Rana Kumbha Biography In Hindi – राणा कुंभा की जीवनी

नमस्कार मित्रो आज के हमारे लेख में आपका स्वागत है ,आज हम Rana Kumbha Biography In Hindi में मध्यकालीन भारत के महान  शासक राणा कुंभा का जीवन परिचय बताने वाले है। 

राणा कुम्भा कि गिनती एक महान् शासक के रूप में होती थी। वह स्वयं एक अच्छा विद्वान् तथा वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद, व्याकरण, राजनीति और साहित्य का ज्ञाता हुआ करता था। आज राणा कुम्भा की वंशावली के साथ हम rana kumbha father name , rana kumbha son name और rana kumbha palace से सम्बंधित जानकारी से सबको वाकिफ कराने जा रहे है।  

महाराणा कुंभा की सांस्कृतिक उपलब्धियां की बात करे तो मध्यकालीन भारत के शासकों में कुम्भा ने चार स्थानीय भाषाओं में चार नाटकों की रचना की तथा जयदेव कृत ‘गीत गोविन्द’ पर ‘रसिक प्रिया’ नामक टीका भी लिखी थी।  राणा कुम्भा की पत्नी का नाम मीराबाई था ,महाराणा कुंभा का जन्म 1423 ई. में राजस्थान मेवाड़ में हुआ था। महाराणा कुंभा की हत्या कब और किसने की ? और महाराणा कुंभा के कितने पुत्र थे / जैसे कई सवालों के जवाब आज हमारी पोस्ट में आपको देने वाले है तो चलिए शुरू करते है। 

नाम

राणा कुम्भा

पूरा नाम

कुम्भकर्ण सिंह

पिता

राणा मोकल , मेवाड़

माता

सौभाग्य देवी

पत्नी

मीराबाई

पुत्र

उदय सिंह, राणा रायमल

पुत्री

रमाबाई (वागीश्वरी)

शासनावधि

1433 – 1468

राज्याभिषेक

1433

मुत्यु

1473 ई

Rana Kumbha Biography In Hindi –

महाराणा कुम्भकर्ण महाराणा मोकल के पुत्र थे और उनकी हत्या के बाद गद्दी पर बैठे। उन्होंने अपने पिता के मामा रणमल राठौड़ की सहायता से शीघ्र ही अपने पिता के हत्यारों से बदला लिया। सन् 1437 से पूर्व उन्होंने देवड़ा चौहानों को हराकर आबू पर अधिकार कर लिया। मालवा के सुलतान महमूद खिलजी को भी उन्होंने उसी साल सारंगपुर के पास बुरी तरह से हराया और इस विजय के स्मारक स्वरूप चित्तौड़ का विख्यात कीर्तिस्तंभ बनवाया। राठौड़ कहीं मेवाड़ को हस्तगत करने का प्रयत्न न करें, इस प्रबल संदेह से शंकित होकर उन्होंने रणमल को मरवा दिया और कुछ समय के लिए मंडोर का राज्य भी उनके हाथ में आ गया था ।

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राणा कुंभा का प्रारंभिक जीवन –

राज्यारूढ़ होने के सात वर्षों के भीतर ही उन्होंने सारंगपुर, नागौर, नराणा, अजमेर, मंडोर, मोडालगढ़, बूंदी, खाटू, चाटूस आदि के सुदृढ़ किलों को जीत लिया और दिल्ली के सुलतान सैयद मुहम्मद शाह और गुजरात के सुलतान अहमदशाह को भी परास्त किया। उनके शत्रुओं ने अपनी पराजयों का बदला लेने का बार-बार प्रयत्न किया, किंतु उन्हें सफलता न मिली। मालवा के सुलतान ने पांच बार मेवाड़ पर आक्रमण किया। नागौर के स्वामी शम्स खाँ ने गुजरात की सहायता से स्वतंत्र होने का विफल प्रयत्न किया। यही दशा आबू के देवड़ों की भी हुई। मालवा और गुजरात के सुलतानों ने मिलकर महाराणा पर आक्रमण किया किंतु मुसलमानी सेनाएँ फिर परास्त हुई। Rana Kumbha ने अन्य अनेक विजय भी प्राप्त किए।

