्हें “शेर-ए-पंजाब” (“पंजाब का शेर”) के रूप में जाना जाता था.

सिख साम्राज्य का पतन –

दशकों के शासन के बाद रणजीत सिंह का 27 जून, 1839 को निधन हो गया। उनके बाद सिख साम्राज्य की बागडोर खड़क सिंह के हाथ में आई। Raja Ranjit Singh के मजबूत सिख साम्राज्य को संभालने में खड़क सिंह नाकाम रहे। शासन की कमियों और आपसी लड़ाई की वजह से सिख साम्राज्य का पतन शुरू हो गया। सिख और अंग्रेजों के बीच हुए 1845 के युद्ध के बाद महान सिख साम्राज्य पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया।

राजा रणजीत सिंह के रोचक तथ्य –

1. Raja Ranjit Singh महा सिंह और राज कौर के पुत्र रणजीत सिंह दस साल की उम्र से ही घुड़सवारी, तलवारबाज़ी, एवं अन्य युद्ध कौशल में पारंगत हो गये। नन्ही उम्र में ही रणजीत सिंह अपने पिता महा सिंह के साथ अलग-अलग सैनिक अभियानों में जाने लगे थे।

2. महाराजा रणजीत सिंह को कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी, वह अनपढ़ थे।

3. अपने पराक्रम से विरोधियों को धूल चटा देने वाले रणजीत सिंह पर 13 साल की कोमल आयु में प्राण घातक हमला हुआ था। हमला करने वाले हशमत खां को किशोर रणजीत सिंह नें खुद ही मौत की नींद सुला दिया।

4. बाल्यकाल में चेचक रोग की पीड़ा, एक आँख गवाना, कम उम्र में पिता की मृत्यु का दुख, अचानक आया कार्यभार का बोझ, खुद पर हत्या का प्रयास इन सब कठिन प्रसंगों नें रणजीत सिंह को किसी मज़बूत फौलाद में तबदील कर दिया।

5. राजा रणजीत सिंह का विवाह 16 वर्ष की आयु में महतबा कौर से हुआ था। उनकी सास का नाम सदा कौर था। सदा कौर की सलाह और प्रोत्साहन पा कर रणजीत सिंह नें रामगदिया पर आक्रमण किया था, परंतु उस युद्ध में वह सफलता प्राप्त नहीं कर सके थे।

6. उनके राज में कभी किसी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया गया था। रणजीत सिंह बड़े ही उदारवादी राजा थे, किसी राज्य को जीत कर भी वह अपने शत्रु को बदले में कुछ ना कुछ जागीर दे दिया करते थे ताकि वह अपना जीवन निर्वाह कर सके।

7. वो महाराजा रणजीत सिंह ही थे जिन्होंने हरमंदिर साहिब यानि गोल्डन टेम्पल का जीर्णोधार करवाया था।

8. उन्होंने कई शादियाँ की, कुछ लोग मानते हैं कि उनकी 20 शादियाँ हुई थीं।

9. महाराजा रणजीत सिंह न गौ मांस खाते थे ना ही अपने दरबारियों को इसकी आज्ञा देते थे

Final word

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