उसने डीडवाना की नमक की खान से कर लिया और खंडेला, आमेर, रणथंभोर, डूँगरपुर, सीहारे आदि स्थानों को जीता। इस प्रकार राजस्थान का अधिकांश और गुजरात, मालवा और दिल्ली के कुछ भाग जीतकर उसने मेवाड़ को महाराज्य बना दिया। किंतु महाराणा कुंभकर्ण की महत्ता विजय से अधिक उनके सांस्कृतिक कार्यों के कारण है। उन्होंने अनेक दुर्ग, मंदिर और तालाब बनवाए तथा चित्तौड़ को अनेक प्रकार से सुसंस्कृत किया। कुंभलगढ़ का प्रसिद्ध किला उनकी कृति है। बंसतपुर को उन्होंने पुन: बसाया और श्री एकलिंग के मंदिर का जीर्णोंद्वार किया। चित्तौड़ का कीर्तिस्तंभ तो संसार की अद्वितीय कृतियों में एक है। इसके एक-एक पत्थर पर उनके शिल्पानुराग, वैदुष्य और व्यक्तित्व की छाप है। वे विद्यानुरागी थे। 

संगीत के अनेक ग्रंथों की उन्होंने रचना की और चंडीशतक एवं गीतगोविंद आदि ग्रंथों की व्याख्या की। वे नाट्यशास्त्र के ज्ञाता और वीणावादन में भी कुशल थे। कीर्तिस्तंभों की रचना पर उन्होंने स्वयं एक ग्रंथ लिखा और मंडन आदि सूत्रधारों से शिल्पशास्त्र के ग्रंथ लिखवाए। राणा कुम्भा नेे जिस कुम्भलगढ़ दुर्ग का निर्माण कराया उसी है। इस दुर्ग में 1468 ई. को अपने पुत्र उदयसिंह प्रथम द्वारा हत्या का शिकार हुए | यह घटना मेवाड़ के लिए पित्रहन्ता कही जाती है तथा इसी घटना को मेवाड़ का प्रथम कलंक कहा जाता है।

राणा कुंभा का महल – Rana Kumbha Palace

महाराणा Rana Kumbha राजस्थान के शासकों में सर्वश्रेष्ठ थे। मेवाड़ के आसपास जो उद्धत राज्य थे, उन पर उन्होंने अपना आधिपत्य स्थापित किया। 35 वर्ष की अल्पायु में उनके द्वारा बनवाए गए बत्तीस दुर्गों में चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, अचलगढ़ जहां सशक्त स्थापत्य में शीर्षस्थ हैं, वहीं इन पर्वत-दुर्गों में चमत्कृत करने वाले देवालय भी हैं। उनकी विजयों का गुणगान करता विश्वविख्यात विजय स्तंभ भारत की अमूल्य धरोहर है। कुंभा का इतिहास केवल युद्धों में विजय तक सीमित नहीं थी बल्कि उनकी शक्ति और संगठन क्षमता के साथ-साथ उनकी रचनात्मकता भी आश्चर्यजनक थी। ‘संगीत राज’ उनकी महान रचना है जिसे साहित्य का कीर्ति स्तंभ माना जाता है।

राणा कुंभा का युद्ध – War of Rana Kumbha

  • सारंगपुर का युद्ध (1364- 1382 ईस्वी) :

विद्रोही महपा को सुल्तान ने शरण दे दी | महाराणा कुम्भा ने उसे लोटाने की मांग की | सुल्तान ने महपा को देने से मना कर दिया अतः 1437 ई. में महाराणा कुम्भा ने एक विशाल सेना सहित मालवा पर आक्रमण कर दिया Rana Kumbha ने मंदसोर, जावरा को जीतता हुआ सारंगपुर पर चढ़ाई कर दी | इस युद्ध में सुल्तान महमूद खिलजी की हार हुई | सुल्तान को बंधी बना कर चित्तोडगढ लाया गया | वहा विजय के उपलक्ष्य में महाराणा ने पुरे गढ़ को सजाया | उदारता का परिचय देते हुए महाराणा ने सुल्तान को मुक्त कर दिया |

  • कुम्भलगढ़ पर आक्रमण :

महमूद खलजी ने सारंगपुर की हार का बदला लेने के लिए सबसे पहले 1442 ई. में कुम्भलगढ़ पर आक्रमण किया। मेवाड़ के सेनापति दीपसिंह को मार कर बाणमाता के मंदिर को नष्ट-भ्रष्ट किया। इतने पर भी जब यह दुर्ग जीता नहीं जा सका तो शत्रु सेना ने चित्तौड़ को जीतना चाहा। इस बात को सुनकर महाराणा बूँदी से चित्तौड़ वापस लौट आए जिससे महमूद की चित्तौड़-विजय की यह योजना सफल नहीं हो सकी और महाराणा ने उसे पराजित कर मांडू भगा दिया।

  • गागरौनपर आक्रमण (1443-44 .) :

मालवा के सुल्तान ने महाराणा कुम्भा की शक्ति को तोड़ना कठिन समझ कर मेवाड़ पर आक्रमण करने के बजाय सीमावर्ती दुर्गों पर अधिकार करने की चेष्टा की। अत: उसने नवम्बर 1443 ई. में गागरौन पर आक्रमण किया। गागरौन उस समय खींची चौहानों के अधिकार में था। मालवा और हाडौती के बीच होने से मेवाड़ और मालवा के लिए इस दुर्ग का बड़ा महत्त्व था। अतएव खलजी ने आगे बढ़ते हुए 1444 ई. में इस दुर्ग को घेर लिया और सात दिन के संघर्ष के बाद सेनापति दाहिर की मृत्यु हो जाने से राजपूतों का मनोबल गिर गया  और गागरौन पर खलजी का अधिकार हो गया। डॉ यू.एन.डे का मानना है कि इसका मालवा के हाथ में चला जाना मेवाड़ की सुरक्षा को खतरा था।

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मेवाड़-गुजरात संघर्ष – (1455 ई. से 1460 ई) –

नागौर की वजह से मेवाड़ और गुजरात में संघर्ष हुआ | नागौर के तत्कालीन शासक फिरोज खां की मृत्यु होने पर और उसके छोटे पुत्र मुजाहिद खां द्वारा नागौर पर अधिकार करने हेतु बड़े लड़के शम्सखां ने नागौर प्राप्त करने में महाराणा कुम्भा की सहायता माँगी थी। महाराणा कुम्भा ने अच्छा अवसर समझ मुजाहिद को वहाँ से हटा कर महाराणा ने शम्सखां को गद्दी पर बिठाया परंतु गद्दी पर बैठते ही शम्सखां अपने सारे वायदे भूल गया और उसने संधि की शर्तों का उल्लंघन करना शुरू कर दिया था ।

स्थिति की गंभीरता को समझ कर महाराणा कुम्भा ने शम्सखां को नागौर से निकाल कर उसे अपने अधिकार में कर लिया। शम्सखां भाग कर गुजरात पहुँचा और अपनी लडकी की शादी सुल्तान से कर, गुजरात से सैनिक सहायता प्राप्त कर महाराणा की सेना के साथ युद्ध करने को बढ़ा, परंतु विजय का सेहरा मेवाड़ के सिर बंधा। मेवाड़-गुजरात संघर्ष का यह तत्कालीन कारण था। 1455 से 1460 ई. के बीच मेवाड़- में युद्ध खेला गया था। 

गुजरात संघर्ष के दौरान निम्नांकित युद्ध हुए –

  • नागौर युद्ध (1456 ) :

नागौर के पहले युद्ध में शम्सखां की सहायता के लिए भेजे गए गुजरात के सेनापति रायरामचंद्र व मलिक गिदई महाराणा महाराणा कुम्भा से हार गए थे। अतएव इस हार का बदला लेने तथा शम्सखां को नागौर की गद्दी पर बिठाने के लिए 1456 ई. में गुजरात का सुल्तान कुतुबुद्दीन सेना के साथ मेवाड़ पर चढ़ आया।

  • सुल्तान कुतुबुद्दीन का आक्रमण :

सिरोही के देवड़ा राजा ने सुल्तान कुतुबुद्दीन से प्रार्थना की कि वह आबू जीतकर सिरोही उसे दे दे। सुल्तान ने इसे स्वीकार कर लिया। आबू को महाराणा कुम्भा ने देवड़ा से जीता था। सुल्तान ने अपने सेनापति इमादुलमुल्क को आबू पर आक्रमण करने भेजा किन्तु उसकी पराजय हुई। इसके बाद सुल्तान ने कुम्भलगढ़ पर चढ़ाई कर तीन दिन तक युद्ध किया।  बेले ने इस युद्ध में महाराणा कुम्भा की पराजय बताई है किन्तु गौ. ही. ओझा, हरबिलास शारदा ने इस कथन को असत्य बताते हुए इस युद्ध में महाराणा कुम्भा की जीत ही मानी है। उनका मानना है कि यदि सुल्तान जीत कर लौटता तो पुनः मालवा के साथ मिलकर मेवाड़ पर आक्रमण नहीं करता। सुल्तान का दूसरा प्रयास भी असफल रहा।

  • नागौरविजय (1458) 

महाराणा कुम्भा ने 1458 ई. में नागौर पर आक्रमण किया जिसके प्रमुख कारण इस प्रकार है

  • 1. नागौर के हाकिम शम्सखां और मुसलमानों के द्वारा बहुत ज्यादा मात्र में गो-वध करना।
  • 2. शम्सखांने मालवा के सुल्तान के मेवाड़ पर आक्रमण के समय महाराणा के विरुद्ध सहायता की थी।
  • 3. शम्सखां ने किले की मरम्मत शुरू कर दी थी। अत: महाराणा ने नागौर पर आक्रमण कर उसे जीत लिया।

साहित्य प्रेमी –

वह स्वयं एक अच्छा विद्वान् तथा वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद, व्याकरण, राजनीति और साहित्य का ज्ञाता था। कुम्भा ने चार स्थानीय भाषाओं में चार नाटकों की रचना की तथा जयदेव कृत ‘गीत गोविन्द’ पर ‘रसिक प्रिया’ नामक टीका भी लिखी थी ।

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राणा कुंभा की कहानी – Story of Rana Kumbha

ये स्वयं महान विद्वान व कलाप्रेमी शासक थे. जिन्हें वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद, व्याकरण, राजनीति और साहित्य की अनूठी समझ थी. इन्होने साहित्य के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया. कुम्भा ने चार नाटकों की रचना की तथा रसिक प्रिय व गीत गोविन्द पर टीकाएँ भी लिखी थी। हिन्दू सुरताण कुम्भकर्ण (कुम्भा) ने अपनी राजधानी में कई भवनों तथा नवीन इमारतों का निर्माण कराकर स्थापत्य कला को फिर से जीवित किया , राणा कुम्भा ने ही गुजरात विजय के उपलक्ष्य में विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया था, जिनके कारीगर अत्री व महेश थे। 

मेवाड़ के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शुमार अचलगढ़, कुम्भलगढ़, सास बहू का मन्दिर तथा सूर्य मन्दिर का निर्माण भी कुम्भा के काल में हुआ, इन्होने उजड़े हुए बसन्तपुर नगर को फिर से आबाद भी किया. कुम्भा के पुत्र का नाम उदयसिंह था जिन्होंने इनकी हत्या की थी. इसके बाद सत्ता प्राप्त करने वाले मुख्य शासकों में राजमल, राणा सांगा, प्रताप, अमरसिंह व राजसिंह थे। 

राणा कुंभा का व्यक्तित्व और इतिहास –

भारत अति प्राचीन देश हैं, रियासतकालीन समय में यहाँ अलग अलग देशी राजाओं के रजवाड़े हुआ करते थे. कही पर देशी शासकों का शासन था तो कही विदेशी आक्रमणकारी शासन चला रहे थे.उस समय अधिकतर शासकों की यह महत्वकांक्षा रहती थी, कि उनका साम्राज्य सबसे बड़ा हो, सबसे बड़ी सेना भी उन्ही की हो. उसी समय मेवाड़ राजस्थान जो प्राचीन समय में राजपुताना कहलाता था। यहाँ एक से बढ़कर वीर पराक्रमी शासक हुए, जिन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों से अंत तक लोहा लिया.मेवाड़ के शासकों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे लोक हितेषी थे, उनका लक्ष्य साम्राज्य विस्तार से अधिक जनता का सुख दुःख व उनकी भलाई था. ऐसे ही महान प्रतापी राणा कुम्भा थे। 

पन्द्रहवी सदी के इस राजपूत शासक के पिता महाराणा मोकलसिंह थे. इनका राज्य विस्तार डीडवाना, खंडेला, आमेर, रणथंभोर, डूँगरपुर, सीहारे , गुजरात, मालवा और दिल्ली तथा तथा राजस्थान का अधिकतर भूभाग था राणा कुम्भा’ ने संगीत, साहित्य, कला संस्कृति के क्षेत्र में जितना कार्य किया, उतना किसी समकालीन शासक ने नही किया था. मात्र 36 वर्षों के काल में इन्होनें मेवाड़ धरा में इतनी अनुपम स्थापत्य शैली को स्थापित किया, जिन्हें देखने के लिए हजारों सैलानी नित्य मेवाड़ आते हैं. चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, अचलगढ़, विजय स्तम्भ जैसे सैकड़ों किले व मंदिर हैं जिन्हें “राणा कुम्भा” ने बनाया था. संगीत के क्षेत्र में इन्हें संगीतराज की उपाधि प्राप्त थी. महाराणा कुम्भा नाट्यशास्त्र, वीणावादन में भी दक्ष थे। 

राणा कुंभा की मुत्यु – Death of Rana Kumbha

ऐसे वीर,प्रताभी महाराणा का अंत बहुत दुखद हुआ | 1468 ईस्वी में कुम्भा के पुत्र उदा ने राज्य पिपासा में महाराणा की हत्या कर डी अवम स्वयं सिहासन पर आरुढ़ हो गया मशहूर फॉरेन लेखक कर्नल टॉड ने लिखा है कि “महाराणा कुम्भा ने अपने राज्य को सुदृढ़ किलों द्वारा संपन्न बनाते हुए ख्याति अर्जित कर अपने नाम को चिर स्थायी कर दिया।” कुम्भलगढ़ प्रशस्ति में महाराणा कुम्भा को महान दानी और प्रजापालक बताया गया है उसे धर्म और पवित्रता का अवतार कहा है। 

डॉ जी. शारदा ने उसे ‘महान शासक, महान सेनापति, महान निर्माता और महान विद्वान’ कहा है। प्रजाहित को ध्यान रखने के कारण प्रजा उसमें अत्यधिक विश्वास और श्रद्धा रखती थी। महाराणा कुम्भा संगीतकार,साहित्य प्रेमी , संगीताचार्य ,वास्तुकला का पुरोधा, नाट्यकला में कुशल , कवियों का शिरोमणि , अनेक ग्रंथो का रचियता, वेद, स्मृति, दर्शन, उपनिषद, व्याकरण आदि का विद्वान, संस्कृत आदि भाषाओँ का ज्ञाता, प्रजापालक, दानवीर, जैसे कई गुण सर्वतोन्मुखी गुण विद्यमान थे जो राणा सांगा में नहीं थे। 

राणा कुंभा की हत्या के बाद मेवाड़ –

Rana Kumbha की हत्या करने वाले उदा को कोई भी महाराणा के रूप में स्वीकार करने को तैयार नही था | अतः किसी भी तरह उदा को हटाने के लिए संघर्ष प्रारंभ हो गया था उदा और उसके भाइयो में आपसी रंजिस बढती चली गयी | और अंतत: रायमल ने राज सिहासन अपने अधिकार में कर लिया | इस बीच ऊदा मालवा के सुल्तान के पास सहायतार्थ पहुंचा। मालवा के सुल्तान गयासशाह ने मेवाड़ में अशांति करते हुए कई इलाके हथिया लिए किन्तु रायमल की सूझबूझ से उसके चितौड़ और मांडलगढ़ के आक्रमणों में सुल्तान की हार हुई इस प्रकार रायमल ने मेवाड़ की स्थिति को सुदृढ़ करना आरम्भ किया था। 

 मेवाड़ और सुदृढ़ करने के लिए जोधपुर के राठौड़ों व हाड़ाओं से मित्रता की, किन्तु इस बीच उसके पुत्रों में संघर्ष हो जाने और दो पुत्रों की मृत्यु होने तथा सांगा के मेवाड़ छोड़ कर चले जाने से उसका जीवन दुःखमय हो गया। इसी आघात के कारण रायमल की हालत बहुत बिघाड गयी हो गयी | जैसे ही पिता के अस्वस्त होने की खबर सांगा को लगी वह पुनः मेवाड़ आ गया अंतत: रायमल ने अपने पुत्र सांगा (संग्राम सिंह) को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और कुछ ही दिनों बाद रायमल की मृत्यु हो गयी , जो उसकी (रायमल की) मृत्यु के बाद 1508 ई. में मेवाड़ के सिंहासन पर प्रतिष्ठित हुआ। सांगा के मेवाड़ की सत्ता सँभालते ही मेवाड़ का उत्कर्षकाल पुनः प्रारंभ हो गया।

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राणा कुंभा का इतिहास –

1433 ई.* इस वर्ष महाराणा कुम्भा का राज्याभिषेक हुवा (कर्नल जेम्स टॉड ने महाराणा कुम्भा के राज्याभिषेक का वर्ष 1418 ई. बताया है व उनकी पत्नी का नाम मीराबाई बताया है, जो कि सही नहीं है | मीराबाई तो महाराणा कुम्भा के 100 वर्ष बाद की थीं) महाराणा मोकल के मामा मारवाड़ के रणमल्ल थे रणमल्ल चित्तौड़ आए और चाचा व मेरा को मारने के लिए 500 सवारों के साथ निकले और कई जगह धावे बोले चाचा व मेरा अपने साथी राजपूतों के हाथों मारे गए इक्का (चाचा का बेटा) और महपा पंवार भागकर मांडू के सुल्तान महमूद की शरण में चले गए राघवदेव (महाराणा कुम्भा के काका) और रणमल्ल के बीच खटपट हो रही थी। 

रणमल्ल ने धोखे से राघवदेव की हत्या कर दी, जिसका हाल कुछ इस तरह है कि रणमल्ल ने राघवदेव को तोहफे में अंगरखा दिया, जिसकी दोनों बाहों के मुंह सीये हुए थे जब राघवदेव ने अंगरखा पहना तो उनके दोनों हाथ फँस गए, इतने में रणमल्ल ने तलवार से राघवदेव की हत्या कर दी Rana Kumbha ने जनकाचल पर्वत व आमृदाचल पर्वत पर विजय प्राप्त की1437 ई  महाराणा कुम्भा ने देवड़ा राजपूतों को पराजित कर आबू पर अधिकार किया 1437-38 ई.* महाराणा कुम्भा ने मांडलगढ़ पर हमला कर विजय प्राप्त की मांडलगढ़ पर हाडा राजपूतों के सहयोगियों का कब्जा था इन्हीं दिनों में महाराणा ने खटकड़ पर हमला कर विजय प्राप्त की कुछ दिन बाद जहांजपुर पर हमला किया | काफी मशक्कत के बाद महाराणा कुम्भा ने जहांजपुर पर विजय प्राप्त की थी। 

Rana Kumbha Video –

https://www.youtube.com/watch?v=ACrH563OIVc

राणा कुंभा के रोचक तथ्य –

  • महाराणा कुंभा की सांस्कृतिक उपलब्धियां की बात करे तो मध्यकालीन भारत के शासकों में कुम्भा ने चार स्थानीय भाषाओं में चार नाटकों की रचना की तथा जयदेव कृत ‘गीत गोविन्द’ पर ‘रसिक प्रिया’ नामक टीका लिखी थी। 
  • राणा कुम्भा कि गिनती एक महान् शासक के रूप में होती थी। वह स्वयं एक अच्छा विद्वान् तथा वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद, व्याकरण, राजनीति और साहित्य का ज्ञाता हुआ करता था।
  • महाराणा कुंभा ने सारंगपुर, नागौर, नराणा, अजमेर, मंडोर, मोडालगढ़, बूंदी, खाटू, चाटूस आदि के सुदृढ़ किलों को जीत लिया और दिल्ली के सुलतान सैयद मुहम्मद शाह और गुजरात के सुलतान अहमदशाह को भी परास्त किया।
  • राणा कुम्भा द्वारा बनवाए गए बत्तीस दुर्गों में चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, अचलगढ़ जहां सशक्त स्थापत्य में शीर्षस्थ हैं, वहीं इन पर्वत-दुर्गों में चमत्कृत करने वाले देवालय भी हैं।

राणा कुंभा के प्रश्न –

1 .महाराणा कुंभा का जन्म कब हुआ ?

1403 ई. में महाराणा कुम्भा का जन्म चित्तौड़ के महाराणा मोकल किल्ले में हुआ था। 

2 .महाराणा कुंभा के कितने पुत्र थे ?

राणा कुंभा के के दो पुत्र ऊदा सिंह और राणा रायमल और एक रमाबाई (वागीश्वरी) नाम की राजकुँवरी भी थी। 

3 .राणा कुंभा के पिता कौन थे ?

महाराणा कुंभा के पिताजी का नाम महाराणा मोकल था। 

4 .महाराणा कुंभा के समय दिल्ली का शासक कौन था ?

राणा कुंभा के समय दिल्ली के राज्य पे मुहम्मद शाह का शाशन चला करता था। 

5 .महाराणा कुंभा के समय मालवा का सुल्तान कौन था ?

सुल्तान महमूद खिलजी महाराणा कुंभा के समय मालवा का राजा था। 

6 .महाराणा कुंभा की हत्या कब और किसने की ?

1473 ई. में महाराणा कुंभा की हत्या उसके पुत्र उदयसिंह ने कर दी।

7 .महाराणा कुंभा ने कितने दुर्गों का निर्माण करवाया ?

मेवाड़ के कुल 84 दुर्गों है ,उसमे से 32 दुर्ग अकेले कुंभा बनवाए थे ऐसा प्रमाण मिलता है। 

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निष्कर्ष – 

दोस्तों आशा करता हु आपको मेरा यह आर्टिकल Rana Kumbha Biography In Hindi आपको बहुत अच्छी तरह से समज आ गया होगा और पसंद भी आया होगा । इस लेख के जरिये  हमने rana kumbha family tree और rana kumbha wife से सबंधीत  सम्पूर्ण जानकारी दे दी है अगर आपको इस तरह के अन्य व्यक्ति के जीवन परिचय के बारे में जानना चाहते है तो आप हमें कमेंट करके जरूर बता सकते है। और हमारे इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ शयेर जरूर करे। जय हिन्द ।

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